गया, 5 सितंबर 2026: शिक्षक दिवस के अवसर पर गया के विवेकानंद पथ स्थित डॉ. विवेकानन्द मिश्र के आवास पर भारतीय राष्ट्रीय ब्राह्मण महासभा और कौटिल्य मंच के संयुक्त तत्वावधान में एक विद्वत्सभा का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में शिक्षा, ज्ञान और गुरु-शिष्य परंपरा के महत्व पर वक्ताओं ने अपने विचार रखे।
सभा की शुरुआत महासभा के संरक्षक आचार्य वल्लभ जी महाराज के संबोधन से हुई। उन्होंने कहा कि शिक्षक की भूमिका केवल पुस्तकीय ज्ञान देने तक सीमित नहीं है, बल्कि वह समाज और राष्ट्र के चरित्र निर्माण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। शिक्षक के संस्कार और मार्गदर्शन से नई पीढ़ी अपने जीवन की दिशा तय करती है।
भारतीय संस्कृति में गुरु का स्थान सर्वोच्च
कार्यक्रम की अध्यक्षता डॉ. विवेकानन्द मिश्र ने की। उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति में गुरु को हमेशा विशेष और सर्वोच्च स्थान दिया गया है। उन्होंने शिक्षा के बढ़ते व्यावसायीकरण और बदलते सामाजिक परिवेश पर चिंता जताते हुए कहा कि गुरु-परंपरा के मूल आदर्शों को फिर से स्थापित करना समय की आवश्यकता है।
उन्होंने शिक्षकों से डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के जीवन से प्रेरणा लेने की अपील की। उनके अनुसार सादगी, ईमानदारी, कर्तव्यनिष्ठा, स्वाभिमान और राष्ट्र के प्रति समर्पण जैसे गुण शिक्षकों के लिए प्रेरणादायक हैं।
शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार नहीं
आचार्य सच्चिदानन्द मिश्र ने भारतीय ज्ञान-परंपरा में गुरु और शिष्य के संबंध की महत्ता पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि शिक्षा का मकसद सिर्फ रोज़गार हासिल करना नहीं होना चाहिए। शिक्षा ऐसी होनी चाहिए जो व्यक्ति में संस्कार, विवेक और सामाजिक जिम्मेदारी की भावना पैदा करे।
कार्यक्रम में दिव्य रश्मि के संपादक एवं भारतीय जन क्रांति दल के राष्ट्रीय महासचिव ने भी अपने विचार रखे। उन्होंने कहा कि शिक्षा के क्षेत्र में तेजी से बदलाव हो रहे हैं और ऐसे दौर में शिक्षकों की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है।
उन्होंने कहा कि शिक्षकों को आधुनिक ज्ञान-विज्ञान के साथ विद्यार्थियों को भारतीय संस्कृति, नैतिक मूल्यों और सामाजिक जिम्मेदारियों से भी परिचित कराना चाहिए।
चरित्र निर्माण में शिक्षा की भूमिका पर जोर
श्री चरण बाबू डालमिया ने कहा कि शिक्षा तभी सार्थक है, जब वह व्यक्ति के ज्ञान में वृद्धि के साथ उसके चरित्र का भी निर्माण करे। उन्होंने कहा कि विद्यार्थियों को समाज और राष्ट्र के प्रति अपने दायित्वों का बोध कराना भी शिक्षा का महत्वपूर्ण उद्देश्य होना चाहिए।
सभा में मौजूद अन्य गणमान्य लोगों ने भी शिक्षक दिवस के महत्व पर अपने विचार साझा किए। वक्ताओं ने शिक्षकों के प्रति सम्मान और कृतज्ञता की भावना को मजबूत करने पर जोर दिया।
कार्यक्रम में इस बात पर भी सहमति व्यक्त की गई कि गुरु भारतीय सभ्यता की उस परंपरा के वाहक हैं, जिसके माध्यम से ज्ञान, संस्कार और संस्कृति एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचती रही है।
धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ समापन
कार्यक्रम के अंत में प्रोफेसर सुनील कुमार मिश्रा ने धन्यवाद ज्ञापित किया। उन्होंने उपस्थित लोगों और विशेष रूप से शिक्षक समुदाय के प्रति सम्मान एवं कृतज्ञता व्यक्त की।
विद्वत्सभा में वरिष्ठ अधिवक्ता याहिया, पंडित बालमुकुंद मिश्रा, स्वामी सुमन गिरि, आचार्य अरुण मिश्रा मधुप, छोटू आचार्य, सुनील पाठक, अमरनाथ, पुष्पा, पार्वती, नीलम कुमारी, डॉ. जितेंद्र कुमार मिश्रा, अरुण ओझा, मनीष कुमार, किरण पाठक, शीतल चौबे, डिंपल कुमारी, डॉ. ज्ञानेश भारद्वाज, डॉ. दिनेश कुमार सिंह, डॉ. रविंद्र कुमार, प्रोफेसर अशोक कुमार, मांडवी गुर्दा, रूबी कुमारी, नीरू कुमारी, शंभू लाल गुर्दा, कुमार दीपक पाठक, उत्तम पाठक, शिवजी, नीरज मिश्रा, रवि कुमार, चंद्रमौली कुमार मिश्रा, रंजन कुमार सिंह, राजेश त्रिपाठी, अमित त्रिपाठी, कविता राऊत, कुंदन मिश्रा, सुनील कुमार, शारदा मिश्रा, अमृता, मृदुला मिश्रा, मानवाधिकार के जितेंद्र ठाकुर, गुप्तेश्वर ठाकुर, फूल कुमारी, प्यारी देवी, गौरव कुमार सिंह मिश्रा, रंजीत कुमार पाठक, पवन मिश्रा, महेश मिश्रा और रोहित पाठक समेत कई लोग मौजूद रहे।
रिपोर्ट : विश्वनाथ आनंद.
