निर्वाचन आयोग में कथित असहमति पर पूर्व मंत्री सुरेश पासवान ने उठाए सवाल, SIR को लेकर लगाए गंभीर आरोप

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औरंगाबाद, बिहार | 24 सितंबर 2026: बिहार सरकार के पूर्व मंत्री डॉ. सुरेश पासवान ने निर्वाचन आयोग के भीतर दो निर्वाचन आयुक्तों द्वारा दर्ज की गई आपत्तियों को लेकर गंभीर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि यह मामला केवल चुनावी प्रक्रिया तक सीमित नहीं है, बल्कि संविधान, लोकतांत्रिक व्यवस्था और मतदाताओं के अधिकारों से भी जुड़ा हुआ है।

डॉ. पासवान ने हाल में सामने आई द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि निर्वाचन आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में आयोग के कई फैसलों और प्रक्रियाओं पर औपचारिक आपत्तियां दर्ज की थीं। रिपोर्ट के अनुसार, दोनों आयुक्तों ने कम-से-कम 14 बार लिखित आपत्तियां दर्ज कीं, जिनमें Form 6 में बदलाव, मतदाता सूची से नाम हटाने और बहाल करने तथा चुनावी डेटा के नियंत्रण से जुड़े विषय शामिल थे।

SIR को लेकर पूर्व मंत्री ने उठाए सवाल

डॉ. सुरेश पासवान ने आरोप लगाया कि बिहार में विशेष गहन मतदाता पुनरीक्षण यानी SIR के माध्यम से बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम प्रभावित हुए हैं। उन्होंने दावा किया कि इस प्रक्रिया के कारण वैध मतदाताओं के मताधिकार पर असर पड़ा है।

हालांकि, मतदाता सूची में बदलाव और SIR को लेकर विभिन्न राजनीतिक दलों की आपत्तियों के बीच निर्वाचन आयोग ने अपने स्तर पर कहा है कि SIR समेत उसके सभी महत्वपूर्ण फैसलों को तीनों निर्वाचन आयुक्तों की मंजूरी प्राप्त थी। आयोग के अधिकारियों ने आंतरिक मतभेद की रिपोर्ट को खारिज करते हुए कहा कि अलग-अलग राय और सुझाव संस्थागत deliberation का हिस्सा हैं तथा अंतिम फैसले सर्वसम्मति से लिए गए।

14 लिखित आपत्तियों की रिपोर्ट का किया उल्लेख

पूर्व मंत्री ने कहा कि द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में निर्वाचन आयुक्तों की ओर से दर्ज की गई 14 आपत्तियों का उल्लेख किया गया है। रिपोर्ट के अनुसार, इन आपत्तियों में नए मतदाताओं के पंजीकरण, मतदाता सूची से नाम हटाने और बहाली, पश्चिम बंगाल में अपीलों तथा चुनावी रोल के डिजिटल डेटाबेस के नियंत्रण से जुड़े मुद्दे शामिल थे।

रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि Form 6 में SIR से जुड़ा एक नया सवाल जोड़े जाने पर दोनों आयुक्तों ने पहले आपत्ति जताई थी। रिपोर्ट के अनुसार, संधू ने बाद में इस बदलाव को “unauthorised” और “illegal” बताते हुए इसे हटाने की बात कही थी।

चुनावी डेटा के नियंत्रण पर भी सवाल

डॉ. पासवान ने चुनावी डेटा और मतदाता सूची के डिजिटल प्रबंधन को लेकर भी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि मतदाता सूची से जुड़े किसी भी बदलाव में पारदर्शिता और जवाबदेही जरूरी है।

द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, दोनों निर्वाचन आयुक्तों ने मतदाता डेटाबेस के नियंत्रण को अधिक केंद्रीकृत किए जाने को लेकर भी चिंता व्यक्त की थी। रिपोर्ट में बताया गया कि दोनों आयुक्तों ने इस संबंध में अधिकारियों और बाद में कैबिनेट सचिव को भी पत्र लिखे थे।

चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर उठाया सवाल

डॉ. सुरेश पासवान ने आरोप लगाया कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने दोनों निर्वाचन आयुक्तों की आपत्तियों के बावजूद फैसले लिए। उन्होंने कहा कि यदि आयोग के भीतर ही किसी निर्णय की प्रक्रिया को लेकर लिखित असहमति सामने आती है तो उसके कारणों और निस्तारण की जानकारी सार्वजनिक की जानी चाहिए।

उन्होंने यह भी कहा कि निर्वाचन आयोग तीन सदस्यीय संवैधानिक संस्था है और निर्णय प्रक्रिया में सभी निर्वाचन आयुक्तों की भूमिका महत्वपूर्ण है।

हालांकि, मौजूदा कानूनी व्यवस्था के अनुसार आयोग का कामकाज यथासंभव सर्वसम्मति से किया जाना है और मतभेद की स्थिति में बहुमत के आधार पर निर्णय लिया जाता है। द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में भी 2023 के कानून की धारा 18 के इसी प्रावधान का उल्लेख किया गया है।

बिहार में SIR के खिलाफ विपक्षी विरोध का किया जिक्र

पूर्व मंत्री ने बिहार में SIR को लेकर विपक्षी दलों की ओर से उठाई गई आपत्तियों का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि विभिन्न विपक्षी दलों ने मतदाता सूची के पुनरीक्षण को लेकर सवाल उठाए हैं और इस मुद्दे पर राजनीतिक अभियान भी चलाए गए।

डॉ. पासवान ने आरोप लगाया कि SIR के जरिए बड़ी संख्या में मतदाताओं को मतदान के अधिकार से बाहर किया गया है। हालांकि, ऐसे राजनीतिक आरोपों को निर्वाचन आयोग ने स्वीकार नहीं किया है और आयोग की ओर से SIR तथा अन्य महत्वपूर्ण फैसलों को सर्वसम्मति से लिए जाने की बात कही गई है।

पुराने चुनाव रद्द कर दोबारा चुनाव कराने की मांग

डॉ. सुरेश पासवान ने निर्वाचन आयोग के मौजूदा विवाद के संदर्भ में एक बड़ी मांग भी रखी। उन्होंने कहा कि ज्ञानेश कुमार के कार्यकाल में जिन राज्यों में विधानसभा चुनाव हुए हैं, उन चुनावों की वैधता की समीक्षा की जानी चाहिए।

उन्होंने बिहार सहित प्रभावित राज्यों में 2024 की मतदाता सूची के आधार पर दोबारा विधानसभा चुनाव कराने की मांग की। यह मांग फिलहाल उनके राजनीतिक बयान के रूप में है; इसके संबंध में कोई न्यायिक आदेश या निर्वाचन आयोग की ऐसी घोषणा सामने नहीं आई है।

सुप्रीम कोर्ट से हस्तक्षेप की अपील

पूर्व मंत्री ने अंत में सर्वोच्च न्यायालय से मामले का स्वतः संज्ञान लेने की अपील की। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र, संविधान और नागरिकों के मताधिकार की सुरक्षा के लिए चुनावी संस्थाओं की कार्यप्रणाली में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित की जानी चाहिए।

उन्होंने कहा कि निर्वाचन संस्थाओं को कानून के दायरे में और निष्पक्ष तरीके से काम करना चाहिए तथा मतदाता सूची से जुड़े प्रत्येक निर्णय में योग्य नागरिकों के अधिकारों की रक्षा और प्रभावी अपील व्यवस्था को प्राथमिकता मिलनी चाहिए।

रिपोर्ट : अजय कुमार पाण्डेय.

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