अमेरिका की राजनीति में एक नई बहस छिड़ गई है: क्या भारतीय मूल के कुछ डोनर्स और नेटवर्क, जो RSS (राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ) से जुड़े माने जाते हैं, अमेरिकी चुनावी फंडिंग में असर डाल रहे हैं? इसी सवाल के बीच Hindus for Human Rights Action और SACRED Acts ने 1 सितंबर 2026 को ऐलान किया कि लगभग 90–100 अमेरिकी निर्वाचित अधिकारी और उम्मीदवार एक “Nonviolence Pledge” पर दस्तखत कर चुके हैं—जिसका सीधा मतलब है: वे RSS और उससे जुड़े संगठनों से आने वाला राजनीतिक चंदा नहीं लेंगे, और अगर मिला भी तो उसे वापस/प्रो‑डेमोक्रेसी संस्थाओं को दान कर देंगे।
यह पहल तब सामने आई जब RSS प्रमुख मोहन भागवत की उत्तर‑अमेरिका यात्रा चल रही थी और 29 अगस्त को न्यूयॉर्क में उनका बड़ा कार्यक्रम हुआ। उसी समय USCIRF (अमेरिका की धार्मिक स्वतंत्रता आयोग) ने भी भागवत की यात्रा पर चिंता जताई और वीज़ा रद्द करने समेत टारगेटेड सैंक्शन की सिफारिश की।
कौन‑कौन है इस संकल्प के पीछे?
HFHRA और SACRED Acts: दो अलग‑अलग संस्थाएं, एक ही मुद्दा
Hindus for Human Rights Action (HFHRA): यह Hindus for Human Rights (HfHR) का पॉलिटिकल आर्म है, जो 2019 में बना एक US‑आधारित नॉन‑प्रॉफिट है। यह संस्था pluralism, civil rights और human rights के नाम पर हिंदुत्व/कैस्ट‑आधारित भेदभाव के खिलाफ आवाज़ उठाती है।
SACRED Acts: इलिनॉयस‑आधारित SACRED (SACRED Democracy) का एक्टिविस्ट विंग, जिसके को‑फाउंडर/एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर Pushkar Sharma हैं। यह संस्था “just and inclusive democracy” के फ्रेम में काम करती है। दोनों ने मिलकर जो प्रेस रिलीज़ जारी किया, उसमें कहा गया: “अमेरिकी लोकतंत्र को सुपर‑रिच और उनके एक्सट्रिमिस्ट एजेंडे से नहीं खरीदा जाने दिया जाएगा।”
pledge के तीन वादे: हिंसा नहीं, RSS‑लिंक्ड पैसा नहीं, और वापसी
इस “Nonviolence Pledge” में तीन स्पष्ट कमिटमेंट्स हैं:
राजनीतिक हिंसा और धमकी को नकारना
anti‑democratic RSS और उसके affiliates से जुड़े डोनेशन को मना करना
अगर ऐसा चंदा मिला भी, तो उसे लौटाना या प्रो‑डेमोक्रेसी संस्थाओं को दान कर देना
किन बड़े नामों ने दस्तखत किए?
मीडिया रिपोर्ट्स और प्रेस रिलीज़ में जिन नामों का ज़िक्र आया, उनमें शामिल हैं:
Rep. Pramila Jayapal (वर्तमान सांसद)
Rep. Ro Khanna (वर्तमान सांसद)
Brad Lander (न्यूयॉर्क से कांग्रेस उम्मीदवार)
Ro Khanna ने तो यहाँ तक कहा कि उन्हें हाल ही में एक प्रो‑MAGA अरबपति से $6,600 का चंदा मिला, जो RSS‑समर्थित नेटवर्क से जुड़ा लगा—इसलिए वे इसे वापस/दान कर देंगे।
मोहन भागवत की यात्रा: क्यों बनी वजह‑ए‑बहस?
