बिहार -प्रदेश (3 नवंबर 2026) : आज देश के सामने सबसे बड़ा सवाल केवल यह नहीं है कि सरकार कितनी सड़कें बना रही है, कितने उद्घाटन कर रही है या कितने विज्ञापन जारी कर रही है. असली सवाल यह है कि सरकार नागरिकों को क्या दे रही है और उसके बदले नागरिकों से क्या ले रही है?इसी कसौटी पर जब स्वतंत्र भारत के शुरुआती वर्षों को आज के दौर से देखा जाता है, तो पंडित जवाहरलाल नेहरू की विकास-दृष्टि और वर्तमान शासन-शैली के बीच एक महत्वपूर्ण अंतर दिखाई देता है.
नेहरू के सामने भारत एक ऐसा देश था जो सदियों की गरीबी, अशिक्षा, बीमारी और औद्योगिक पिछड़ेपन से बाहर निकलने की कोशिश कर रहा था. उन्होंने राष्ट्रनिर्माण को केवल सरकार की उपलब्धि नहीं, बल्कि जनता के भविष्य में सार्वजनिक निवेश माना.
बड़े बांध बने। सिंचाई की क्षमता बढ़ाने का प्रयास हुआ. भाखड़ा-नांगल जैसी परियोजनाएं केवल कंक्रीट की संरचनाएं नहीं थीं, बल्कि आधुनिक भारत के विकास का प्रतीक थीं.नेहरू का विश्वास था कि ऐसी आधारभूत संरचनाएं आने वाली पीढ़ियों की आर्थिक शक्ति बनेंगी.
आज सवाल यह है कि क्या विकास का अर्थ केवल निर्माण करना है, या निर्माण के बाद उसकी कीमत भी लगातार जनता की जेब से वसूलना है?
राजमार्ग राष्ट्र की संपत्ति हैं. सड़कें आर्थिक गतिविधियों की जीवनरेखा हैं.लेकिन जब नागरिक को एक ही यात्रा में बार-बार टोल देना पड़ता है, तो स्वाभाविक प्रश्न उठता है—करदाता आखिर कितनी बार भुगतान करेगा?
नेहरू के दौर में शिक्षा और स्वास्थ्य को भी राष्ट्रनिर्माण के मूल आधार के रूप में देखा गया. विश्वविद्यालयों, वैज्ञानिक संस्थानों, चिकित्सा संस्थानों और सार्वजनिक क्षेत्र की संस्थाओं का विस्तार हुआ.उद्देश्य था कि गरीब परिवार का बच्चा भी आगे बढ़ सके और बीमारी किसी परिवार को आर्थिक रूप से बर्बाद न कर दे.
यही वह बुनियादी दर्शन है जिसे आज फिर याद करने की जरूरत है.सरकार का अर्थ केवल राजस्व संग्रह करने वाली संस्था नहीं है.सरकार का पहला दायित्व नागरिकों के जीवन को बेहतर बनाना है.
