गोवालपारा, असम । असम के गोवालपारा जिले में 6 सितंबर 2026 की सुबह हुई प्रशासनिक कार्रवाई ने जमीन के इस्तेमाल, जल निकासी और बेदखली की प्रक्रिया को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। कृष्णई इलाके के माटिया राजस्व चक्र के अंतर्गत आने वाले पांच गांवों में प्रशासन ने 73 मकानों को ढहा दिया।
जिन इलाकों में कार्रवाई की गई, उनमें खारीजा पाइकन/मानिकपुर, खमार मानिकपुर, भोजमाला पार्ट-II, जाटशरबाड़ी और तेंगाबाड़ी शामिल हैं। जिला प्रशासन के अनुसार, ये मकान कृषि भूमि पर बिना आवश्यक भूमि-उपयोग परिवर्तन की अनुमति के बनाए गए थे। अधिकारियों का यह भी कहना है कि निर्माण के कारण प्राकृतिक जल निकासी और आसपास के जलाशयों पर असर पड़ रहा था।
हालांकि, कार्रवाई के तरीके को लेकर प्रभावित परिवारों ने आपत्ति जताई है। उनका कहना है कि उन्हें बहुत कम समय का नोटिस दिया गया और अपनी बात रखने या जमीन से संबंधित कागजात दिखाने का पर्याप्त अवसर नहीं मिला। कुछ परिवारों ने यह भी दावा किया कि उनके पास जमीन से जुड़े दस्तावेज मौजूद थे।
प्रशासन ने भूमि और जल निकासी को बताया वजह
गोवालपारा प्रशासन का कहना है कि अभियान का उद्देश्य किसी समुदाय को निशाना बनाना नहीं, बल्कि कृषि भूमि और प्राकृतिक जल स्रोतों को बचाना है।
जिला आयुक्त प्रदीप तिमुंग के अनुसार, कृषि भूमि पर खेती किए जाने से प्रशासन को कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन वहां बड़े पैमाने पर आवासीय निर्माण होने से पानी के प्राकृतिक बहाव पर असर पड़ सकता है। अधिकारियों का दावा है कि कुछ स्थानों पर जल निकासी बाधित होने से जलभराव और कृषि भूमि के प्रभावित होने का खतरा बढ़ रहा था।
प्रशासन के मुताबिक, क्षेत्र में दूसरे जिलों से आकर भी लोगों के बसने के मामले सामने आए हैं। अधिकारियों ने दर्रंग, बारपेटा, धुबरी और मानकाचार जैसे जिलों से लोगों के आने का उल्लेख किया है।
भूमि उपयोग नियमों को लेकर प्रशासन की दलील
प्रशासन का कहना है कि कृषि भूमि को आवासीय इस्तेमाल में बदलने के लिए निर्धारित प्रक्रिया के तहत अनुमति लेना जरूरी है। इसी आधार पर संबंधित परिवारों को जगह खाली करने के लिए नोटिस जारी किए गए।
अधिकारियों के अनुसार, प्रभावित लोगों को 24 घंटे का समय दिया गया था। प्रशासन का दावा है कि नोटिस के बाद भी जब मकान खाली नहीं किए गए, तब कार्रवाई की गई।
प्रभावित परिवारों ने उठाए प्रक्रिया पर सवाल
दूसरी ओर, प्रभावित परिवारों और कुछ स्थानीय संगठनों ने कार्रवाई को कठोर और एकतरफा बताया है। उनका आरोप है कि कई परिवारों के पास जमीन से संबंधित पट्टा या अन्य दस्तावेज थे, लेकिन इसके बावजूद उनके मकानों को गिरा दिया गया।
परिवारों का कहना है कि 24 घंटे के भीतर घर खाली करना, घरेलू सामान सुरक्षित स्थान पर ले जाना और रहने की वैकल्पिक व्यवस्था करना व्यावहारिक रूप से बेहद मुश्किल था।
