लाल किले की प्राचीर से जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 15 अगस्त को देश को संबोधित किया तो एक शब्द ने सारी सियासत हिला दी। उन्होंने कहा—हथियारी नक्सल तो चले गए, लेकिन दिमागी नक्सल अभी भी मौके की ताक में बैठे हैं। हिंसा और अराजकता के नए रास्ते खोज रहे हैं। इन्हें पहचानना होगा, अलग-थलग करना होगा और युवा पीढ़ी को विकसित भारत की मुख्यधारा से जोड़ना होगा।
यह बात सुनते ही विपक्ष में हलचल मच गई।
विपक्ष का पलटवार
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पी. चिदंबरम ने तुरंत लिखा—“मुझे दिमागी नक्सल होने पर गर्व है।” अरविंद केजरीवाल ने भी कहा—“हाँ, मैं दिमागी नक्सल हूँ क्योंकि मैं देशभक्त हूँ और मुझे इस पर नाज़ है।” कई और नेताओं ने भी खुद को इसी खाने में डाल दिया। उनका कहना था कि पहले अर्बन नक्सल कहा जाता था, अब दिमागी नक्सल का नया लेबल चिपका दिया गया है। आलोचना को दबाने की कोशिश बताई जा रही थी।
सरकार की सफ़ाई
केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने साफ़ कर दिया कि प्रधानमंत्री ने किसी विपक्षी नेता को दिमागी नक्सल नहीं कहा। उनका इशारा सिर्फ़ उन लोगों की ओर था जो
माओवादियों का साथ देते हैं और भारतीय संविधान को नहीं मानते,
अलगाववादियों के साथ खड़े होकर अनुच्छेद 370 का समर्थन करते हैं,
और चिकन नेक काटकर पूर्वोत्तर को देश से अलग करने की बात करते हैं।
असल मायने क्या थे?
मोदी जी ने याद दिलाया कि सालों तक माओवादी सोच वाले लोग सत्ता के गलियारों और सरकारी कमेटियों में बैठे रहे। हथियारबंद नक्सलवाद अब अपनी आख़िरी साँसें गिन रहा है, लेकिन वैचारिक नक्सल अभी भी समाज को गलत राह पर घसीटने की फिराक में हैं। युवाओं को इनसे बचाना और विकास की राह पर लाना ज़रूरी है।
कुछ लोग कहते हैं कि विपक्ष खुद इस जाल में फँस गया जब उन्होंने गर्व से यह ठप्पा अपने सिर पर लगा लिया। कुछ और कहते हैं कि यह असंतोष को नक्सल बताकर चुप कराने की कोशिश है। दोनों तरफ़ से आरोप-प्रत्यारोप चल रहा है।
यह कोई नया विवाद नहीं। पहले भी अर्बन नक्सल, तुक्ड़े-तुक्ड़े गैंग जैसे शब्द आते रहे हैं। लेकिन लाल किले से दिए गए इस बयान ने एक बार फिर सियासी पारा चढ़ा दिया है। देश देख रहा है कि आगे यह बहस कहाँ तक जाती है।
रिपोर्ट : इस्मा टाइम्स न्यूज़ डेस्क.
