जब स्कूल के बच्चे सड़कों पर उतरे
हाल ही में उत्तर प्रदेश में एक अनोखा नज़ारा देखा गया: स्कूली बच्चे, जिनमें ज़्यादातर 2010 के बाद पैदा हुए “जेन अल्फ़ा” के हैं, सड़कों पर उतरकर अपने ही स्कूलों की बदहाली के ख़िलाफ़ आवाज़ उठा रहे थे। यह आंदोलन सिर्फ़ एक-दो ज़िलों तक सीमित नहीं रहा; लखनऊ से लेकर फतेहपुर, हमीरपुर, कन्नौज, उन्नाव और कानपुर तक, अलग-अलग मुद्दों पर छात्र प्रदर्शन करते दिखे।
किस-किस मुद्दे पर उठी आवाज़?
छात्रों की शिकायतें बुनियादी थीं, मगर उतनी ही गंभीर:
कई स्कूलों में शिक्षकों की भारी कमी, खासकर विज्ञान जैसे अहम विषयों में, जबकि बोर्ड की परीक्षाएं नज़दीक थीं।
टपकती छतें, जर्जर क्लासरूम, पंखों की कमी, साफ़ पेयजल की व्यवस्था न होना, फ़र्नीचर और शौचालय जैसी सुविधाओं का अभाव।
मिड-डे मील और हॉस्टल के खाने की गुणवत्ता पर सवाल, साथ ही कुछ जगहों पर स्टाफ के व्यवहार को लेकर भी शिकायतें।
स्कूल तक पहुंचने वाली सड़कों की ख़राब हालत; बारिश में कीचड़ और दलदल बन जाना।
लखनऊ में 250 छात्राओं ने मानव श्रृंखला बनाकर सड़क जाम की, फतेहपुर में करीब हज़ार छात्र-छात्राओं ने प्रदर्शन किया, हमीरपुर में students और अभिभावकों ने कलेक्ट्रेट तक तिरंगा यात्रा निकाली, और कन्नौज में छात्रों ने हॉस्टल में भूख हड़ताल तक की। कई जगहों पर प्रशासन के आश्वासन के बाद पंखे लगवाए गए, RO पानी की व्यवस्था हुई, टेबल-कुर्सी जुटीं, और कुछ मामलों में अधिकारी मौके पर पहुंचकर खाना चखकर गुणवत्ता जांचने लगे।
“स्कूल ठीक करो” अभियान और वीडियो का सिलसिला
छात्र प्रदर्शनों के बीच “कॉकरोच जनता पार्टी” (CJP) ने “स्कूल ठीक करो” अभियान शुरू किया और आम लोगों से सरकारी स्कूलों की स्थिति दिखाने वाले वीडियो साझा करने की अपील की। आम आदमी पार्टी (AAP) ने भी यूपी में इसी नाम से अभियान चलाते हुए दावा किया कि उसने 55 सरकारी स्कूलों के वीडियो सामने रखे हैं।
इसी माहौल में सोशल मीडिया पर ऐसे कई वीडियो वायरल हुए जिनमें स्कूल परिसर की गंदगी, टूटी दीवारें, शौचालय की दुर्दशा, कचरा-मलबा, और कभी-कभी बच्चों को नदी या जलभराव पार करके स्कूल जाते हुए दिखाया गया।
सरकार का जवाब: “बिना अनुमति प्रवेश और निजता का सवाल”
प्रशासन ने तुरंत कई ज़िलों—हापुड़, अयोध्या, बलरामपुर, आगरा, बलिया, बस्ती, आज़मगढ़ समेत—में आदेश जारी कर दिए कि स्कूलों में बिना अनुमति बाहरी लोग, यूट्यूबर्स और कंटेंट क्रिएटर्स प्रवेश नहीं करेंगे और न ही वीडियो रिकॉर्डिंग करेंगे। तर्क दिया गया कि इससे पढ़ाई प्रभावित हो सकती है और बच्चों की निजता (privacy) का सवाल है। लेकिन इसी बीच कई जगहों पर वीडियो बनाने वालों के ख़िलाफ़ FIRs दर्ज होने लगीं, और कुछ मामलों में गिरफ़्तारियां भी हुईं।
FIRs, धाराएं और गिरफ़्तारियां: कौन-कौन फंसा?
