सहारनपुर के कलेक्ट्रेट परिसर में 5 सितंबर 2026 की सुबह जो हुआ, वह पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति और स्थानीय इतिहास दोनों में लंबे समय तक चर्चा में रहेगा। प्रशासन ने भारी पुलिस बल और पैरा मिलिट्री की मौजूदगी में एक मस्जिद को ध्वस्त कर दिया। यह कार्रवाई सिटी मजिस्ट्रेट के जुलाई 2026 के आदेश और जिला जज द्वारा अपील खारिज होने के बाद हुई। मस्जिद प्रबंधन समिति इसे सदी पुरानी बता रही थी, जबकि अदालत ने इसे सरकारी जमीन पर अवैध कब्जा करार दिया।
कोर्ट का आदेश और कानूनी प्रक्रिया
मामला 2025 में शुरू हुआ जब बाजरंग दल के पूर्व प्रांतीय संयोजक विकास त्यागी ने शिकायत दर्ज कराई। उन्होंने आरोप लगाया कि जिला मजिस्ट्रेट कार्यालय परिसर के अंदर 315 वर्ग मीटर सरकारी जमीन पर मस्जिद बनाई गई है और वहां धार्मिक गतिविधियों के अलावा व्यावसायिक उपयोग भी हो रहा है। शिकायत में पोस्ट ऑफिस चलने और कुछ कमरों के किराए पर दिए जाने का जिक्र था।
इसके आधार पर यूपी पब्लिक प्रिमाइसेज (एविक्शन ऑफ अनऑथराइज्ड ऑक्यूपेंट्स) एक्ट 1972 के तहत कार्रवाई शुरू हुई। सिटी मजिस्ट्रेट कुलदीप सिंह ने 16-17 जुलाई 2026 को आदेश पारित किया। अदालत ने खसरा नंबर 539 को राजस्व रिकॉर्ड में कचहरी-कलेक्ट्रेट की सरकारी जमीन माना। फसली सालों के पुराने अभिलेखों का हवाला देते हुए कहा गया कि यह भूमि राज्य सरकार की है। अवैध कब्जे के लिए लगभग 6.41 करोड़ रुपये का मुआवजा भी तय किया गया, जो करीब 70 साल की अवधि के हिसाब से सर्कल रेट के आधार पर निकाला गया। 30 दिन के अंदर परिसर खाली करने का निर्देश दिया गया।
मस्जिद समिति ने इस आदेश के खिलाफ जिला जज की अदालत में अपील दाखिल की। जिला जज सतेंद्र कुमार ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनीं, सबूतों की जांच की और 2-4 सितंबर 2026 को अपील खारिज कर दी। सिटी मजिस्ट्रेट का आदेश बरकरार रहा। प्रशासन का कहना है कि इसके बाद कानूनी प्रक्रिया पूरी हो चुकी थी।
मस्जिद समिति के दावे और दस्तावेज
समिति का मुख्य तर्क था कि मस्जिद 1911 से पहले की है। उन्होंने 1 जनवरी 1911 का बिजली बिल पेश किया, जो मुतवल्ली शहजाद हुसैन के नाम बताया गया। समिति का कहना था कि इससे साबित होता है कि मस्जिद तब भी मौजूद थी जब कलेक्ट्रेट के वर्तमान ढांचे नहीं बने थे। उन्होंने पुराने भूमि रिकॉर्ड का हवाला देते हुए दावा किया कि जमीन मूल रूप से वहीद खान और याकूब खान नाम के व्यक्तियों के नाम दर्ज थी और उन्होंने कलेक्ट्रेट के लिए हिस्सा दान किया था।
इसके अलावा समिति ने कहा कि संरचना वक्फ नंबर 451 के रूप में सुन्नी वक्फ बोर्ड में लगभग 70 साल से पंजीकृत है। 1957 से नगर निगम के रिकॉर्ड में इसका जिक्र है। अप्रैल 1960 से केंद्र सरकार ने मस्जिद परिसर में सब-पोस्ट ऑफिस के लिए लीज डीड निष्पादित की और किराया भी चुकाया। समिति ने “वक्फ बाय यूजर” और लंबे समय से निरंतर उपयोग का तर्क भी दिया।
प्रशासन और अदालत का जवाब