मोहन भागवत की अमेरिका–कनाडा–UK यात्रा 25 अगस्त 2026 से शुरू हुई, जिसका एक बड़ा इवेंट 29 अगस्त को न्यूयॉर्क के मैडिसन स्क्वायर गार्डन में “Universal Oneness Celebrations” के नाम से हुआ।
इसी बीच USCIRF ने 26–27 अगस्त के आसपास बयान देकर कहा: वे भागवत की अमेरिका यात्रा को लेकर गहरी चिंतित हैं। उन्होंने अमेरिकी सरकार से वीज़ा रद्द करने और RSS सदस्यों/भारत के उन अधिकारियों पर टारगेटेड सैंक्शन पर विचार करने की अपील की, जो धार्मिक स्वतंत्रता उल्लंघन में “complicit” माने जाते हैं।
भारत के विदेश मंत्रालय/MEA ने USCIRF के दावों को पक्षपाती करार देते हुए खारिज किया, जबकि RSS खुद को “हिंदू‑सेंट्रिक सिविलाइज़ेशनल/कल्चरल मूवमेंट” बताता है और अपने ऊपर लगा “असहिष्णु” होने का लेबल खारिज करता है।
USCIRF का स्टैंड: सिफारिशें, पर बाइंडिंग नहीं
USCIRF एक अमेरिकी कांग्रेस‑गठित एडवाइज़री बॉडी है, जो दुनिया भर में धार्मिक स्वतंत्रता की निगरानी करती है और नीति‑सिफारिशें देती है—पर ये सिफारिशें बाइंडिंग नहीं होतीं। फिर भी, जब USCIRF जैसे द्विदलीय पैनल से ऐसी सिफारिशें आती हैं, तो उनका राजनैतिक असर काफी होता है।
USCIRF के बयान में खास तौर पर कहा गया: RSS को हिंदुत्व आइडियोलॉजी का आइडियोलॉजिकल पैरेंट बताया गया, जो BJP से जुड़ी है।
अमेरिका को भारत को accountable करने का मौका है, ताकि धार्मिक स्वतंत्रता की स्थिति और खराब न हो।
क्या यह सिर्फ़ “विरोध” है, या कुछ और?
यह सिर्फ़ विरोध‑प्रदर्शन की कहानी नहीं है। यह फंडिंग और प्रभाव की बहस है:
HFHRA और SACRED Acts का तर्क है कि कुछ super‑rich डोनर्स और उनके नेटवर्क, जो RSS‑समर्थित माने जाते हैं, अमेरिकी राजनीति में अपनी पसंद की नीतियों को आगे बढ़ाने के लिए फंडिंग कर रहे हैं।
इसके जवाब में, हिंदू‑अमेरिकन कुछ अन्य संगठन (जैसे Hindu American Foundation आदि) इस तरह के आरोपों को एक‑तरफा और राजनीतिक मोटिव से प्रेरित बताते रहे हैं।
दोनों तरफ़ की बातें समझना ज़रूरी है, वरना बहस सिर्फ़ शोर बनकर रह जाती है।
आगे क्या हो सकता है?
अमेरिकी कांग्रेस/व्हाइट हाउस USCIRF की सिफारिशों पर कोई कदम उठाए या नहीं, यह देखना बाकी है।
HFHRA+SACRED Acts जैसे ग्रुप्स इस pledge को और नेताओं तक ले जाने की कोशिश करेंगे।
दूसरी तरफ़, हिंदू‑अमेरिकन कुछ संगठन इस narrative को misleading बताकर काउंटर‑कैम्पेन चला सकते हैं।
असल सवाल यही है: क्या अमेरिकी राजनीति में विदेशी‑जुड़े आइडियोलॉजिकल नेटवर्क की फंडिंग को लेकर एक साफ़, पारदर्शी बहस हो पाएगी—बिना सामुदायिक ध्रुवीकरण के?
रिपोर्ट : इस्मा टाइम्स न्यूज़ डेस्क.