हाथरस: कुलदीप यादव का मामला
हाथरस के कुलदीप यादव ने सिकंदराराऊ के एक सिविलियन विद्यालय में गोबर, खुले स्थान, शौचालय और अन्य अव्यवस्थाएं दिखाते हुए करीब चार मिनट का वीडियो बनाया। वीडियो में स्कूल की प्रधानाचार्य भी समस्याएं बताती नज़र आईं—जैसे एक कमरे में कई कक्षाएं चलाना और सड़क के पास होने के कारण बच्चों की सुरक्षा का ख़तरा।
इसके बाद खंड शिक्षा अधिकारी ने कोतवाली में प्राथमिकी दर्ज कराई, आरोप लगाया कि वीडियो भ्रामक है और विभाग की छवि धूमिल हुई। कुलदीप को आईटी एक्ट की धारा 66(D) और बीएनएस (Bharatiya Nyaya Sanhita) की धारा 229(2) के तहत गिरफ़्तार किया गया। उनकी मां सुनीता यादव का कहना है कि उनके बेटे ने सिर्फ़ गंदगी दिखाई थी, ग़लत कुछ नहीं किया।
मेरठ: दो लोगों पर केस, फिर ज़मानत
मेरठ के सरधना में एक उच्च प्राथमिक विद्यालय में सरकारी किताबें फ़्लोर पर फैली और सीलन से ख़राब होती दिखाई गईं; बुनियादी ढांचे पर भी सवाल उठाए गए। शिक्षा विभाग ने वीडियो को भ्रामक कहकर FIR दर्ज करवाई; बीएनएस की धारा 353(2) और 356(2) के तहत केस बना और दो लोगों—एडवोकेट संयम पांचाल और अयान मिर्ज़ा—की गिरफ़्तारी हुई, हालांकि 24 घंटे के भीतर दोनों ज़मानत पर रिहा हो गए।
नोएडा, ग्रेटर नोएडा, देवरिया, अमेठी, रामपुर, मथुरा: सिलसिला बढ़ता गया
नोएडा: AAP युवा विंग के अध्यक्ष पंकज अवाना पर सेक्टर-51 के एक सरकारी स्कूल में बिना अनुमति प्रवेश और वीडियो बनाने का आरोप लगा; बीएनएस की धारा 333 समेत कई धाराओं में केस दर्ज हुआ।
ग्रेटर नोएडा: बादलपुर थाना क्षेत्र के एक माध्यमिक विद्यालय में आठ अज्ञात लोगों के बिना अनुमति वीडियो बनाने पर FIR।
देवरिया: युवा कार्यकर्ता रजत सिंह के ख़िलाफ़ गौरीबाज़ार थाने में केस; वीडियो में स्कूल परिसर में मलबा-कचरा दिखाया गया था। पुलिस का कहना था कि यह मलबा पहले ही अनुपयोगी घोषित भवन गिराए जाने के बाद पड़ा था और हटाने की प्रक्रिया चल रही है। रजत सिंह का सवाल था: “अगर कैमरे ने मलबा दिखाया तो ग़लत क्या है?”
