एक हैरान करने वाला फैसला
27 अगस्त 2026 की सुबह जब अखबार खुले और टीवी चैनल्स पर ब्रेकिंग न्यूज़ फ्लैश हुई, तो देश भर के लोग दंग रह गए। नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) ने एक ऐसा फैसला सुनाया था जिसने आम आदमी को झकझोर दिया।
मीडिया बैरन और ज़ी ग्रुप के संस्थापक सुभाष चंद्रा के 22,006 करोड़ रुपये के कर्ज को सिर्फ 6.5 करोड़ रुपये में सेटल करने की मंजूरी दे दी गई। यानी कर्जदाताओं को अपने पैसे का सिर्फ 0.03 फीसदी ही वापस मिलेगा। बाकी 99.97 फीसदी कर्ज माफ हो गया।
इस फैसले के बाद देश की राजनीति गरमा गई और कांग्रेस के नेताओं ने मोदी सरकार पर जमकर हमला बोल दिया।
राहुल गांधी का बड़ा हमला: “दो सिस्टम चल रहे हैं देश में”
लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने इस फैसले पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि मोदी सरकार ने देश में दो अलग-अलग सिस्टम बना दिए हैं।
एक सिस्टम मुट्ठी भर अरबपतियों के लिए है, जो चाहे जितना कर्ज ले लें और फिर भी बच जाएं। दूसरा सिस्टम आम लोगों के लिए है, जिन पर बैंक और फाइनेंशियल इंस्टीट्यूशन तुरंत सख्ती से पेश आते हैं।
राहुल गांधी ने NCLT को “नेता-कंपनी लूट ट्रिब्यूनल” कहकर संबोधित किया और एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर एक पोस्ट में लिखा: “अगर कोई किसान 50,000 रुपये का कर्ज नहीं चुका पाता है, तो उसकी जमीन नीलाम कर दी जाती है। अगर कोई सैलरी वाला आदमी एक EMI भी नहीं दे पाता है, तो बैंक एजेंट उसके दरवाजे पर पहुंच जाते हैं। गरीब स्टूडेंट्स को पढ़ाई के लिए लोन भी नहीं मिल पाता है। लेकिन कुछ खास दोस्तों के लिए, बैंक का पैसा प्राइवेट प्रॉपर्टी है — जितना चाहें निकालो और जितना चाहें चुकाओ।”
जयराम रमेश का तंज: “यह हेयरकट नहीं, मुंडन है”
कांग्रेस के जनरल सेक्रेटरी और कम्युनिकेशंस के इंचार्ज जयराम रमेश ने इस मामले पर और भी कड़ी प्रतिक्रिया दी।
उन्होंने एक्स पर एक पोस्ट में समझाया कि बैंकिंग की भाषा में जब कोई कर्जदार बकाये की तुलना में बहुत कम राशि चुकाता है, तो उस नुकसान को “हेयरकट” कहा जाता है। लेकिन सुभाष चंद्रा वाले मामले में यह सिर्फ हेयरकट नहीं है।
जयराम रमेश ने कहा: “यह सिर्फ हेयरकट नहीं है। यह असल में एक मुंडन है और यह इंसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड, 2016 का पूरी तरह से मजाक उड़ाता है।”
उनका इशारा साफ था — इतना बड़ा हेयरकट (99.97%) इंसॉल्वेंसी कानून के मकसद के खिलाफ है।
रणदीप सुरजेवाला की मांग: “10 लाख करोड़ का डेटा लाओ”
कांग्रेस महासचिव और राज्यसभा सांसद रणदीप सिंह सुरजेवाला ने इस मामले को और गहराई से उठाया।
उन्होंने केंद्रीय वित्त मंत्री से मांग की कि वे पिछले 12 सालों का डेटा लेकर आएं कि NCLT के जरिए कितने लाख करोड़ रुपये हेयरकट में लुटे गए हैं।
सुरजेवाला ने कहा: “हेयरकट के नाम पर मोदी सरकार NCLT के ज़रिए जनता और बैंकों के पैसे की लूट होने दे रही है। यह आंकड़ा 10 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा हो सकता है। मैं यहां कोई अंदाजा नहीं लगा रहा हूं; मेरे पास कुछ जानकारी है।”
उन्होंने सवाल उठाया कि आप 50 फीसदी, 60 फीसदी, 70 फीसदी, 80 फीसदी, 90 फीसदी तो ठीक है, लेकिन 99 फीसदी का हेयरकट कैसे कर सकते हैं?
