पश्चिम बंगाल में पिछले कुछ हफ्तों से ईसाई समुदाय की प्रार्थना सभाओं पर हमलों की खबरें सामने आ रही हैं, जिसने पूरे देश में बहस छेड़ दी है। फैक्ट-चेकर मोहम्मद जुबैर ने अगस्त में दो वीडियो शेयर किए—एक उलुबेरिया (हावड़ा) का 23 अगस्त को और दूसरा अरामबाग चर्च का 10 अगस्त को—जिनमें हिंदुत्व समूहों द्वारा प्रार्थना स्थलों को तोड़ने और लोगों को परेशान करने का दावा किया गया। आलोचकों ने कहा कि ये घटनाएं उस वक्त सामने आईं जब केंद्रीय मंत्री भगवत 29 अगस्त को न्यूयॉर्क में भारत की “विविधता में एकता” और सभी धर्मों के सम्मान की बात कर रहे थे।
उलुबेरिया और अरामबाग: दो घटनाएं जो वायरल हुईं
उलुबेरिया, हावड़ा (23 अगस्त 2026)
उलुबेरिया में 23 अगस्त को हिंदुत्व समूह हिंदू संगठन (हिंदू संगठि) के सदस्यों ने एक निजी घर में चल रही ईसाई प्रार्थना सभा में घुसकर हंगामा किया। वीडियो में कुर्सियां तोड़ी हुई और जगह पूरी तरह अस्त-व्यस्त दिखाई देती है। हमलावरों का आरोप था कि ईसाई “हीलिंग” (इलाज) और प्रलोभन के जरिए धर्म परिवर्तन करवा रहे हैं—एक ऐसा दावा जो अक्सर बिना सबूत के लगाया जाता है।
अरामबाग चर्च (10 अगस्त 2026)
इससे पहले, 10 अगस्त को अरामबाग चर्च पर भी रविवार की पूजा के दौरान हमला हुआ, जिसकी वीडियो क्लिप सोशल मीडिया पर वायरल हुईं। इस घटना में भी भीड़ ने चर्च के अंदर घुसकर हंगामा किया और प्रार्थना में बाधा डाली।
“जबरन धर्म परिवर्तन” का आरोप: सबूत कहां है?
ईसाई समुदाय के नेताओं और समर्थकों का कहना है कि “जबरन धर्म परिवर्तन” का आरोप सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाला और सुविधाजनक हथियार बन गया है, लेकिन असली सबूत कहीं नहीं मिलता। सवाल यह है कि क्या कोई एक ऐसा व्यक्ति है जो वाकई जबरन धर्म बदलने पर मजबूर किया गया?
किसी को समझाया जाना या प्रेरित किया जाना “जबरन” नहीं है।
किसी का अपने मन से धर्म बदलना उसका संवैधानिक अधिकार है।
अगर वाकई जबरदस्ती का कोई मामला है, तो उसकी जांच होनी चाहिए और दोषियों को सजा मिलनी चाहिए।
लेकिन बिना सबूत के बार-बार “जबरन धर्म परिवर्तन” का रोना रोना और आम ईसाई पूजा-पाठ को शक की नजर से देखना दोहरे मापदंड जैसा लगता है।
पश्चिम बंगाल में बढ़ता तनाव: मई 2026 के बाद की स्थिति
मई 2026 में पश्चिम बंगाल में BJP की सरकार बनने के बाद से हावड़ा, बर्धमान, मेदिनीपुर और उत्तर 24 परगना जैसे जिलों में ऐसी घटनाएं लगातार सामने आ रही हैं।
16 अगस्त (मेदिनीपुर): एक निजी घर में प्रार्थना सभा पर हमला, 16 महिलाओं और 4 पुरुषों को हिरासत में लिया गया; 6 लोगों को जेल भेज दिया गया।
अगस्त की शुरुआत (उत्तर 24 परगना): चर्च में घुसकर बाइबिल और धार्मिक सामान तोड़ा गया, प्रार्थना करने वालों को मारा-पीटा गया।
बोलपुर (उत्तर नारायणपुर): पादर मंगल बाउरी और उनके बेटे को 30 लोगों की भीड़ ने बुरी तरह पीटा।
इन घटनाओं के बाद 23 अगस्त को कोलकाता के पास 5,000 से ज्यादा लोगों ने शांति रैली निकाली, जिसका आयोजन बंगिया क्रिस्तिया परिषद (BCP) ने किया।
धर्म की आजादी: संविधान क्या कहता है?
भारत के संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत हर नागरिक को अपने मन से धर्म चुनने, पूजा करने और प्रचार करने का अधिकार है—बशर्ते वह किसी और को जबरन धर्म बदलने पर मजबूर न करे।
लोगों को चर्च जाने, प्रार्थना करने और अपने विश्वास के मुताबिक जीने का पूरा हक है।
अगर किसी पर जबरदस्ती का आरोप है, तो सबूत के साथ पुलिस के पास जाएं, न कि भीड़ बनाकर हमला करें।
“एक जुबान से धर्म की आजादी की बात करना और दूसरी जुबान से दूसरों की धार्मिक आजादी छीनना” दोहरे मापदंड है।
आगे क्या होना चाहिए?
ईसाई नेताओं और नागरिक समूहों की मांग है कि:
तुरंत जांच: हर घटना की निष्पक्ष जांच हो और दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई हो।
पुलिस की भूमिका: पुलिस को पीड़ितों की सुरक्षा करनी चाहिए, न कि उन्हें ही हिरासत में लेना चाहिए।
राजनीतिक बयानबाजी बंद: धर्म के नाम पर राजनीति करना बंद हो, क्योंकि इससे समाज में नफरत फैलती है।
शांति और संवाद: सभी धर्मों के नेताओं को मिलकर शांति और भाईचारे का संदेश देना चाहिए।
पश्चिम बंगाल की ये घटनाएं सिर्फ ईसाई समुदाय के लिए नहीं, बल्कि पूरे देश के लिए एक चेतावनी हैं। धर्म इंसान के दिल और जमीर की बात है, न कि राजनीति का हथियार। अगर सबूत है, तो कानून के रास्ते जाएं; अगर नहीं, तो दूसरों की पूजा-पाठ में बाधा डालना बंद करें।
रिपोर्ट : इस्मा टाइम्स न्यूज़ डेस्क.