अमेठी: एक अज्ञात व्यक्ति के ख़िलाफ़ केस, वीडियो AAP के सोशल मीडिया हैंडल पर मिला; आईटी एक्ट 66(D) और बीएनएस 353 के तहत शिकायत दर्ज।
रामपुर: बच्चों के नदी पार कर स्कूल जाने का वीडियो सामने आने पर पांच लोगों और एक अज्ञात शख़्स के ख़िलाफ़ बीएनएस 125 और 353 के तहत केस; प्रशासन का दावा है वीडियो भ्रामक है क्योंकि दूसरा रास्ता भी मौजूद था।
मथुरा: रवि कुमार के ख़िलाफ़ FIR; वीडियो में जलभराव के बीच बच्चों के स्कूल जाने का रास्ता दिखाया गया था। ज़िला पंचायत अधिकारी ने आरोप लगाया कि वीडियो से विभाग की छवि धूमिल करने की कोशिश हुई।
कन्नौज के एक मामले में तो यह भी कहा गया कि कुछ अज्ञात लोगों ने बच्चों को बिस्किट देकर प्रदर्शन के लिए उकसाया और सरकार की छवि ख़राब करने की कोशिश की; इसी आधार पर अज्ञात लोगों के ख़िलाफ़ बीएनएस की कई धाराओं में FIR दर्ज की गई।
सरकार की कार्रवाई: 14-बिंदु जांच सूची और अधिकारियों को निर्देश
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने 22 अगस्त को अधिकारियों के साथ बैठक में “भ्रामक वीडियो” पर नाराज़गी जताई और ऐसे लोगों के ख़िलाफ़ FIR समेत सख़्त कार्रवाई के निर्देश दिए। साथ ही, उन्होंने अधिकारियों को स्कूलों में जाकर मिड-डे मील, शौचालय, कक्षाओं आदि की स्थिति की जांच करने और ज़िलाधिकारियों को नियमित निरीक्षण का आदेश दिया।
बेसिक शिक्षा मंत्री संदीप सिंह ने कहा कि कुछ लोग सिर्फ़ नकारात्मकता तलाशकर विभाग में काम कर रहे लोगों का मनोबल गिराने की कोशिश कर रहे हैं, और दावा किया कि 2017 के बाद से बेसिक शिक्षा विभाग में बड़े सुधार हुए हैं।
दूसरी तरफ़, सरकार ने करीब 40,000 बेसिक और माध्यमिक स्कूलों के लिए 14-बिंदु जांच सूची जारी की है, जिसमें पेयजल, शौचालय, बिजली, सफ़ाई, भोजन, सुरक्षा, ब्लैकबोर्ड, यूनिफ़ॉर्म और शिक्षकों की उपस्थिति जैसे मुद्दे शामिल हैं। अधिकारियों को खामियों के कारण पहचानकर ज़िम्मेदारों को चिह्नित करने और समस्याएं सुलझाने के निर्देश मिले हैं।
विपक्ष और नागरिक आवाज़: “डराओगे तो रुकेंगे नहीं”
विपक्ष का कहना है कि सरकार एक तरफ़ स्कूलों की शिकायतों की जांच और सुविधाएं सुधारने की बात कर रही है, वहीं दूसरी तरफ़ उन लोगों पर क़ानूनी कार्रवाई हो रही है जो इन्हीं स्कूलों की तस्वीरें सार्वजनिक कर रहे हैं। AAP नेता संजय सिंह ने कहा कि सरकार FIRs के ज़रिए डर पैदा करने की कोशिश कर रही है, लेकिन लोग नहीं डरने वाले; वे स्कूलों की बदहाली की तस्वीरें दुनिया के सामने लाते रहेंगे।
नोएडा में पंकज अवाना का भी यही रवैया रहा: उनका कहना है कि वे स्कूलों की हालत दिखाना बंद नहीं करेंगे। देवरिया के रजत सिंह ने पूछा: “क्या किसी सरकारी स्कूल की ख़राब हालत दिखाने से पहले नागरिकों को सरकार की योजनाओं की पूरी सूची भी बतानी होगी?”
सवाल वही, जवाबदेही कहां?
जेन अल्फ़ा के इन प्रदर्शनों ने एक बार फिर उसी पुराने सवाल को ताज़ा कर दिया है: जब बच्चे अपने स्कूलों की बुनियादी मांगों के लिए सड़कों पर उतरें, तो जवाबदेही किसकी बनती है? सरकार ने जांच और सुधार के आदेश दिए हैं, मगर साथ ही वीडियो बनाने वालों पर क़ानूनी शिकंजा कसती दिख रही है। नागरिक और युवा कार्यकर्ताओं का कहना है कि वे डरने वाले नहीं, बल्कि सच्चाई सामने लाते रहेंगे।
असली परीक्षा तब होगी जब 14-बिंदु जांच सूची काग़ज़ से उतरकर ज़मीन पर उतरे, और जब हर उस वीडियो का जवाब सिर्फ़ FIR से नहीं, बल्कि सुधार से दिया जाए जिसमें बच्चे अपने भविष्य की बात कर रहे हों।
रिपोर्ट : इस्मा टाइम्स न्यूज़ डेस्क.
