पूर्णिया, बिहार: बिहार की चुनावी सियासत में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर एक बार फिर विवाद गहरा गया है। असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने 4 नवंबर 2026 को पूर्णिया में भाजपा की ‘लोकतंत्र बचाओ, अराजकता हटाओ’ पदयात्रा के दौरान ऐसा बयान दिया, जिस पर राजनीतिक बहस तेज हो सकती है। उन्होंने चुनाव आयोग से दोबारा SIR कराने की मांग करते हुए कहा कि मतदाता सूची से ‘बाबर और औरंगजेब’ के नाम हटाए जाने चाहिए।
सरमा के इस बयान को लेकर विपक्षी दलों की ओर से सवाल उठाए जाने की संभावना है। उनके बयान में इस्तेमाल किए गए ऐतिहासिक नामों को मुस्लिम समुदाय की ओर इशारा करने वाली राजनीतिक भाषा के तौर पर देखा जा रहा है। खासकर सीमांचल जैसे इलाकों के संदर्भ में इस टिप्पणी के सियासी मायने और भी अहम हो जाते हैं।
सरमा ने दोबारा SIR कराने की मांग क्यों की?
पूर्णिया में अपने संबोधन के दौरान हिमंता बिस्वा सरमा ने दावा किया कि SIR के जरिए मतदाता सूची से ‘बाबर और औरंगजेब’ के नाम हटाए गए हैं। उन्होंने चुनाव आयोग से कहा कि इस प्रक्रिया को आगे बढ़ाया जाए और दोबारा SIR कराकर ऐसे सभी नामों को सूची से बाहर किया जाए।
उन्होंने इस मुद्दे को राहुल गांधी के ‘वोट चोरी’ के आरोपों से जोड़ते हुए कहा कि देश में वोट चोरी नहीं हो रही है। उनके मुताबिक, भाजपा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लोगों का दिल जीत रहे हैं।
सरमा ने सवालिया अंदाज में कहा कि अगर बाबर और औरंगजेब जैसे नाम मतदाता सूची से हटाए जाते हैं, तो इसे वोट चोरी कैसे कहा जा सकता है? उन्होंने इसे वोट चोरी के बजाय ‘दिल चोरी’ करार दिया।
हालांकि, उनके इस दावे और चुनाव आयोग के आधिकारिक रिकॉर्ड के बीच अंतर समझना ज़रूरी है। आयोग की ओर से मतदाता सूची से नाम हटाने के लिए निर्धारित प्रशासनिक कारण होते हैं। किसी व्यक्ति का नाम बाबर या औरंगजेब जैसा होना अपने आप में नाम हटाने का आधिकारिक आधार नहीं है।
‘बाबर-औरंगजेब’ के नाम लेकर किस पर निशाना साधा?
सरमा के बयान में बाबर और औरंगजेब का ज़िक्र केवल इतिहास तक सीमित नहीं दिखता। राजनीतिक संदर्भ में इन नामों का इस्तेमाल मुस्लिम पहचान की ओर इशारा करने वाले प्रतीकों के तौर पर समझा जा रहा है।
यही वजह है कि इस टिप्पणी को लेकर विवाद की गुंजाइश बढ़ गई है। बिहार के सीमांचल क्षेत्र में मुस्लिम आबादी की अच्छी-खासी मौजूदगी है। ऐसे में मतदाता सूची के पुनरीक्षण को इस तरह की पहचान आधारित भाषा से जोड़ना चुनावी बहस को और संवेदनशील बना सकता है।
बिहार में SIR के दौरान कितने नाम हटे?
बिहार में मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण 24 जून 2025 से 30 सितंबर 2025 तक चला। इस दौरान मतदाता सूची में बड़े पैमाने पर बदलाव किए गए।
उपलब्ध आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, प्रक्रिया की शुरुआत में राज्य में करीब 7.89 करोड़ मतदाता दर्ज थे। ड्राफ्ट सूची में लगभग 65 लाख नाम हटाए गए। इसके बाद पात्र मतदाताओं के दावों और जांच के आधार पर 21.53 लाख नए नाम जोड़े गए, जबकि अंतिम जांच में 3.66 लाख अयोग्य नाम हटाए गए।
चुनाव आयोग की प्रक्रिया के मुताबिक, किसी मतदाता का नाम हटाने से पहले निर्धारित जांच और प्रक्रिया का पालन करना ज़रूरी है। इसमें संबंधित व्यक्ति को सुनवाई का मौका देना और लिखित आदेश जारी करना शामिल है। वहीं, जिन पात्र मतदाताओं के नाम सूची में शामिल नहीं हो पाए, वे निर्धारित समय के भीतर दावा दाखिल कर सकते थे।
SIR को लेकर विपक्ष की चिंता क्या है?
