Dear Friends, भारतीय कॉरपोरेट दुनिया में अगले दस साल बहुत बड़ा बदलाव लाने वाले हैं। ज्यादातर बड़े व्यापारिक घरानों में पीढ़ी बदल रही है। बेटा या बेटी कंपनी संभालने को तैयार हो रहे हैं। लेकिन एक ऐसा नाम भी है जिसके पास अपना कोई खून का वारिस नहीं। 32000 करोड़ रुपये से ज्यादा की कीमत वाली कंपनी की मालकिन किरण मजूमदार शॉ। उनकी कोई संतान नहीं। तो फिर ये विशाल बिजनेस कौन संभालेगा? ये सवाल लंबे समय से सबके जेहन में घूम रहा था।
किरण मजूमदार शॉ की शुरुआत कैसे हुई
किरण मजूमदार शॉ का नाम सुनते ही बायोकॉन याद आ जाता है। 1978 में उन्होंने सिर्फ दस हजार रुपये से ये कंपनी शुरू की थी। बेंगलुरु में एक छोटे से जगह से। उस समय भारत में बहुत कम लोग बायोटेक के बारे में जानते थे। उन्होंने अमेरिका और यूरोप को एंजाइम निर्यात करने वाली देश की पहली कंपनी बनाई। धीरे-धीरे ये कंपनी बढ़ती गई और आज देश की सबसे बड़ी जेनेरिक एपीआई और बायोसिमिलर कंपनियों में शुमार हो गई।
किरण ने अपने करियर की भागदौड़ में प्यार के लिए भी समय निकाला। 1998 में उन्होंने स्कॉटिश व्यवसायी जॉन शॉ से शादी की। दोनों की मुलाकात 1990 के आसपास बेंगलुरु में हुई थी। जॉन यूरोपियन कंपनी में काम करते थे। दोनों में काफी समानताएं थीं। बाद में जॉन को यूरोप वापस बुला लिया गया, लेकिन किरण की याद उन्हें सताने लगी। उन्होंने समय से पहले रिटायरमेंट ले लिया और किरण से शादी कर ली। दोनों साथ मिलकर बायोकॉन को नई ऊंचाइयों पर ले गए। जॉन कंपनी के वाइस चेयरमैन भी रहे।
दुख की बात ये है कि अक्टूबर 2022 में जॉन शॉ का निधन हो गया। उस समय उनकी उम्र 73 साल थी। किरण अब खुद 70 के पार हैं। उनकी कोई संतान नहीं है। इसलिए लंबे समय तक ये सवाल बना रहा कि बायोकॉन का भविष्य क्या होगा। कुछ लोग कहते थे कि कंपनी प्रोफेशनल्स के हाथ में चली जाएगी। कुछ का कहना था कि रतन टाटा की तरह कोई ट्रस्ट बना दिया जाएगा। लेकिन हाल ही में सबकी जिज्ञासा खत्म हो गई।
उत्तराधिकारी का ऐलान हो गया
मई 2026 में किरण मजूमदार शॉ ने साफ कर दिया। उन्होंने अपनी भतीजी क्लेयर मजूमदार को अपना उत्तराधिकारी चुना है। क्लेयर उनकी भाई रवि मजूमदार की बेटी हैं। रवि बायोकॉन में नॉन-एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर हैं। किरण ने कहा कि वे बायोकॉन की एकमात्र मालकिन हैं और उन्हें कंपनी को अच्छे हाथों में सौंपना है। क्लेयर ने साबित कर दिया है कि वह कंपनी चला सकती हैं।
ये फैसला अचानक नहीं आया। किरण ने एक चरणबद्ध योजना बनाई है। अगले पांच साल में क्लेयर धीरे-धीरे जिम्मेदारियां संभालेंगी। पहले डायरेक्टर, फिर वाइस चेयर और फिर चेयरपर्सन। किरण ने साफ कहा कि वे अभी अपने जूते नहीं उतार रही हैं। वे सक्रिय रहेंगी और क्लेयर को तैयार करेंगी।
क्लेयर मजूमदार कौन हैं