उनका यह भी कहना है कि उन्हें प्रशासन के सामने अपने दस्तावेज रखने और अपनी स्थिति स्पष्ट करने का पर्याप्त अवसर नहीं मिला। प्रभावित लोगों की ओर से मुआवजे और वैकल्पिक आवास की मांग भी उठाई गई है।
कुछ संगठनों ने इस कार्रवाई को सांप्रदायिक नजरिए से भी देखने की कोशिश की है और आरोप लगाया है कि ऐसे अभियान मुस्लिम बहुल इलाकों में अधिक दिखाई देते हैं। हालांकि, प्रशासन ने इस आरोप को खारिज करते हुए कहा है कि कार्रवाई का आधार धर्म नहीं, बल्कि भूमि और पर्यावरण से जुड़े नियम हैं।
नॉर्थ ईस्ट माइनॉरिटी स्टूडेंट्स यूनियन के नूरुल इस्लाम ने भी कार्रवाई पर सवाल उठाते हुए कहा कि जमीन को सरकारी बताने के बजाय उसे कृषि श्रेणी में दर्ज किया गया था और केवल इसी आधार पर परिवारों को बेघर करना उचित नहीं माना जा सकता।

गौहाटी हाईकोर्ट ने कार्रवाई पर उठाए गंभीर सवाल
मामले में 7 सितंबर को गौहाटी हाईकोर्ट में भी सुनवाई हुई। अदालत ने प्रथम दृष्टया इस बात पर सवाल उठाया कि निजी या पट्टा भूमि पर बने मकानों को बिना उचित सुनवाई के कैसे गिराया जा सकता है।
अदालत ने यह भी जानना चाहा कि ऐसी तत्काल कार्रवाई की जरूरत आखिर क्यों पड़ी और प्रशासन के नोटिस में किस तरह के तात्कालिक खतरे का उल्लेख किया गया था।
न्यायमूर्ति देवाशीष बरुआ की पीठ ने प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत यानी प्रभावित व्यक्ति को अपनी बात रखने का अवसर दिए जाने के सवाल पर भी गौर किया। अदालत के समक्ष असम के भूमि संबंधी वर्ष 2015 के प्रावधानों का भी उल्लेख हुआ, जिनके तहत कुछ परिस्थितियों में एक बीघा तक कृषि भूमि पर व्यक्ति के अपने निवास के लिए दो मंजिला मकान बनाने के मामले में उपायुक्त की अनुमति से जुड़े प्रावधान लागू नहीं होते।
अदालत ने फिलहाल आगे की कार्रवाई पर रोक लगाते हुए राज्य सरकार से जवाब मांगा है। मामले की अगली सुनवाई 11 सितंबर 2026 को होनी है।
अब निगाहें अदालत की अगली सुनवाई पर
गोवालपारा की यह कार्रवाई अब केवल 73 मकानों तक सीमित मामला नहीं रह गई है। इसमें भूमि उपयोग नियमों के पालन, प्राकृतिक जल स्रोतों की सुरक्षा और प्रशासनिक कार्रवाई की प्रक्रिया जैसे कई महत्वपूर्ण सवाल सामने आए हैं।
एक तरफ प्रशासन का तर्क है कि कृषि भूमि और जल निकासी व्यवस्था को बचाने के लिए समय रहते अवैध निर्माण रोकना जरूरी है। दूसरी ओर प्रभावित परिवारों का कहना है कि किसी भी कार्रवाई से पहले उन्हें पर्याप्त नोटिस, सुनवाई और अपने दस्तावेज पेश करने का अवसर मिलना चाहिए था।
स्थानीय संगठनों की ओर से मुआवजे और पुनर्वास की मांग भी की जा रही है। अब 11 सितंबर की सुनवाई में राज्य सरकार अदालत के सामने अपनी कार्रवाई का क्या आधार रखती है, इस पर सबकी नजर रहेगी।
इस मामले का आगे का फैसला यह भी तय करने में महत्वपूर्ण हो सकता है कि भूमि संरक्षण और अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई के दौरान प्रशासनिक अधिकारों और प्रभावित नागरिकों के अधिकारों के बीच संतुलन किस तरह बनाया जाए।
रिपोर्ट : इस्मा टाइम्स न्यूज़ डेस्क.