“तो फिर आप NCLT की कार्रवाई क्यों कर रहे हैं? यह हेयरकट की आड़ में उद्योगपतियों का लोन माफ करना है।”
सुभाष चंद्रा का पक्ष: “मैंने खुद कर्ज नहीं लिया था”
इस पूरे मामले में सुभाष चंद्रा ने भी अपना पक्ष रखा है। उन्होंने एक बयान जारी कर कहा कि मीडिया रिपोर्ट्स में उनके खिलाफ चल रहे इंसॉल्वेंसी प्रोसीडिंग्स की गलत तस्वीर पेश की गई है।
सुभाष चंद्रा ने स्पष्ट किया कि वे इस मामले में सिर्फ एक पर्सनल गारंटर थे और उन्होंने किसी भी लेनदार से सीधे तौर पर पैसा उधार नहीं लिया था।
एसेल ग्रुप के चेयरमैन ने कहा कि इंसॉल्वेंसी प्रोसीडिंग्स में कुल क्लेम्स की रकम को वर्तमान बकाया राशि के बराबर नहीं समझा जाना चाहिए।
HDFC Bank की प्रतिक्रिया: “अपील करने पर विचार कर रहे हैं”
इस फैसले से सबसे ज्यादा प्रभावित होने वाले लेनदारों में HDFC Bank भी शामिल है। बैंक ने इस मामले पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि वह NCLT के फैसले के खिलाफ नेशनल कंपनी लॉ अपीलेट ट्रिब्यूनल (NCLAT) में अपील करने पर विचार कर रहा है।
HDFC Bank ने कहा कि उनका एडमिटेड क्लेम कुल राशि का सिर्फ 3.2 फीसदी था और यह लोन फैसिलिटी HDFC लिमिटेड के साथ मर्जर के बाद उन्हें विरासत में मिली थी।
बैंक ने यह भी स्पष्ट किया कि इस फैसिलिटी के लिए पहले ही प्राविजन बना दिया गया था, इसलिए इससे बैंक पर तुरंत कोई बड़ा असर नहीं पड़ेगा।
LIC हाउसिंग को 1,300 करोड़ का नुकसान
इस सेटलमेंट से LIC हाउसिंग फाइनेंस को भी बड़ा नुकसान होने वाला है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, LIC हाउसिंग को इस सेटलमेंट में लगभग 1,300 करोड़ रुपये का नुकसान उठाना पड़ेगा।
यह सिर्फ एक उदाहरण है कि इस 99.97 फीसदी हेयरकट से कितने बड़े लेनदार प्रभावित हुए हैं।
विजय माल्या का तंज: “मुझसे तो डबल वसूल लिया गया”
इस पूरे मामले में एक और दिलचस्प प्रतिक्रिया आई भगोड़े बिजनेसमैन विजय माल्या की तरफ से। माल्या, जो खुद हजारों करोड़ रुपये के कर्ज के मामले में फंसे हैं, ने इस फैसले पर तंज कसते हुए कहा कि उनसे तो डबल रकम वसूल ली गई।
यह बयान सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुआ और लोगों ने इस पर तरह-तरह की प्रतिक्रियाएं दीं।
NCLT का फैसला: कैसे हुआ 99.97 फीसदी हेयरकट?