क्लेयर की उम्र करीब 37 साल है। वे सिर्फ परिवार की बेटी नहीं, बल्कि खुद एक सफल बायोटेक विशेषज्ञ हैं। उन्होंने एमआईटी से बायोलॉजिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की। स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी से कैंसर बायोलॉजी में पीएचडी और एमबीए किया। पहले उन्होंने थर्ड रॉक वेंचर्स और रियोस मेडिसिन में काम किया। बाद में बायोकॉन की मदद से बिकारा थेरेप्यूटिक्स नाम की कंपनी शुरू की। ये कैंसर की नई दवाओं पर काम करने वाली कंपनी है। 2024 में ये कंपनी नैस्डैक पर लिस्ट हो गई। कठिन समय में भी क्लेयर ने पूंजी जुटाई और कंपनी को आगे बढ़ाया।
किरण का मानना है कि क्लेयर ने अपनी मेहनत और समझ से ये मुकाम हासिल किया है। इसलिए वे योग्य हैं। साथ ही परिवार के अन्य सदस्य भी साथ रहेंगे। क्लेयर के भाई एरिक मजूमदार कैलिफोर्निया इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी में प्रोफेसर हैं और एआई में माहिर हैं। क्लेयर के पति थॉमस रॉबर्ट्स मैसाचुसेट्स जनरल हॉस्पिटल से जुड़े हैं और हेल्थकेयर के जानकार हैं। परिवार बोर्ड स्तर पर सलाह देगा, लेकिन रोजमर्रा का काम प्रोफेशनल मैनेजमेंट संभालेगा।

बायोकॉन का भविष्य कैसा दिखता है
किरण मजूमदार शॉ ने हमेशा विज्ञान और तकनीक पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि बायोकॉन अब एडवांस्ड बायोटेक्नोलॉजी और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की दिशा में आगे बढ़ेगा। उनकी दृष्टि साफ है—दवाओं को सस्ता और सुलभ बनाना। अब नई पीढ़ी को ये जिम्मेदारी सौंपी जा रही है।
भारतीय कॉरपोरेट जगत में ये एक अलग मिसाल है। ज्यादातर जगह बेटा या बेटी सीधे कंपनी संभाल लेते हैं। यहां स्किल और क्षमता को प्राथमिकता दी गई। क्लेयर को बाहर से तैयार किया गया, फिर अंदर लाया जा रहा है। ये तरीका कंपनी को लंबे समय तक मजबूत रख सकता है।
बाजार ने भी इस खबर को सकारात्मक माना। शेयरों में थोड़ी तेजी आई। निवेशक अब निश्चिंत हैं कि नेतृत्व का सवाल हल हो गया है। किरण ने कई बार दोहराया कि ट्रांजिशन जल्दबाजी में नहीं होगा। क्लेयर को अभी बिकारा में भी काम करना है। वे बायोकॉन की संस्कृति और कामकाज को अच्छी तरह समझेंगी।
एक महिला उद्यमी की प्रेरणा
किरण मजूमदार शॉ की कहानी सिर्फ बिजनेस की नहीं, संघर्ष और हौसले की भी है। उस समय जब महिलाओं को बिजनेस में जगह कम मिलती थी, उन्होंने बायोटेक का झंडा गाड़ दिया। आज वे भारत की सबसे सफल महिला उद्यमियों में गिनी जाती हैं। उनकी कंपनी हजारों लोगों को रोजगार देती है और दुनिया भर में दवाएं पहुंचाती है।
अब जब कोई खून का वारिस नहीं, तो भतीजी को चुनना एक समझदारी भरा फैसला है। क्लेयर ने अपनी योग्यता से ये जगह बनाई है। आने वाले सालों में बायोकॉन का सफर और रोचक होने वाला है। किरण अभी भी कमान संभाले हुए हैं और धीरे-धीरे बागडोर सौंप रही हैं। ये कहानी सिर्फ एक कंपनी की नहीं, बल्कि भारतीय उद्योग जगत में पीढ़ीगत बदलाव की मिसाल बन गई है।
अंत में यही कहना सही रहेगा कि जहां मेहनत और समझदारी हो, वहां रास्ता खुद बन जाता है। किरण मजूमदार शॉ ने ये साबित कर दिया। अब क्लेयर मजूमदार का दौर शुरू होने वाला है। बायोकॉन का भविष्य सुरक्षित हाथों में है।
रिपोर्ट : इस्मा टाइम्स न्यूज़ डेस्क.
