कांग्रेस नेता और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने शनिवार, 19 सितंबर 2026 को इंदौर में आयोजित ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम में शिक्षा, रोजगार, प्रतियोगी परीक्षाओं और सरकारी भर्तियों से जुड़े मुद्दे उठाए। उन्होंने कार्यक्रम की थीम ‘सिस्टम बनाम स्टूडेंट्स’ रखते हुए कहा कि छात्रों को सवाल पूछने और अपने अधिकारों की बात रखने से रोका जा रहा है।
कार्यक्रम में बड़ी संख्या में युवा और विद्यार्थी पहुंचे। राहुल गांधी ने कुछ छात्रों को मंच पर बुलाकर उनकी समस्याएं सुनीं। छात्रों ने विश्वविद्यालयों की कथित अपारदर्शिता, भर्ती में देरी, लंबित पदों और हॉस्टल की कमी जैसे मुद्दे सामने रखे।
छात्रों ने बताई भर्ती और विश्वविद्यालयों की समस्या
कार्यक्रम के दौरान एक छात्र ने कहा कि विश्वविद्यालय छात्रों का सहयोग नहीं कर रहे हैं और व्यवस्था में पारदर्शिता की कमी है। एक अन्य छात्र ने मध्य प्रदेश में सरकारी भर्तियों के कुछ पद लंबित रखे जाने का मुद्दा उठाया।
छात्रों ने आरोप लगाया कि भर्ती प्रक्रिया में देरी के कारण अभ्यर्थियों की उम्र बढ़ती जा रही है और बड़ी संख्या में युवा बेरोजगार बैठे हैं। उन्होंने यह भी कहा कि कई पद नियमित भर्ती के बजाय संविदा के आधार पर भरे जा रहे हैं।
27 प्रतिशत ओबीसी आरक्षण का मुद्दा
कार्यक्रम में मध्य प्रदेश में अन्य पिछड़ा वर्ग यानी ओबीसी के 27 प्रतिशत आरक्षण का मुद्दा भी उठाया गया। एक छात्र ने कहा कि वर्ष 2019 में राज्य सरकार ने ओबीसी आरक्षण को 14 प्रतिशत से बढ़ाकर 27 प्रतिशत किया था, लेकिन इसके बाद भर्ती प्रक्रिया के एक हिस्से को न्यायिक मामले का हवाला देकर रोक दिया गया।
हालांकि, इस दावे को पूरी तरह ‘10 हजार पदों पर रोक’ के रूप में पेश करना सही नहीं है। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, 87:13 व्यवस्था के तहत 87 प्रतिशत पदों पर भर्ती आगे बढ़ाई गई, जबकि 13 प्रतिशत पदों को मामले के अंतिम निपटारे तक लंबित रखा गया। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने भी इस व्यवस्था को अंतरिम तौर पर जारी रहने दिया था। इसलिए इस विषय में यह कहना अधिक सटीक होगा कि पदों का एक हिस्सा लंबित है, न कि पूरी भर्ती प्रक्रिया बंद है।
पेपर लीक और शिक्षा व्यवस्था पर निशाना
राहुल गांधी ने पेपर लीक, प्रतियोगी परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं, संस्थानों की भूमिका और शिक्षा के बढ़ते निजीकरण पर सरकार को घेरा। उन्होंने कहा कि छात्रों के सामने सबसे बड़ी परेशानी यह है कि पढ़ाई पूरी करने के बाद भी उन्हें रोजगार और निष्पक्ष भर्ती प्रक्रिया का भरोसा नहीं मिल रहा है।
कार्यक्रम में कुछ वीडियो क्लिप भी दिखाए गए, जिनमें विद्यार्थियों ने अपनी पढ़ाई, परीक्षा, छात्रवृत्ति, हॉस्टल और रोजगार से जुड़ी परेशानियां साझा कीं। राहुल गांधी ने कहा कि शिक्षा व्यवस्था का मकसद छात्रों को सवाल पूछने, सोचने और आगे बढ़ने का अवसर देना होना चाहिए।
‘सिस्टम छात्रों से सवाल नहीं चाहता’
राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि देश की व्यवस्था पर कुछ चुनिंदा लोगों का प्रभाव बढ़ गया है। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत का नाम लेते हुए अपनी राजनीतिक आलोचना रखी।
उन्होंने कहा कि व्यवस्था छात्रों को सवाल पूछने वाला नागरिक बनाने के बजाय ऐसे समर्थक तैयार करना चाहती है, जो बिना सवाल किए किसी भी बात को स्वीकार कर लें। राहुल गांधी ने इसके लिए ‘अंधभक्त’ शब्द का इस्तेमाल किया और कहा कि छात्रों और ऐसे समर्थकों के बीच मूल अंतर सवाल पूछने की क्षमता का है।
उन्होंने क्रिकेट प्रशासन का उदाहरण देते हुए भी संस्थाओं की स्वायत्तता पर सवाल उठाया। उनके इस बयान का आशय भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड में प्रभावशाली लोगों की भूमिका और संस्थागत नियुक्तियों को लेकर राजनीतिक बहस से था।
शिक्षा बजट के दावों पर क्या स्थिति है?
