मध्य प्रदेश में समान नागरिक संहिता पर नई बहस: एल.एस. हरदेनिया ने विधानसभा की प्रक्रिया और कानून पर उठाए सवाल

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समान नागरिक संहिता (यूसीसी) को लेकर मध्य प्रदेश में राजनीतिक और सामाजिक बहस लगातार तेज होती जा रही है। हाल ही में मध्य प्रदेश विधानसभा द्वारा समान नागरिक संहिता विधेयक पारित किए जाने के बाद विभिन्न राजनीतिक दलों, सामाजिक संगठनों और सार्वजनिक जीवन से जुड़े लोगों ने इस पर अपनी-अपनी राय रखी है।

इसी कड़ी में राष्ट्रीय सेक्युलर मंच के संरक्षक एल.एस. हरदेनिया ने विधानसभा की कार्यवाही और यूसीसी को लेकर अपनी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने विधानसभा सत्र के समय से पहले समाप्त होने पर भी चिंता जताई और कहा कि इतने महत्वपूर्ण विधेयकों पर व्यापक चर्चा होनी चाहिए थी।

विधानसभा की कार्यवाही पर जताई चिंता

एल.एस. हरदेनिया ने जारी अपने बयान में कहा कि एक समय ऐसा भी था जब मध्य प्रदेश विधानसभा के सत्र निर्धारित अवधि से आगे बढ़ाए जाते थे, ताकि सभी महत्वपूर्ण विषयों पर विस्तार से चर्चा हो सके। लेकिन इस बार निर्धारित समय से पहले ही सत्र समाप्त कर दिया गया और कई विधेयक बिना विस्तृत बहस के पारित हो गए।

उन्होंने कहा कि विधानसभा में पारित कोई भी विधेयक राज्यपाल की मंजूरी के बाद कानून बन जाता है और ऐसे कई कानून वर्षों तक लागू रहते हैं। इसलिए उनका मानना है कि महत्वपूर्ण विधेयकों पर पर्याप्त चर्चा लोकतांत्रिक व्यवस्था की बुनियादी आवश्यकता है।

समान नागरिक संहिता पर क्या है उनकी आपत्ति?

एल.एस. हरदेनिया का कहना है कि समान नागरिक संहिता ऐसा विषय है जिसका प्रभाव प्रदेश के लगभग हर नागरिक पर पड़ सकता है। उनके अनुसार, इस तरह के व्यापक प्रभाव वाले विधेयक को पहले विधानसभा की किसी प्रवर समिति के पास भेजा जाना चाहिए था या फिर जनता से सुझाव लेने के लिए व्यापक स्तर पर सार्वजनिक चर्चा कराई जानी चाहिए थी।

उन्होंने यह भी कहा कि किसी कानून के गुण और कमियों पर विचार करने से पहले उसके सामाजिक प्रभाव का व्यापक अध्ययन होना चाहिए।

भारत की विविधता का दिया हवाला

अपने बयान में हरदेनिया ने कहा कि भारत की सबसे बड़ी पहचान उसकी विविधता है। भाषा, संस्कृति, पहनावा, क्षेत्रीय परंपराएं और धार्मिक मान्यताएं—देश का लगभग हर हिस्सा अपनी अलग पहचान रखता है।

उनका मत है कि इसी विविधता के कारण ऐसे विषयों पर व्यापक सामाजिक सहमति बनाने का प्रयास होना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि यदि इसे “समान” नागरिक संहिता कहा जा रहा है, तो अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग कानून बनाए जाने की स्थिति अपने आप में एक विरोधाभास दिखाई देती है। यह उनका व्यक्तिगत राजनीतिक और वैचारिक दृष्टिकोण है।

मध्य प्रदेश में क्या हुआ?

मध्य प्रदेश सरकार ने जुलाई 2026 में समान नागरिक संहिता (यूसीसी) विधेयक विधानसभा में पेश किया। सरकार का कहना है कि इसका उद्देश्य विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और अन्य नागरिक मामलों में समान कानूनी व्यवस्था लागू करना है। सरकार के अनुसार विधेयक में महिलाओं और पुरुषों को समान उत्तराधिकार अधिकार, विवाह पंजीकरण को अनिवार्य बनाने तथा बहुविवाह पर रोक जैसे प्रावधान शामिल किए गए हैं। अनुसूचित जनजातियों को इस कानून के दायरे से बाहर रखा गया है। विपक्ष ने विधेयक को प्रवर समिति के पास भेजने की मांग की, लेकिन विधानसभा ने बहुमत से इसे पारित कर दिया। राज्यपाल की मंजूरी के बाद ही यह कानून प्रभावी होगा।

लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर बहस जारी

यूसीसी को लेकर देशभर में लंबे समय से अलग-अलग मत सामने आते रहे हैं। समर्थकों का कहना है कि इससे सभी नागरिकों के लिए समान नागरिक अधिकार सुनिश्चित होंगे, जबकि विरोध करने वाले पक्ष का मानना है कि इतने व्यापक सामाजिक प्रभाव वाले कानून पर अधिक चर्चा, जनभागीदारी और विधायी समीक्षा आवश्यक है।

एल.एस. हरदेनिया का बयान भी इसी व्यापक लोकतांत्रिक बहस का हिस्सा है। उन्होंने मुख्य रूप से विधानसभा की प्रक्रिया और विधेयक पर पर्याप्त चर्चा न होने का मुद्दा उठाया है, साथ ही भारत की सामाजिक और सांस्कृतिक विविधता को ध्यान में रखते हुए व्यापक विचार-विमर्श की आवश्यकता पर जोर दिया है।

निष्कर्ष

मध्य प्रदेश में समान नागरिक संहिता विधेयक पारित होने के बाद राजनीतिक बहस और तेज हो गई है। एक ओर राज्य सरकार इसे समान अधिकार और समान न्याय की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बता रही है, वहीं दूसरी ओर एल.एस. हरदेनिया जैसे सामाजिक और राजनीतिक व्यक्तित्व इस पर अधिक संवाद, जनभागीदारी और विस्तृत विधायी समीक्षा की आवश्यकता पर बल दे रहे हैं। आने वाले समय में राज्यपाल की मंजूरी और कानून के क्रियान्वयन के साथ इस विषय पर चर्चा और भी व्यापक होने की संभावना है।

रिपोर्ट : इस्मा टाइम्स न्यूज़ डेस्क.

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