बिहार प्रदेश, 14 सितंबर 2026। हिंदी दिवस के अवसर पर स्थानीय डॉक्टर विवेकानंद पथ पर एक कार्यक्रम का आयोजन किया गया। समारोह में हिंदी की वर्तमान स्थिति, उसके सामाजिक महत्व और शिक्षा व्यवस्था में उसकी भूमिका को लेकर वक्ताओं ने अपने विचार रखे। कार्यक्रम में हिंदी दिवस को महज उत्सव के रूप में मनाने के बजाय इसे आत्ममंथन का अवसर बनाने पर जोर दिया गया।
विभिन्न सामाजिक संगठनों से जुड़े कौटिल्य मंच के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. विवेकानंद मिश्र ने कहा कि हिंदी ने देश के आम जनमानस को एकता के सूत्र में बांधने के साथ-साथ स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान क्रांतिकारियों में ऊर्जा और उत्साह पैदा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। ऐसे में इस गौरवशाली भाषा की उपेक्षा को गंभीर विषय मानकर इस पर विचार करने की जरूरत है।
उन्होंने कहा कि हिंदी महज संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति और सामूहिक चेतना की महत्वपूर्ण वाहक है। हिंदी को केवल अतीत की विरासत के तौर पर देखने के बजाय वर्तमान और भविष्य की जरूरतों से जोड़कर आगे बढ़ाने की आवश्यकता है।
शिक्षा व्यवस्था में हिंदी की स्थिति पर उठे सवाल
कार्यक्रम में आचार्य सच्चिदानंद मिश्र ने कहा कि भारत ने लंबे समय तक विभिन्न चुनौतियों का सामना करते हुए अपनी मानवीय संवेदनाओं और नैतिक मूल्यों को बनाए रखा है। उनका कहना था कि स्वतंत्रता के बाद हिंदी को व्यापक अवसर देकर उसकी सरलता, सहजता और व्यापक पहुंच को दुनिया के सामने प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया जाना चाहिए था।
उन्होंने शिक्षा व्यवस्था में अंग्रेजी के बढ़ते प्रभाव पर चिंता जताते हुए कहा कि प्राथमिक शिक्षा से लेकर विश्वविद्यालय स्तर तक हिंदी को वह स्थान नहीं मिल पाया, जिसकी वह अधिकारी है। उनके मुताबिक शिक्षा के माध्यम को लेकर असंतुलन का असर विद्यार्थियों की सोच, संकल्पना शक्ति और व्यावहारिक वैचारिक क्षमता पर भी पड़ सकता है।
हिंदी दिवस को औपचारिकता तक सीमित न रखने की अपील
वरिष्ठ अधिवक्ता याहिया ने कहा कि हिंदी दिवस को केवल एक दिन के औपचारिक आयोजन तक सीमित नहीं किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि हिंदी के प्रति वास्तविक सम्मान तभी होगा, जब समाज और संस्थाएं उसके विकास तथा इस्तेमाल को लेकर गंभीर प्रयास करें।
अधिवक्ता पूनम कुमारी ने कहा कि हिंदी को उसका उचित स्थान दिलाने के लिए ईमानदारी से आत्ममंथन करना जरूरी है। उन्होंने कहा कि हिंदी दिवस का उद्देश्य केवल कार्यक्रम आयोजित करना नहीं, बल्कि यह विचार करना भी होना चाहिए कि हिंदी को शिक्षा, प्रशासन और सामाजिक जीवन में उसका उचित अधिकार कैसे दिलाया जाए।
बड़ी संख्या में लोगों ने कार्यक्रम में लिया हिस्सा
कार्यक्रम में विभिन्न सामाजिक क्षेत्रों से जुड़े लोगों की मौजूदगी रही। इनमें ज्योति देवी, स्वामी सुमन गिरि, डॉ. रविंद्र कुमार, विजय बाबू, गायब, संदीप मिश्रा, सनोज देवी, महेश मिश्रा, सुगनी देवी, रवि कुमार, दिव्या, प्रवेश, जितेंद्र मिश्रा, करइल मांझी, मनीष मिश्रा, शिवदास जी, गुड़िया देवी, पूनम कुमारी अधिवक्ता, दीपक पाठक, दिलीप कुमार, शंभू गिरी, नीरज वर्मा, प्रीति कुमारी, गौरव सिंह, रामकेवल सिंह, शिवजी, गजेंद्र सिंह, डिंपल कुमारी, मनीष कुमार, मृदुला मिश्रा, डॉ. ज्ञानेश भारद्वाज, शंभू कुमार, डॉ. अकेला, शंभू लाल, गुर्दा, चंद्रभूषण मिश्रा, अशोक कुमार, रंजीत पाठक, पवन मिश्रा, सगीर साहब, रिंकू देवी, सुमन कुमारी, ममता कुमारी, शीतल चौबे, रंजन पांडे, पार्वती देवी, पुष्पा देवी और फूल कुमारी, प्यारी देवी सहित अन्य लोग शामिल रहे।
कार्यक्रम में वक्ताओं ने इस बात पर जोर दिया कि हिंदी को सम्मान देने का वास्तविक अर्थ उसके प्रयोग को बढ़ावा देना और आने वाली पीढ़ियों के लिए इसे ज्ञान, शिक्षा और विचार-विमर्श की प्रभावी भाषा बनाना है। वक्ताओं के अनुसार हिंदी दिवस इसी दिशा में आत्ममंथन और ठोस प्रयास की शुरुआत का अवसर होना चाहिए।
रिपोर्ट : विश्वनाथ आनंद.
