19 सितंबर 2026 की शाम थी। पूर्वी जावा के पोनागोरो में पोंडोक मॉडर्न दारुस्सलाम गोंटोर अपने 100 साल पूरे होने का जश्न मना रहा था। हज़ारों छात्र, उस्ताद, अलुमनी और मेहमान मौजूद थे। मंच पर इंडोनेशिया के राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांतो खड़े थे — और उन्होंने भाषण की शुरुआत ही एक ऐसे नारे से की जो पूरे हॉल में गूँज उठा: “Free Palestine! Free Palestine! Free Palestine!”
कुफ़िया, आँसू और एक संकल्प
जैसे ही प्रबोवो ने फ़िलिस्तीन के ज़िक्र के साथ यह नारा लगाया, फ़िलिस्तीनी राजदूत अब्दुल फ़त्ताह A.K. अल-सत्तारी अपनी सीट से उठे, मंच के पास आए और प्रबोवो के गले में कुफ़िया डाल दी — वही पारंपरिक स्कार्फ जो फ़िलिस्तीनी पहचान और संघर्ष की निशानी मानी जाती है। दोनों ने एक-दूसरे को गले लगाया; प्रबोवो ने कुफ़िया पहन ली और कुछ देर बाद मंच पर लौटकर उसी से आँखें पोंछते हुए भावुक होते दिखाई दिए।
उनके शब्द साफ़ थे: फ़िलिस्तीनी भाई-बहन लगातार हमलों, बमबारी और तबाही का शिकार हैं, और इंडोनेशिया जैसे देश के लिए यह तकलीफदेह है कि हम मदद करने में “बेबस” महसूस करते हैं। मगर सिर्फ़ हमदर्दी काफी नहीं — असली ज़रूरत है कि इंडोनेशिया मज़बूत बने, ताकि ज़ुल्म के शिकार लोगों की मदद कर सके।
“कमज़ोर क़ौम को कुचला जाता है” — आत्मनिर्भरता की गुहार
प्रबोवो ने गोंटोर के उस्तादों और छात्रों से कहा: “अगर हम मज़बूत होंगे, तभी हम उन भाई-बहनों की मदद कर पाएँगे जो किसी दूसरे रेजीम के ज़ुल्म में हैं।” उनका संदेश सीधा था — राष्ट्रीय ताक़त की नींव आत्मनिर्भरता है। खासकर खाद्य सुरक्षा: इंडोनेशिया के पास कुदरती दौलत भरपूर है, फिर भी किसी को भूखा-गरीब नहीं रहना चाहिए।
उन्होंने जोर दिया कि आज़ादी का मतलब सिर्फ़ झंडा नहीं, बल्कि यह भी है कि क़ौम अपनी ज़रूरतें खुद पूरी करे, अपने संसाधनों को संभाले और अपने दम पर खड़ी हो। यही वजह है कि वे बार-बार “पढ़ो, सीखो, गहन ज्ञान हासिल करो” की बात कर रहे थे — क्योंकि बिना ज्ञान और खुले दिमाग के मज़बूती अधूरी है।
गोंटोर से राजनीति नहीं, पर राजनीति को समझना ज़रूरी
इसी मंच से प्रबोवो ने गोंटोर की एक पुरानी नीति को भी याद दिलाया: गोंटोर प्रैक्टिकल पॉलिटिक्स से ऊपर रहे, किसी एक ग्रुप के पीछे न लगे — मगर पॉलिटिक्स को समझे ज़रूर। उनका कहना था: “गोंटोर कहीं का नहीं, मगर हर जगह का हो।” साथ ही उन्होंने गोंटोर के पंच जीवा — ईमानदारी, सादगी, अनुशासन जैसे मूल्यों — को दोबारा सामने लाया और कहा कि जब किसी को ज़िम्मेदारी मिले, तो वह चोरी-छिपे फ़ायदे न सोचे।
फ़िलिस्तीन, इंडोनेशिया और दो-राज्य समाधान: बड़ी तस्वीर
प्रबोवो की इस भाषण को उनके पिछले साल (2025) की UN भाषण के संदर्भ में भी देखा जा रहा है, जहाँ उन्होंने दो-राज्य समाधान का समर्थन करते हुए कहा था कि दुनिया को फ़िलिस्तीन की आज़ादी के साथ-साथ इसराइल की सुरक्षा भी सुनिश्चित करनी होगी — तभी “असली शांति” संभव है। इसका मतलब यह नहीं कि वे एक तरफ़दारी कर रहे हैं; बल्कि उनका रुख यह रहा है कि इंडोनेशिया शांति प्रक्रिया में सक्रिय भूमिका चाहता है — चाहे वह “Board of Peace” हो या UN-मैंडेटेड International Stabilization Force में शांति सेना का योगदान।
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, इंडोनेशिया ने 2025–2026 में गाज़ा शांति सेना के लिए 5,000–8,000 (पहले 20,000 तक) सैनिक तैयार करने की बात कही; फरवरी 2026 तक 1,000 सैनिक अप्रैल तक डिप्लॉयमेंट के लिए तैयार बताए गए। तो “आज ऑफ़र” जैसी लाइन सही समय-रेखा नहीं देती — मामला पहले से चल रहा है और कूटनीतिक चर्चा का हिस्सा है।
आख़िर में: नारा सिर्फ़ नारा नहीं, एक दिशा है
गोंटोर के मंच पर “Free Palestine” का नारा सिर्फ़ जुमला नहीं था; यह एक राष्ट्रीय दिशा-निर्देश जैसा था — कि इंडोनेशिया को अपने दम पर खड़ा होना होगा, वरना दूसरों की मदद का सपना अधूरा रहेगा। प्रबोवो की आवाज़ में जो भावुकता थी, वह फ़िलिस्तीन के दर्द से जुड़ी थी; मगर उनका संदेश इंडोनेशिया के युवा, उस्ताद और उलेमा के लिए भी था — कि ज्ञान, अनुशासन और आत्मविश्वास से ही क़ौम मज़बूत बनती है।
रिपोर्ट : इस्मा टाइम्स न्यूज़ डेस्क.
