दिल्ली बेंच, NCLT ने सुभाष चंद्रा (Zee ग्रुप के संस्थापक) की पर्सनल इनसॉल्वेंसी रिजॉल्यूशन प्रोसेस में एक रिपेमेंट प्लान को मंजूरी दे दी है। इस प्लान के तहत क्रेडिटर्स को कुल मिलाकर सिर्फ 6.5 करोड़ रुपये मिलेंगे—जबकि उनके एडमिटेड क्लेम्स 22,006.57 करोड़ रुपये हैं। ये फैसला IBC की धारा 114 के तहत आता है, और मंजूर होने के बाद धारा 115 के मुताबिक़ ये प्लान सभी कर्जदाताओं (चाहे उन्होंने विरोध किया हो या नहीं) पर बाइंडिंग हो जाता है।
क्यों हुआ इतना बड़ा हेयरकट?
NCLT के आदेश और रिपोर्ट्स के मुताबिक़, रेजोल्यूशन प्रोफेशनल ने अपनी रिपोर्ट में बताया कि सुभाष चंद्रा की निजी संपत्तियों की वैल्यू 6.5 करोड़ से भी कम आंकी गई है। ऐसे में, कानूनी प्रक्रिया के तहत जो रिपेमेंट प्लान आया, वो उनकी उपलब्ध एसेट्स और क्रेडिटर्स की वोटिंग मैजॉरिटी (80.81% असेंटिंग क्रेडिटर्स) पर आधारित था। ट्रिब्यूनल ने साफ कहा कि वो क्रेडिटर्स के “कमर्शियल विजडम” में दखल नहीं दे सकता—उसका काम सिर्फ कानूनी प्रक्रिया की निगरानी करना है।
LIC हाउसिंग फाइनेंस को सबसे बड़ा झटका: 1,322 करोड़ के क्लेम पर सिर्फ 38 लाख
इस पूरे सेटलमेंट में सबसे बड़ा असर LIC हाउसिंग फाइनेंस (LICHFL) पर पड़ा है। LICHFL का एडमिटेड क्लेम 1,322.39 करोड़ रुपये था, लेकिन मंजूर प्लान के तहत उसे सिर्फ 38,09,294 रुपये (लगभग 38.09 लाख) मिलने वाले हैं—यानी उसके कुल बकाये का महज 0.028%। LICHFL ने ट्रिब्यूनल में इस प्लान को गैर-व्यावहारिक और गैर-कानूनी करार दिया था, लेकिन NCLT ने उसकी दलीलों को खारिज कर दिया।
विरोध करने वाले क्रेडिटर्स भी अब बाउंड—क्यों?
NCLT ने अपने आदेश में IBC की धारा 115 का हवाला देते हुए साफ किया कि मंजूर रिपेमेंट प्लान सभी क्रेडिटर्स पर लागू होगा—भले ही उन्होंने विरोध किया हो। इसका मतलब, जो संस्थान इस प्लान के खिलाफ थे, वे अब अलग से वसूली के लिए कोई नई कानूनी लड़ाई नहीं लड़ सकते। ट्रिब्यूनल का तर्क था कि असेंटिंग क्रेडिटर्स की वोटिंग शेयर 80.81% थी, जबकि डिसेंटिंग क्रेडिटर्स की शेयर 20% से कम थी—इसलिए प्लान पास हो गया।
क्या ये कानूनी प्रक्रिया सही थी? NCLT की बेंच में क्या हुआ?
ये मामला शुरू में दो सदस्यों वाली मूल बेंच के पास था, जहाँ दोनों जजों की राय नहीं मिल पाई थी। इसके बाद नीलेश शर्मा को तीसरे न्यायिक सदस्य के तौर पर नियुक्त किया गया, और उनके फैसले के बाद प्लान पर अंतिम मुहर लग गई। NCLT ने प्लान को कुछ शर्तों के साथ मंजूर किया—मसलन, अनिल कुमार और सुनील जैन की तरफ से दायर 1,260 व्यक्तियों के क्लेम्स को फाइनल क्रेडिटर लिस्ट से बाहर रखने का निर्देश दिया, ताकि बची राशि शेष eligible क्रेडिटर्स में बांटी जा सके। अब मामला वापस ओरिजिनल दो-सदस्यीय बेंच के पास जाएगा, जो Companies Act की धारा 419(5) के तहत फॉर्मल ऑर्डर पास करेगी।
बाजार का रिएक्शन: ZEEL शेयरों में तेजी
दिलचस्प बात ये कि इस खबर के बाद शेयर बाजार में Zee एंटरटेनमेंट (ZEEL) के शेयरों में तेजी देखी गई। रिपोर्ट्स के मुताबिक़, गुरुवार को ZEEL के शेयर 0.43% चढ़कर 104.85 रुपये पर कारोबार कर रहे थे, और पिछले छह महीनों में स्टॉक करीब 20% उछल चुका है। मार्केट का ये रिएक्शन इस बात की तरफ इशारा करता है कि निवेशक इस रिजॉल्यूशन को कंपनी के लिए एक तरह का क्लियरेंस मान रहे हैं—भले ही क्रेडिटर्स को भारी हेयरकट लगा हो।
आम आदमी vs बड़े डिफाल्टर्स: सिस्टम का दोहरा मापदंड?
आपके टेक्स्ट में जो सवाल उठाया गया है—कि आम आदमी अगर एक EMI चूक जाए तो रिकवरी एजेंट्स उसका जीना मुहाल कर देते हैं, जबकि बड़े उद्योगपतियों के मामले में सिस्टम का रवैया बदल जाता है—ये सवाल अब सिर्फ सोशल मीडिया तक सीमित नहीं रहा। कांग्रेस समेत कई राजनीतिक हलकों ने इस फैसले पर सवाल उठाए हैं, और कुछ ने इसे IBC की روح के खिलाफ़ तक करार दिया है। वहीं, कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि IBC का मकसद ही “रिजॉल्यूशन” है, न कि सिर्फ वसूली—लेकिन जब रिजॉल्यूशन में 99.97% हेयरकट हो, तो सवाल लाजिमी है कि क्या ये प्रक्रिया वाकई सभी हितधारकों के लिए न्यायसंगत है।
आगे क्या होगा?
अब रेजोल्यूशन प्रोफेशनल को बकायेदारों की फाइनल लिस्ट तैयार करनी है, जिसके बाद ओरिजिनल बेंच औपचारिक आदेश जारी करेगी। धारा 115 के तहत ये प्लान सभी पर बाइंडिंग है, इसलिए विरोध करने वाले क्रेडिटर्स के पास अब अलग से वसूली का कोई रास्ता नहीं बचता। इस पूरे प्रोसेस का असर न सिर्फ LICHFL जैसे संस्थानों पर पड़ेगा, बल्कि भविष्य में पर्सनल इनसॉल्वेंसी के मामलों में क्रेडिटर्स की रणनीति और NCLT के रुख पर भी असर डाल सकता है।
रिपोर्ट : इस्मा टाइम्स न्यूज़ डेस्क.