NCLT की स्पेशल बेंच ने सुभाष चंद्रा की 6.5 करोड़ रुपये की रिपेमेंट प्लान को मंजूरी दी है। इसमें 25 लाख रुपये इंसॉल्वेंसी कॉस्ट के तौर पर भी शामिल हैं।
इसका मतलब यह हुआ कि लेनदारों को हर 100 रुपये के क्लेम पर सिर्फ 3 पैसे ही वापस मिलेंगे। बाकी 99.97 फीसदी रकम का भुगतान नहीं होगा।
यह मामला सितंबर 2025 में NCLT की मूल बेंच के पास गया था, जहां दो सदस्यों के बीच अलग-अलग राय थी। इसके बाद फरवरी 2026 में मामला तीसरे सदस्य नीलेश शर्मा के पास भेजा गया, जिन्होंने अंततः इस रिपेमेंट प्लान को मंजूरी दे दी।
इंडियन एक्सप्रेस का विश्लेषण: “क्या इंसॉल्वेंसी सिस्टम काम कर रहा है?”
इंडियन एक्सप्रेस ने इस मामले पर एक एक्सप्लेनर आर्टिकल में सवाल उठाया है कि क्या इंसॉल्वेंसी सिस्टम वास्तव में रेजोल्यूशन दे रहा है या सिर्फ विशाल क्रेडिटर लॉस पर कानूनी मुहर लगा रहा है।
अखबार ने लिखा: “NCLT का यह ऑर्डर क्रेडिटर्स को उनके एडमिटेड dues का सिर्फ 0.03 फीसदी ही वापस दिलाएगा। इस राइट-डाउन का स्केल एक सवाल खड़ा करता है: क्या इंसॉल्वेंसी सिस्टम रेजोल्यूशन दे रहा है या सिर्फ विशाल क्रेडिटर लॉस पर कानूनी मुहर लगा रहा है?”
आम आदमी का सवाल: “क्या यह न्याय है?”
इस पूरे मामले ने आम आदमी के मन में एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। अगर एक किसान 50,000 रुपये का कर्ज नहीं चुका पाता है, तो उसकी जमीन नीलाम हो जाती है।
लेकिन जब कोई अरबपति 22,000 करोड़ रुपये का कर्ज नहीं चुका पाता है, तो उसे सिर्फ 6.5 करोड़ रुपये में सेटलमेंट की मंजूरी मिल जाती है।
यह दोहरा मापदंड देश के न्याय व्यवस्था और बैंकिंग सिस्टम पर गंभीर सवाल खड़ा करता है।
आगे क्या होगा?
अब यह मामला NCLAT (नेशनल कंपनी लॉ अपीलेट ट्रिब्यूनल) में जा सकता है, क्योंकि HDFC Bank जैसे कुछ लेनदार इस फैसले के खिलाफ अपील करने पर विचार कर रहे हैं।
साथ ही, कांग्रेस ने इस मामले को संसद में भी उठाने की तैयारी कर ली है। रणदीप सुरजेवाला की मांग है कि वित्त मंत्री को पिछले 12 सालों का पूरा डेटा सदन के पटल पर रखना चाहिए।
निष्कर्ष: एक बड़ा सवाल देश के सामने
सुभाष चंद्रा वाला यह मामला सिर्फ एक व्यक्ति या कंपनी तक सीमित नहीं है। यह देश की पूरी इंसॉल्वेंसी व्यवस्था, बैंकिंग सिस्टम और न्याय व्यवस्था पर एक बड़ा सवाल है।
क्या वाकई देश में दो सिस्टम चल रहे हैं? क्या आम आदमी और अरबपतियों के लिए अलग-अलग नियम हैं? यह सवाल अब सिर्फ राजनीतिक बयानबाजी का मुद्दा नहीं रहा, बल्कि देश की न्यायिक और आर्थिक व्यवस्था की विश्वसनीयता का सवाल बन गया है।
आने वाले दिनों में इस मामले का अंजाम क्या होगा और क्या इससे इंसॉल्वेंसी कानून में कोई बदलाव होगा, यह देखना दिलचस्प होगा।
रिपोर्ट : इस्मा टाइम्स न्यूज़ डेस्क.