प्रशासन ने बिजली बिल की प्रामाणिकता पर गंभीर सवाल उठाए। अदालत में पेश रिकॉर्ड के मुताबिक सहारनपुर में बिजली आपूर्ति का लाइसेंस दिसंबर 1922 में मिला और वितरण 1920 के दशक के मध्य-अंत में शुरू हुआ। 1911 का बिल कैसे जारी हो सकता है, यह सवाल उठाया गया। राजस्व अभिलेखों में जमीन लगातार सरकारी बताई गई। अदालत ने माना कि समिति मालिकाना हक या वैध टाइटल का ठोस सबूत पेश नहीं कर पाई। मूल रूप से यह जगह मुकदमेबाजों के लिए विश्राम गृह रही हो सकती है, जिसे बाद में धार्मिक संरचना में बदल दिया गया, ऐसा प्रशासन का पक्ष था।
ध्वस्तीकरण की सुबह और सुरक्षा व्यवस्था
5 सितंबर की सुबह कलेक्ट्रेट परिसर के सभी द्वार बंद कर दिए गए। पैरा मिलिट्री कंपनियां, पीएसी और आरएएफ तैनात की गईं। बुलडोजर आधे अंधेरे में या सुबह-सुबह पहुंचे। प्रशासन का एक बयान कहता है कि कार्रवाई करीब 6:45-7 बजे शुरू हुई ताकि जल्दी पूरी हो जाए। विपक्षी नेता 3 बजे शुरू होने का आरोप लगाते हैं। मुतवल्ली तनवीर अहमद ने आरोप लगाया कि बेदखली का आदेश था, ध्वस्तीकरण का स्पष्ट आदेश नहीं, और उचित प्रक्रिया नहीं अपनाई गई।
राजनीतिक प्रतिक्रियाएं
एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने कार्रवाई की आलोचना की। उन्होंने कहा कि 1911 से सक्रिय मस्जिद को इतनी जल्दी सुबह ध्वस्त करना हाईकोर्ट जाने का मौका न देने जैसा है। उन्होंने धार्मिक स्वतंत्रता और वक्फ बाय यूजर का हवाला दिया। समाजवादी पार्टी सांसद इकरा हसन ने आरोप लगाया कि उन्हें सहारनपुर आने से रोका गया और उनके घर के बाहर पुलिस तैनात रही। कांग्रेस सांसद इमरान मसूद ने भी राजस्व रिकॉर्ड में वहीद खान-याकूब खान के नाम रहने और वक्फ बोर्ड को पक्षकार न बनाए जाने का मुद्दा उठाया। अखिलेश यादव समेत अन्य विपक्षी आवाजें भी सामने आईं।
प्रशासन और सत्ताधारी पक्ष का रुख साफ रहा कि यह सरकारी जमीन पर अतिक्रमण हटाने की कानूनी कार्रवाई है। डीआईजी अभिषेक सिंह ने कहा कि कोर्ट का फैसला लागू किया गया और कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए सुरक्षा बल तैनात किए गए।
मलबे में मिला कुआं और एएसआई की जांच
ध्वस्तीकरण के अगले दिन 6 सितंबर को मलबा हटाने के दौरान एक ईंटों से बना कुआं मिला। करीब 20 फीट गहरा और डेढ़ मीटर चौड़ा। ऊपर स्लैब था, जिसे काटकर खोला गया। एसडीएम सुबोध कुमार मौके पर पहुंचे और आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया को सूचित किया। अधिकारी बताते हैं कि प्रथम दृष्टया कुआं सदी भर पुराना लग सकता है, लेकिन उम्र और महत्व की पुष्टि एएसआई जांच के बाद ही होगी। पुराने समय में पाइपलाइन पानी न होने पर कुएं प्रमुख स्रोत होते थे।
X account पर प्रतिक्रियाएँ
Mahua Moitra :
Saharanpur mosque built on land owned by Yaqoob & Walid Khan in 1911 who later donated land for DM office. Govt building on donated land- mosque predates govt office! Yet was demolished without chance to appeal to HC. Disgraceful.
