गया, बिहार | 28 अगस्त 2026: गया की पावन भूमि स्थित डॉक्टर विवेकानंद पथ पर संस्कृत दिवस के अवसर पर भारतीय संस्कृति, सनातन परंपरा और संस्कृत भाषा के संरक्षण एवं संवर्धन को लेकर एक विशेष सभा आयोजित की गई। कार्यक्रम का आयोजन डॉ. विवेकानंद मिश्र के आवास पर हुआ।
विश्व संस्कृत दिवस समारोह का आयोजन भारतीय राष्ट्रीय ब्राह्मण महासभा और कौटिल्य मंच के संयुक्त तत्वावधान में किया गया। इसमें विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े विद्वान, आचार्य, समाजसेवी और गणमान्य लोग शामिल हुए तथा संस्कृत भाषा के महत्व पर अपने विचार रखे।
संस्कृत भारतीय ज्ञान परंपरा की आधारशिला: डॉ. विवेकानंद मिश्र
महासभा एवं कौटिल्य मंच के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. विवेकानंद मिश्र ने कहा कि संस्कृत को केवल एक भाषा के तौर पर देखना उचित नहीं है। यह भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा की महत्वपूर्ण आधारशिला रही है।
उन्होंने कहा कि वेद, उपनिषद, पुराण, दर्शन, आयुर्वेद, ज्योतिष और अनेक शास्त्रीय ग्रंथों के निर्माण एवं संरक्षण में संस्कृत की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। संस्कृत दिवस के माध्यम से समाज को अपनी उस समृद्ध परंपरा को याद करने का अवसर मिलता है, जिसने सदियों से भारतीय चिंतन, अध्यात्म और संस्कृति को दिशा दी है।
डॉ. मिश्र ने संस्कृत को वेद और विज्ञान की भाषा बताते हुए कहा कि इसके संरक्षण को गंभीरता से लेने की जरूरत है। उन्होंने आधुनिक शिक्षा और बदलती सामाजिक परिस्थितियों पर भी चिंता जताई और कहा कि संस्कृत से दूरी बढ़ने के साथ समाज अपनी सांस्कृतिक जड़ों से भी दूर होता जा रहा है।
उन्होंने कहा कि संस्कृत का संरक्षण सिर्फ एक पुरानी भाषा को बचाना नहीं है, बल्कि इसके साथ जुड़ी भारतीय ज्ञान परंपरा, संस्कार और सांस्कृतिक चेतना को आगे बढ़ाना भी है।
‘सर्वे भवंतु सुखिनः’ को सामाजिक जीवन से जोड़ने की जरूरत
डॉ. विवेकानंद मिश्र ने भारतीय परंपरा में प्रचलित ‘सर्वे भवंतु सुखिनः’ की भावना का उल्लेख करते हुए कहा कि यह केवल बोलने या लिखने वाला वाक्य नहीं था, बल्कि सामाजिक व्यवहार और मानवीय जीवन का हिस्सा रहा है।
उन्होंने नई पीढ़ी को संस्कृत के अध्ययन के लिए प्रेरित करने और युवाओं में इसके प्रति दिलचस्पी पैदा करने की आवश्यकता पर विशेष जोर दिया।
संस्कृत को शिक्षा और युवा पीढ़ी से जोड़ने की अपील
आचार्य सच्चिदानंद मिश्र ‘नैकी’ ने संस्कृत की वैज्ञानिकता, शास्त्रीय गरिमा और भारतीय जीवन पर उसके व्यापक प्रभाव पर अपने विचार रखे। उन्होंने संस्कृत को भारतीय मनीषा की ऐसी अमूल्य धरोहर बताया, जिसके जरिए ज्ञान, दर्शन और अध्यात्म की परंपरा पीढ़ियों तक पहुंचती रही है।
उन्होंने संस्कृत के अध्ययन को केवल पाठ्यक्रम तक सीमित रखने के बजाय इसे आत्मबोध और सांस्कृतिक चेतना से जोड़ने की बात कही।
पंडित राधा मोहन मिश्र ‘माधव’ ने कहा कि समाज में संस्कृत के प्रति जागरूकता बढ़ाने और युवाओं को इसके अध्ययन के लिए प्रोत्साहित करने की जरूरत है। उन्होंने संस्कृत को भारतीय संस्कारों और ज्ञान परंपरा से जोड़ने वाली महत्वपूर्ण कड़ी बताया।
सभा में शामिल भारतीय जन क्रांति दल के राष्ट्रीय महासचिव ने भी संस्कृत के प्रचार-प्रसार, अध्ययन-अध्यापन और संरक्षण को लेकर गंभीर पहल की आवश्यकता बताई। उन्होंने कहा कि संस्कृत को केवल धार्मिक ग्रंथों और अनुष्ठानों तक सीमित रखने के बजाय आधुनिक शिक्षा और युवा पीढ़ी के बीच भी इसका दायरा बढ़ाया जाना चाहिए।