राहुल गांधी ने दावा किया कि शिक्षा पर सरकारी खर्च में बड़ी कमी आई है। उनके मुताबिक, वर्ष 2014 में शिक्षा के लिए बजट का 4.6 प्रतिशत हिस्सा रखा गया था, जो अब घटकर 2.6 प्रतिशत रह गया है। उन्होंने यह भी कहा कि पिछले वर्षों में शिक्षा के लिए 7.7 लाख करोड़ रुपये कम किए गए, 1.5 करोड़ छात्रों की छात्रवृत्ति बंद हुई और शिक्षकों के करीब 10 लाख पद खाली हैं।
इन आंकड़ों को प्रस्तुत करते समय एक जरूरी सावधानी यह है कि ‘शिक्षा बजट का प्रतिशत’ किस आधार पर निकाला गया है—केंद्र का कुल बजट, केंद्र और राज्यों का संयुक्त खर्च या सकल घरेलू उत्पाद—यह स्पष्ट होना चाहिए। शिक्षा मंत्रालय के उपलब्ध आंकड़ों में केंद्र और राज्यों के संयुक्त शिक्षा खर्च को जीडीपी के प्रतिशत के रूप में अलग तरीके से दर्ज किया जाता है। मंत्रालय की एक रिपोर्ट के अनुसार, 2014-15 में कुल शिक्षा खर्च जीडीपी का 4.07 प्रतिशत था और 2020-21 में यह 4.12 प्रतिशत दर्ज किया गया था। इसलिए राहुल गांधी के राजनीतिक दावों को आधिकारिक बजट दस्तावेजों से अलग-अलग संकेतकों पर मिलाकर देखना जरूरी है।
केंद्र सरकार के बजट दस्तावेजों में 2025-26 के लिए स्कूल शिक्षा और साक्षरता विभाग तथा उच्च शिक्षा विभाग के लिए अलग-अलग प्रावधान दर्ज हैं। आधिकारिक दस्तावेजों में स्कूल शिक्षा विभाग के लिए करीब 78,572 करोड़ रुपये और उच्च शिक्षा विभाग के लिए करीब 50,078 करोड़ रुपये का बजट अनुमान दिया गया था।
क्या देश में एक लाख सरकारी स्कूल बंद हुए?
राहुल गांधी ने दावा किया कि पिछले एक दशक में देश में करीब एक लाख सरकारी स्कूल बंद हुए और इनमें से 55 प्रतिशत स्कूल मध्य प्रदेश तथा उत्तर प्रदेश में थे।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, भारत में सरकारी स्कूलों की संख्या 2014-15 में 11,07,101 थी, जो 2023-24 में घटकर 10,17,660 रह गई। यानी इस अवधि में सरकारी स्कूलों की संख्या में लगभग 89,441 की कमी दर्ज हुई। हालांकि, स्कूलों की संख्या में कमी को सीधे-सीधे ‘बंद होने’ के बराबर नहीं माना जा सकता, क्योंकि इसमें विलय, पुनर्गठन, कम नामांकन वाले स्कूलों का युक्तिकरण और आंकड़ों की रिपोर्टिंग में बदलाव जैसे कारण भी शामिल हो सकते हैं।
संसद में पेश आंकड़ों के अनुसार, 2021-22 से 2023-24 के बीच सरकारी स्कूलों की संख्या 10,22,386 से घटकर 10,17,660 हुई। इसलिए ‘एक लाख स्कूल बंद’ का दावा व्यापक राजनीतिक बयान है; आधिकारिक आंकड़े सरकारी स्कूलों की संख्या में लगभग 89 हजार की शुद्ध कमी दिखाते हैं, लेकिन हर मामले में बंद होने का कारण एक जैसा नहीं है।
हॉस्टल और शिक्षकों की कमी
राहुल गांधी ने हॉस्टल की सीमित उपलब्धता का मुद्दा भी उठाया। उन्होंने कहा कि हर 100 छात्रों में केवल करीब 14 छात्रों को ही हॉस्टल की सुविधा मिल पाती है। उन्होंने इसे शिक्षा में सरकारी निवेश की कमी और निजीकरण से जोड़ते हुए कहा कि कमजोर आर्थिक पृष्ठभूमि के छात्रों पर इसका सबसे अधिक असर पड़ता है।