Arfa Khanum Sherwani :
Imagine demolishing a century old mosque, violating every law, norm and principle this country claims to stand for-and then carrying on as if nothing happened.
Even the Taliban’s terrorist regime destruction of the Bamiyan Buddhas was 25 years ago.
India, in 2026, is still demolishing Muslim places of worship.
The largest democracy of the world, my foot !
Saharanpur mosque built on land owned by Yaqoob & Walid Khan in 1911 who later donated land for DM office. Govt building on donated land- mosque predates govt office! Yet was demolished without chance to appeal to HC. Disgraceful.
Imran Pratapgarhi :
प्रशासन कह रहा है कि सहारनपुर की मस्जिद कलेक्ट्रट की ज़मीन पर बनी थी, सच बात तो ये है कि आपके कलेक्ट्रेट के वजूद से पहले से वो मस्जिद मौजूद थी, अब आपके हाथ में वैध/अवैध का सर्टिफिकेट
देने का पावर आ गया है तो जिसे चाहो अवैध बता दो।
जहाँ से गुज़रो धुआँ बिछा दो,
जहाँ भी पहुँचो धमाल कर दो।
तुम्हे सियासत ने हक़ दिया है,
हरी ज़मीनों को लाल कर दो।
अपील भी तुम, दलील भी तुम,
गवाह भी तुम, वक़ील भी तुम।
जिसे भी चाहो हराम लिख दो,
जिसे भी चाहो हलाल कर दो।
Sachin Gupta :
उत्तर प्रदेश : सहारनपुर में कलक्ट्रेट परिसर के अंदर मौजूद 70 साल से भी ज्यादा पुरानी मस्जिद के निर्माण को जिला प्रशासन ने अवैध माना है !! ऐसा कहा जाता है कि अंग्रेजों ने कलक्ट्रेट के काम करने वाले मुस्लिम कर्मचारियों के लिए यह मस्जिद बनवाई थी। उस वक्त उन्हें नमाज पढ़ने दूर जाना पड़ता था।
Justice Seeker :
बहुत से जगहों पे मुसलमान कलेक्ट्रेट परिसर के लिए जगह दिए थे, जैसे थाने के लिए दिए थे, रेलवे स्टेशन के लिए दिए थे।
अब वही थाने, रेलवे स्टेशन, कलेक्ट्रेट के लोग मस्जिद को अवैध बता रहे हैं या या सरकारी ज़मीन पे होने की बात करते हैं, पागलपन की हद है।
Indian Muslim :
उत्तर प्रदेश के सभी थानों चौकी कचहरी या फिर कोई भी सरकारी विभाग हो लगभग सभी जगह एक खास समुदाय का इबादत गाह जरूर होगी पर उसको अवैध कहने की हिम्मत किसी अधिकारी में नहीं होगी.
तथ्य और आगे की राह
मस्जिद पक्ष ने ऐतिहासिक उपयोग, बिजली बिल, वक्फ पंजीकरण और लीज के दस्तावेज पेश किए, लेकिन अदालत ने उन्हें मालिकाना हक साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं माना। बिजली आपूर्ति का ऐतिहासिक रिकॉर्ड 1922 के आसपास का है, जिससे 1911 बिल विवादास्पद बना। ध्वस्तीकरण के बाद मिला कुआं नई जांच का विषय बन गया है।
मामला अब हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट जा सकता है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में यह घटना कानूनी प्रक्रिया, धार्मिक स्थलों और सरकारी जमीन के बीच के टकराव को फिर से सामने लाई है। अदालतों और भाजपा सरकार के दोगलेपन और नफ़रत की राजनीति के कारण देशभर में थू थू रही है.
रिपोर्ट : इस्मा टाइम्स न्यूज़ डेस्क.
