मध्य प्रदेश के दतिया विधानसभा उपचुनाव का नतीजा सिर्फ़ एक सीट की जीत-हार तक सीमित नहीं माना जा रहा है। राजनीतिक जानकार इसे मुख्यमंत्री मोहन यादव के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की पहली बड़ी चुनावी परीक्षा के रूप में देख रहे हैं। दूसरी ओर, कांग्रेस के लिए भी यह चुनाव आसान नहीं था, क्योंकि मतदान से ठीक पहले पार्टी के भीतर मतभेद खुलकर सामने आ गए थे। इसके बावजूद कांग्रेस उम्मीदवार कुंवर घनश्याम सिंह ने भाजपा के आशुतोष तिवारी को 6,016 मतों से हराकर सीट अपने नाम कर ली।
यह उपचुनाव उस समय जरूरी हुआ था, जब कांग्रेस के पूर्व विधायक राजेंद्र भारती की बैंक धोखाधड़ी से जुड़े एक मामले में दोषसिद्धि के बाद उनकी विधानसभा सदस्यता समाप्त हो गई थी। चुनाव प्रचार के अंतिम दौर में कांग्रेस के भीतर भी तनाव देखने को मिला। घनश्याम सिंह ने राजेंद्र भारती पर भाजपा के साथ मिलकर चुनाव प्रभावित करने की कोशिश का आरोप लगाया, जबकि राजेंद्र भारती ने दावा किया कि घनश्याम सिंह के संबंध भाजपा के वरिष्ठ नेता और पूर्व गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा से हैं। मतगणना से एक दिन पहले कांग्रेस ने राजेंद्र भारती को पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से निलंबित भी कर दिया था।
भाजपा ने इस बार दतिया से छह बार विधायक रहे और पूर्व गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा को टिकट नहीं दिया। उनकी जगह पहली बार चुनाव लड़ रहे आशुतोष तिवारी को उम्मीदवार बनाया गया। टिकट बदलने के फैसले के बाद पार्टी के भीतर असंतोष भी सामने आया। कई जगह विरोध हुआ, कुछ पदाधिकारियों ने इस्तीफा दिया और चुनाव प्रचार के दौरान नरोत्तम मिश्रा का भावुक होना भी चर्चा का विषय बना। हालांकि बाद में उन्होंने कार्यकर्ताओं से पार्टी के समर्थन में काम करने की अपील की और प्रचार भी किया।
मतगणना के दौरान तीसरे राउंड से कांग्रेस ने बढ़त बनानी शुरू की। एक समय उसकी बढ़त 12 हजार से अधिक वोटों तक पहुंच गई थी। अंतिम दो राउंड में अंतर कुछ कम हुआ, लेकिन कांग्रेस ने आखिरकार 6,016 वोटों से जीत दर्ज कर सीट बरकरार रखी। यह लगातार दूसरी बार है जब दतिया विधानसभा सीट पर भाजपा को हार का सामना करना पड़ा। इससे पहले वर्ष 2023 के विधानसभा चुनाव में भी कांग्रेस के राजेंद्र भारती ने नरोत्तम मिश्रा को हराया था।
हालांकि इस उपचुनाव से प्रदेश सरकार के बहुमत पर कोई असर नहीं पड़ना था, फिर भी भाजपा और कांग्रेस दोनों ने पूरी ताकत झोंक दी थी। मुख्यमंत्री मोहन यादव, प्रदेश भाजपा अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल, कई मंत्री और वरिष्ठ संगठनात्मक नेता चुनाव प्रचार में सक्रिय रहे। वहीं कांग्रेस ने स्थानीय मुद्दों के साथ-साथ भाजपा की अंदरूनी खींचतान को भी चुनावी मुद्दा बनाया।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस नतीजे के पीछे सिर्फ टिकट बदलना ही कारण नहीं था। वरिष्ठ पत्रकारों के अनुसार खेती-किसानी, खाद-बीज की उपलब्धता, डीजल की कीमतें और किसानों की परेशानियां भी चुनाव के दौरान चर्चा में रहीं। इसके अलावा हाल के किसान आंदोलन, छात्र आंदोलनों और अन्य राजनीतिक विवादों का असर भी मतदाताओं के रुझान पर पड़ा हो सकता है। कुछ विश्लेषकों का यह भी कहना है कि अचानक हुए उपचुनाव ने मतदाताओं के मनोविज्ञान को प्रभावित किया और स्थानीय संगठन की मजबूती भी अहम भूमिका निभाती दिखी।
चुनाव परिणाम आने के बाद भाजपा ने जनादेश को स्वीकार करते हुए कहा कि पूरे चुनाव की समीक्षा की जाएगी। प्रदेश भाजपा अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल ने स्पष्ट किया कि यदि समीक्षा में किसी स्तर पर अनुशासनहीनता या कमी सामने आती है तो उसके अनुसार कार्रवाई की जाएगी। वहीं कांग्रेस ने इस जीत को जनता का भरोसा और लोकतांत्रिक मूल्यों की जीत बताया।
दतिया उपचुनाव के नतीजों ने कई सवाल छोड़ दिए हैं। क्या भाजपा अपने प्रभावशाली क्षेत्रीय नेताओं के बिना संगठन को पहले जैसी मजबूती से एकजुट रख पाएगी? क्या स्थानीय और किसान से जुड़े मुद्दे सरकारी योजनाओं पर भारी पड़े? और क्या कांग्रेस की यह जीत सिर्फ स्थानीय समीकरणों का परिणाम है या मध्य प्रदेश की राजनीति में बदलते माहौल का संकेत भी? इन सवालों के जवाब आने वाले समय में साफ होंगे, लेकिन इतना तय है कि दतिया उपचुनाव ने प्रदेश की राजनीति में नई बहस जरूर छेड़ दी है।
रिपोर्ट : इस्मा टाइम्स न्यूज़ डेस्क.
