पेट की सेहत से तय होता है आपका कल, आयुर्वेद में छिपा है हर मर्ज का स्थायी हल : डॉ सम्पूर्णानन्द मिश्र.

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झारखंड प्रदेश (31 अगस्त 2026) : आज की भागदौड़ भरी जिंदगी और पश्चिमी सभ्यता की अंधी नकल ने हमारी जीवनशैली को पूरी तरह तहस-नहस कर दिया है.पिज्जा, बर्गर, मैगी,चौमिन अधिक मांसाहारी भोजन, चिप्स, कुरकुरे सहित सभी पैकेटबंद खाद्य पदार्थ, असमय खान-पान,रात्रि जागरण, सुबह अधिक देर तक सोना, शारीरिक भागदौड़ एवं परिश्रम न के बराबर करना आज के आधुनिक समाज की पहचान बन चुके हैं.लेकिन इस तथाकथित आधुनिकता की आड़ में हम अपने सबसे बड़े धन—यानी स्वास्थ्य—को खोते जा रहे हैं। आज अस्पतालों में बढ़ती मरीजों की भीड़ और इलाज का अत्यधिक खर्च किसी से छुपा नहीं है.वर्तमान समय में अस्पताल जाना न सिर्फ जेब पर भारी पड़ता है, बल्कि मानसिक और शारीरिक रूप से साक्षात यमराज के दर्शन करने के समान हो गया है.इस गंभीर संकट से बचने का एकमात्र मार्ग हमारी प्राचीन चिकित्सा पद्धति ‘आयुर्वेद’ की ओर लौटना है.

अधपचा भोजन: सौ रोगों की जड़

आयुर्वेद का एक स्पष्ट और अकाट्य सिद्धांत है — “सर्वेषां रोगाणाम् निदानम् मन्दाग्नि”.

इसका सीधा अर्थ है कि संसार की अधिकांश बीमारियों की शुरुआत हमारे पेट से ही होती है.जब तक हमारा पेट पूरी तरह साफ नहीं रहेगा, तब तक हम गैस, एसिडिटी, फैटी लीवर, बीपी,सुगर, खून में कोलेस्ट्रॉल का बढ़ना और जमना सीधे तौर पर पेट की खराबी और खराब पाचन तंत्र से जुड़ा हुआ है, तथा मोटापा और जोड़ों के दर्द जैसी समस्याओं से कभी पीछा नहीं छुड़ा सकते.

हम जो भोजन करते हैं, यदि हमारी पाचक अग्नि (Metabolism) उसे पूरी तरह पचा नहीं पाती, तो वह अधपचा भोजन आंतों में जाकर सड़ने लगता है। आयुर्वेद में इस अधपचे विषैले तत्व को ‘आम’ (Ama या म्युकस) कहा गया है. समय के साथ यह म्युकस हमारी आंतों की दीवारों पर एक मोटी परत बना लेता है. यह दूषित परत शरीर के पोषण को रोक देती है और रक्त के माध्यम से पूरे शरीर में फैल जाती है.जब यह विषैला तत्व जोड़ों में पहुंचता है, तो जोड़ों का दर्द (गठिया) शुरू होता है; जब वसा प्रणालियों को बाधित करता है, तो मोटापा बढ़ता है; और जब पेट में रुकता है, तो भयंकर गैस और एसिडिटी को जन्म देता है। आंतों की यही गंदगी सैकड़ों गंभीर रोगों की असली जननी है.

भोजन का स्वर्णिम नियम: कब और कितना खाएं?

इस चक्रव्यूह से निकलने के लिए हमें अपनी थाली के साथ-साथ भोजन के समय का एक विशेष नियम समझना होगा.आयुर्वेद के अनुसार, हमारी पाचक अग्नि (जठराग्नि) का सीधा संबंध सूर्य की चाल से है. इसलिए:

सुबह का नाश्ता:

भारतीय संस्कृति में ‘हल्के नाश्ते’ (Breakfast) का कोई नियम नहीं है; यह पश्चिमी देशों की नकल है.

सही समय: सूर्योदय के बाद ढाई से साढ़े तीन घंटे के भीतर (सुबह 9:30 से 10:00 बजे तक) सुबह का मुख्य भोजन कर लेना चाहिए. इस समय जठराग्नि सबसे तीव्र होती.

दोपहर का भोजननियम:

दोपहर में सूर्य सिर पर होता है, लेकिन जठराग्नि की तीव्रता सुबह के मुकाबले कम होने लगती है।सही समय: दोपहर 12:00 से 2:00 बजे के आसपास.मात्रा: दोपहर का भोजन सुबह के भोजन से कम (लगभग आधा) होना चाहिए.इसमें आप फल, खिचड़ी या हल्के खाद्य पदार्थ ले सकते हैं।पेय पदार्थ: दोपहर के भोजन के बाद छाछ या मट्ठा (छांछ ) पीना अनिवार्य बताया गया है.

रात्रि का भोजन:

रात का भोजन बिल्कुल अल्प (हल्का) होना चाहिए और इसे शाम 7 बजे तक हर हाल में कर लेना श्रेयस्कर है। सूर्यास्त के बाद भारी भोजन करने से वह पचता नहीं, बल्कि आंतों में सड़कर बीमारियां पैदा करता है.

पेट साफ रखने और पाचन के अचूक उपाय

पानी पीने का सही नियम: भोजन के तुरंत बाद पानी पीना पेट में विष के समान काम करता है.इसलिए नियम बना लें कि खाना खाने के आधा घंटा पहले या एक घंटे बाद ही पानी पिएं.दिनभर या सुबह खाली पेट गुनगुना पानी (उष्णोदक) पीना आंतों की म्युकस परत को पिघलाकर बाहर निकालता है.

त्रिफला का नियम: रात को सोते समय गुनगुने पानी के साथ एक चम्मच त्रिफला चूर्ण का सेवन आंतों के दैनिक स्वास्थ्य के लिए अमृत समान है.

पञ्चसकार चूर्ण से आंतों की ‘सर्विसिंग’: आंतों की गहरी सफाई के लिए पन्द्रह दिन या महीने में एक बार रात को सोते समय बैद्यनाथ का ‘पञ्चसकार चूर्ण’ एक या दो चम्मच गर्म पानी से जरूर लें.यह आंतों के कोने-कोने में जमे पुराने मल और टॉक्सिन्स को पूरी तरह साफ कर देता है.

हरी सब्जियां और पाचक मसाले: भोजन में मौसमी हरी सब्जियां शामिल करें. खाना बनाते समय जीरा, सोंठ, हींग, अजवाइन और हल्दी का प्रयोग करें जो मंद पड़ी पाचक अग्नि को तेज करते हैं.

निष्कर्ष :

यदि हमें अस्पतालों के महंगे खर्चों और दवाओं के जाल से बचना है, तो हमें कृत्रिम जीवनशैली को छोड़कर प्रकृति की शरण में आना ही होगा. पेट साफ तो हर रोग साफ। आइए, आज ही से पश्चिमी सभ्यता की चमक को छोड़कर आयुर्वेद के बताए मार्ग पर चलने का संकल्प लें और एक स्वस्थ, सुखी व दीर्घायु जीवन की नींव रखें.

लेखक : झारखंड के सुप्रसिद्ध चिकित्सक, आयुर्वेद सेवाश्रम के संस्थापक एवं राष्ट्रीय आयुर्वेद रक्षा एवं विकास मंच के सदस्य है.

रिपोर्ट : विश्वनाथ आनंद.

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