कार्यक्रम में शिक्षकों के रिक्त पदों का भी उल्लेख किया गया। राहुल गांधी ने देशभर में करीब 10 लाख शिक्षक पद खाली होने का दावा किया। यह आंकड़ा किस वर्ष, किस स्तर की शिक्षा और किन राज्यों को शामिल करके निकाला गया है, इसकी स्पष्ट जानकारी उनके भाषण के उपलब्ध समाचार विवरणों में नहीं दी गई है। इसलिए इसे एक राजनीतिक दावा मानकर संबंधित सरकारी विभागों के नवीनतम आंकड़ों से मिलान करना आवश्यक है।
इंदौर कार्यक्रम से पहले पुलिस की 31 शर्तें
कार्यक्रम से पहले इंदौर पुलिस और प्रशासन ने आयोजकों के सामने 31 शर्तें रखी थीं। इन शर्तों में भीड़ की अनुमानित संख्या, पुरुष और महिला प्रतिभागियों का अलग-अलग विवरण, प्रवेश और निकासी व्यवस्था, बैरिकेडिंग, तलाशी, पार्किंग, सीसीटीवी, चिकित्सा सहायता और आपातकालीन निकासी जैसे प्रावधान शामिल थे।
पुलिस ने इन सुरक्षा निर्देशों के संदर्भ में वर्ष 1991 में पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या के बाद गठित जस्टिस जे. एस. वर्मा आयोग की सिफारिशों का उल्लेख किया। प्रशासन का कहना था कि राजनीतिक कार्यक्रमों में सुरक्षा व्यवस्था और भीड़ प्रबंधन को लेकर आयोग की सिफारिशों को ध्यान में रखते हुए सावधानी बरती जा रही है।
कुछ रिपोर्टों के अनुसार, कोचिंग संस्थानों से कार्यक्रम में आने वाले छात्रों की सुरक्षा से जुड़ा लिखित आश्वासन लेने की शर्त भी रखी गई थी। कांग्रेस ने इस पर आपत्ति जताई और इसे छात्रों को कार्यक्रम में आने से रोकने की कोशिश बताया।
कांग्रेस ने लगाए दबाव बनाने के आरोप
कांग्रेस सांसद पवन खेड़ा ने सोशल मीडिया मंच एक्स पर आरोप लगाया कि ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम को रोकने के लिए प्रशासनिक शर्तों, धमकियों और दूसरे तरीकों का इस्तेमाल किया जा रहा है। उन्होंने राजीव गांधी की हत्या का संदर्भ दिए जाने और कोचिंग संस्थानों से छात्रों की सुरक्षा की जिम्मेदारी से जुड़े शपथपत्र लेने पर सवाल उठाया।
कांग्रेस का कहना है कि सरकार को छात्रों की आवाज सुननी चाहिए, न कि उनकी भागीदारी पर रोक लगाने की कोशिश करनी चाहिए। दूसरी ओर, भाजपा नेताओं ने कांग्रेस के आरोपों को खारिज करते हुए कार्यक्रम में छात्रों को बुलाने के तरीकों पर सवाल उठाए। कुछ भाजपा नेताओं ने इसे राजनीतिक आयोजन बताते हुए कांग्रेस पर युवाओं को प्रभावित करने का आरोप लगाया।
इंदौर के इस कार्यक्रम में राहुल गांधी ने शिक्षा और रोजगार से जुड़े छात्रों के सवालों को विपक्षी राजनीति के बड़े मुद्दे के रूप में पेश किया। हालांकि, शिक्षा बजट, स्कूलों की संख्या, छात्रवृत्ति और रिक्त पदों से जुड़े उनके कई आंकड़ों को समझने के लिए आधिकारिक स्रोतों, वर्षवार आंकड़ों और इस्तेमाल किए गए आधार की अलग से जांच जरूरी है।
रिपोर्ट : मोहम्मद इस्माइल.