संस्कृत के संरक्षण में समाज की भूमिका महत्वपूर्ण
समाजसेवी एवं व्यवसायी श्री चरण बाबू डालमिया ने कहा कि संस्कृत दिवस के मौके पर आयोजित यह कार्यक्रम भारतीय ज्ञान परंपरा के प्रति सम्मान और संस्कृत भाषा के प्रति जागरूकता बढ़ाने का माध्यम बने, यही इसकी सार्थकता है।
पंडित बालमुकुंद मिश्रा ने उपस्थित लोगों से संस्कृत के अध्ययन, संरक्षण और संवर्धन के लिए लगातार प्रयास करने का संकल्प लेने की अपील की।
वहीं, डॉ. ज्ञानेश भारद्वाज ने संस्कृत को भारतीय संस्कृति की वाणी और ज्ञान परंपरा की महत्वपूर्ण धरोहर बताया। उन्होंने कहा कि संस्कृत का संरक्षण केवल अतीत को सुरक्षित रखने तक सीमित नहीं है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ना भी हमारी जिम्मेदारी है।
संस्कृत दिवस को जागरूकता का अवसर बताया
कार्यक्रम के समापन पर भारतीय जन क्रांति दल की वरिष्ठ सदस्य एवं समाजसेवी डिंपल कुमारी ने समारोह में शामिल सभी लोगों के प्रति आभार व्यक्त किया। उन्होंने संस्कृत दिवस की उपयोगिता पर चर्चा करते हुए कहा कि ऐसे आयोजनों के जरिए समाज में जागरूकता पैदा करने का अवसर मिलता है।
वरिष्ठ अधिवक्ता याहिया ने कहा कि भारतीय संस्कृति को जीवंत रखने वाली प्राचीन भाषा संस्कृत के संरक्षण की जिम्मेदारी केवल सरकार पर नहीं छोड़ी जा सकती। आम लोगों के बीच संस्कृत के प्रचार-प्रसार और इसके प्रति जागरूकता बढ़ाने के लिए सामाजिक स्तर पर भी प्रयास जरूरी हैं।
समारोह में बड़ी संख्या में लोग रहे मौजूद
समारोह में राजीव नयन पाण्डेय, स्वामी सुमन गिरी, अरुण मिश्रा मधुप, प्रचंड बाबा, आचार्य अभय पाठक, हरि नारायण त्रिपाठी, संदीप मिश्र, रूबी कुमारी, महेश मिश्रा, डॉ. विनोद कुमार मिश्रा, आनंद कुमार, मुन्ना जी, उत्तम पाठक, मनीष मिश्रा, नीलम कुमारी, आचार्य सुनील पाठक, अमरनाथ मिश्र, डॉ. रविंद्र कुमार, रंजीत पाठक, पवन मिश्रा, किरण पाठक, सुनीता देवी, ममता देवी, शंभू मिश्रा, अच्युत अनंत मराठे, कविता रावत, इंद्रदेव मांझी, करईल मांझी, सुमो चक्रवर्ती, विश्वजीत चक्रवर्ती, अरुण ओझा, चंद्रभूषण मिश्रा, रजनी चावला, पुष्पा देवी, रश्मि पांडे, रंजना, अर्चना कुमारी, गिरीश मिश्रा, गोपाल प्रसाद, पिंकी, जितेंद्र मिश्र, अजय मिश्रा, दीपक पाठक, मनीष कुमार, सुनील कुमार, सोनी कुमारी, जितेंद्र ठाकुर, प्रोफेसर सुनील कुमार मिश्र, नुसरत परवीन, डॉ. जितेंद्र कुमार मिश्र, राखी कुमारी, अशोक दूबे, हरिद्वार मिश्र, दीपक कुमार शर्मा, शिला त्रिपाठी, राजेश त्रिपाठी, सुनीला देवी, संतोष पाठक, गौरव कुमार, विभाष चंद्र मिश्रा, रश्मि मिश्रा, शिव शंकर प्रसाद, राम लखन सिंह, राम केवल सिंह, रामाशंकर मिश्र, सुनील कुमार, रंजीत मिश्रा, नीरज कुमार वर्मा, सुमन कुमारी, कुंदन मिश्र, दिलीप कुमार, शीतल, पुष्पलता चौबे, शंभू गिरी, प्यारी देवी, अमित देवी, पवन कुमार, गिरिजा देवी, शिव जी, ऋतिक कुमार, सत्यम कुमार, पवन पाठक, शंभू लाल गुर्दा, जसीम अहमद, राजीव किशोर और गणेश मिश्रा समेत कई लोग मौजूद रहे।
कार्यक्रम में वक्ताओं ने एक स्वर में संस्कृत भाषा को आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने और भारतीय ज्ञान एवं सांस्कृतिक परंपरा के संरक्षण के लिए सामाजिक स्तर पर निरंतर प्रयास किए जाने की जरूरत बताई।
रिपोर्ट : विश्वनाथ आनंद.