बिहार में SIR को लेकर विपक्षी दलों ने शुरुआत से ही सवाल उठाए थे। विपक्ष का कहना था कि इतनी बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम हटने से लोगों के मतदान के अधिकार पर असर पड़ सकता है।
यह चिंता खास तौर पर सीमांचल के इलाकों में अधिक देखने को मिली। इस क्षेत्र में मुस्लिम आबादी का अनुपात काफी है और यहां मतदाता सूची में होने वाले बदलावों का चुनावी नतीजों पर भी असर पड़ सकता है।
विपक्ष की आशंका थी कि अगर जांच प्रक्रिया में किसी तरह की गलती होती है, तो बड़ी संख्या में वास्तविक और पात्र मतदाता अपने मताधिकार से वंचित हो सकते हैं।
दूसरी ओर, चुनाव आयोग ने SIR का उद्देश्य मतदाता सूची को सही और अद्यतन बनाना बताया। आयोग का कहना रहा कि पात्र मतदाताओं को सूची से बाहर रखने का कोई सवाल नहीं है और नाम जोड़ने या हटाने के लिए निर्धारित नियमों का पालन किया जाता है।
राहुल गांधी पर भी साधा निशाना, बांग्लादेश का किया जिक्र
अपने भाषण में हिमंता बिस्वा सरमा ने कांग्रेस नेता राहुल गांधी पर भी निशाना साधा। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि राहुल गांधी चुनाव में हार के बाद EVM और SIR पर सवाल उठाने लगते हैं।
इसी दौरान उन्होंने एक और विवादित टिप्पणी की। सरमा ने कहा कि सम्राट चौधरी और सुवेंदु अधिकारी के साथ मिलकर राहुल गांधी को बांग्लादेश में ‘पैराशूट लैंडिंग’ करा देंगे, जहां वे चुनाव जीत सकते हैं।
यह टिप्पणी राजनीतिक व्यंग्य के तौर पर की गई थी, लेकिन इसकी भाषा को लेकर भी सवाल उठ सकते हैं। सरमा ने इसे राहुल गांधी के चुनावी प्रदर्शन और विपक्ष की शिकायतों पर कटाक्ष करने के लिए इस्तेमाल किया।
SIR और सीमांचल की राजनीति पर क्यों बढ़ी नजर?
हिमंता बिस्वा सरमा का यह बयान ऐसे समय आया है, जब बिहार की चुनावी राजनीति में मतदाता सूची, कथित घुसपैठ और सीमांचल का मुद्दा लगातार चर्चा में है।
सरमा ने अपने भाषण में बिहार के सीमांचल के साथ असम और पश्चिम बंगाल का भी जिक्र किया। इन इलाकों को लेकर भाजपा पहले भी घुसपैठ और मतदाता पहचान से जुड़े मुद्दे उठाती रही है।
हालांकि, राजनीतिक आरोपों और चुनाव आयोग के आधिकारिक आंकड़ों को एक ही नजरिए से देखना सही नहीं होगा। किसी मतदाता का नाम हटने के पीछे मृत्यु, स्थायी रूप से स्थानांतरण, एक से अधिक जगह नाम दर्ज होना या मतदाता के अयोग्य पाए जाने जैसे कारण हो सकते हैं।
इसलिए SIR के दौरान नाम हटाए जाने को किसी खास समुदाय के खिलाफ कार्रवाई बताने के लिए अलग से ठोस सबूत की जरूरत होगी।
निष्कर्ष: राजनीतिक बयान और आधिकारिक रिकॉर्ड में फर्क समझना जरूरी
पूर्णिया में हिमंता बिस्वा सरमा का ‘बाबर-औरंगजेब के नाम काटिए’ वाला बयान बिहार की चुनावी राजनीति में एक नया विवाद खड़ा कर सकता है। इस टिप्पणी ने मतदाता सूची के पुनरीक्षण को धार्मिक पहचान और राजनीतिक बहस से जोड़ दिया है।
आखिरकार, मतदाता सूची का मामला केवल चुनावी राजनीति तक सीमित नहीं है। यह हर नागरिक के मतदान के अधिकार से जुड़ा है। इसलिए इस पूरी प्रक्रिया में पारदर्शिता, निष्पक्षता और पात्र मतदाताओं के अधिकारों की सुरक्षा सबसे अहम होनी चाहिए।
रिपोर्ट : इस्मा टाइम्स न्यूज़ डेस्क.