रोजगार के प्रश्न पर भी यही अंतर दिखाई देता है. सार्वजनिक क्षेत्र और सरकारी संस्थानों का विस्तार उस दौर की विकास-नीति का महत्वपूर्ण हिस्सा था। आज युवाओं के सामने सबसे बड़ा प्रश्न रोजगार की स्थिरता और सम्मानजनक अवसरों का है.ऐसे में सरकार की सफलता का मूल्यांकन केवल GDP, एक्सप्रेसवे और निवेश के आंकड़ों से नहीं, बल्कि इस सवाल से होना चाहिए कि देश के युवा को उसके भविष्य का भरोसा मिला या नहीं.टीकाकरण जैसी सार्वजनिक स्वास्थ्य योजनाओं की चर्चा करते समय भी एक महत्वपूर्ण बात सामने आती है.जनकल्याणकारी योजनाओं का केंद्र नागरिक होना चाहिए, सत्ता का प्रचार नहीं.सरकारी योजना पर किसी नेता का चेहरा कितना बड़ा है, यह उसकी सफलता का प्रमाण नहीं हो सकता। असली प्रमाण यह है कि अंतिम व्यक्ति तक उसका लाभ कितना पहुंचा.नेहरू की सबसे बड़ी राजनीतिक विरासत शायद यही थी कि उन्होंने संस्थाओं को व्यक्ति से बड़ा बनाने का प्रयास किया.लोकतंत्र में प्रधानमंत्री महत्वपूर्ण होता है, लेकिन प्रधानमंत्री लोकतंत्र से बड़ा नहीं होता.विदेश नीति के मोर्चे पर भी नेहरू ने भारत की स्वतंत्र आवाज स्थापित करने की कोशिश की.अमेरिका हो, सोवियत संघ हो या कोई अन्य महाशक्ति—भारत का राष्ट्रीय हित सर्वोपरि था। भारत किसी का पिछलग्गू नहीं, बल्कि अपनी स्वतंत्र विदेश नीति वाला राष्ट्र बने, यह उस समय की मूल आकांक्षा थी.
आज जब हम नेहरू की आलोचना या प्रशंसा करते हैं तो हमें व्यक्तिपूजा से बाहर निकलकर उनके दौर की नीतियों और संस्थागत विरासत को देखना चाहिए.
किसी भी सरकार का मूल्यांकन उसके विज्ञापनों से नहीं, उसके नागरिकों के जीवन से होना चाहिए.
यदि किसान को सिंचाई चाहिए, तो उसे पानी मिले.
यदि युवा को रोजगार चाहिए, तो उसे अवसर मिले.
यदि बच्चे को शिक्षा चाहिए, तो उसे गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिले.
यदि गरीब बीमार है, तो उसे इलाज मिले.
यदि नागरिक सड़क पर चलता है, तो उसकी जेब पर विकास का बोझ अनंत न हो.
और यदि सरकार कोई योजना बनाती है, तो उसका श्रेय लोकतंत्र और जनता को मिले—किसी एक व्यक्ति की छवि को नहीं.
इसीलिए आज देश को यह बहस फिर शुरू करनी चाहिए कि विकास का मॉडल नागरिक-केंद्रित होगा या वसूली-केंद्रित?
नेहरू त्रुटिहीन नहीं थे. उनके निर्णयों की आलोचना लोकतंत्र में पूरी तरह जायज है। लेकिन उनके राष्ट्रनिर्माण के मूल विचार—वैज्ञानिक दृष्टिकोण, सार्वजनिक संस्थाओं का निर्माण, शिक्षा, स्वास्थ्य, सिंचाई, उद्योग और लोकतांत्रिक संस्थाओं को मजबूत करना—आज भी भारत की बुनियादी जरूरतों से जुड़े हुए हैं.
इसलिए यह लेख किसी व्यक्ति की जय-जयकार नहीं, बल्कि एक सवाल है—
क्या सरकार जनता पर एहसान करती है, या जनता के कर से जनता का भविष्य बनाती है?
लोकतंत्र में अंतिम मालिक सरकार नहीं, जनता होती है.
और जब जनता यह सवाल पूछती है कि उसके टैक्स के बदले उसे क्या मिला, तो उसे राष्ट्रविरोधी, अराजक या विकास-विरोधी कहना लोकतंत्र की आत्मा को कमजोर करना है.
भारत को ऐसे विकास की जरूरत है जिसमें सड़क भी हो और उस पर चलने की क्षमता भी; अस्पताल भी हो और इलाज की पहुंच भी; विश्वविद्यालय भी हो और गरीब विद्यार्थी के लिए दरवाजा भी; सिंचाई भी हो और किसान की आय भी; रोजगार भी हो और युवा के चेहरे पर भविष्य का विश्वास भी।यही राष्ट्रनिर्माण है.यही लोकतंत्र का लोककल्याणकारी अर्थ है.
रिपोर्ट : विश्वनाथ आनंद.
