‘वंदे मातरम्’ विवाद पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई, टी.एम. कृष्णा की याचिका पर उठे अंतरात्मा और धार्मिक स्वतंत्रता के सवाल

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नई दिल्ली, 6 अक्टूबर 2026: ‘वंदे मातरम्’ के सभी छह अंतरों के गायन और राष्ट्रीय सम्मान से जुड़े कानून में 2026 में किए गए संशोधन को लेकर सुप्रीम कोर्ट में महत्वपूर्ण सुनवाई हुई। कर्नाटक संगीत के प्रसिद्ध कलाकार टी.एम. कृष्णा ने Prevention of Insults to National Honour Act, 1971 में किए गए संशोधन के साथ-साथ गृह मंत्रालय की ओर से जारी उन निर्देशों को चुनौती दी है, जिनमें निर्धारित सरकारी एवं आधिकारिक आयोजनों में ‘वंदे मातरम्’ के छह अंतरों के गायन का प्रावधान किया गया है।

सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने इस मामले में केंद्र सरकार से जवाब मांगा है। पीठ में मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत के साथ न्यायमूर्ति जॉयमाला बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना शामिल थे। अदालत ने मौखिक रूप से यह भी कहा कि धार्मिक अंतरात्मा के आधार पर राष्ट्रीय गीत नहीं गाने वाले व्यक्ति को दंडात्मक कार्रवाई का सामना नहीं करना चाहिए और 1986 के बिजो एमैनुएल फैसले में तय सिद्धांत को ध्यान में रखा जाना चाहिए। मामले की अगली सुनवाई 12 अक्टूबर 2026 को सूचीबद्ध की गई है।

याचिका में क्या संवैधानिक सवाल उठाए गए?

टी.एम. कृष्णा की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. एस. मुरलीधर ने दलील दी कि राष्ट्रीय गीत से जुड़े नए कानूनी प्रावधान और छह अंतरों के गायन संबंधी निर्देश अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, अंतरात्मा की स्वतंत्रता और धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़े संवैधानिक सवाल खड़े करते हैं।

याचिका में विशेष रूप से ‘वंदे मातरम्’ के अंतिम चार अंतरों को लेकर आपत्ति दर्ज की गई है। याचिकाकर्ता का कहना है कि इन अंतरों में धार्मिक प्रतीकों और हिंदू देवी-देवताओं से संबंधित संदर्भ हैं और किसी व्यक्ति को इन्हें गाने के लिए बाध्य करना संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) और 25(1) से जुड़े अधिकारों के संदर्भ में जांच का विषय है।

अदालत ने हालांकि यह स्पष्ट किया कि ‘राष्ट्रीय गीत’ क्या होगा, यह तय करना लोकतांत्रिक राज्य के अधिकार क्षेत्र का विषय है। पीठ ने अपना ध्यान मुख्य रूप से इस सवाल पर केंद्रित किया कि नए कानून के तहत धार्मिक आधार पर गीत न गाने वाले व्यक्ति के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई की जा सकती है या नहीं।

सॉलिसिटर जनरल की टिप्पणी पर भी आपत्ति

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से पेश डॉ. मुरलीधर ने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता की एक टिप्पणी पर आपत्ति जताई। रिपोर्टों के अनुसार, बहस के दौरान ‘नक्सली’ शब्द का इस्तेमाल हुआ, जिस पर डॉ. मुरलीधर ने आपत्ति दर्ज कराई और कहा कि ऐसी भाषा एक वरिष्ठ विधि अधिकारी के लिए उचित नहीं है।

अदालत ने इस मौखिक आदान-प्रदान को अपने आदेश का हिस्सा नहीं बनाया। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, पीठ ने कहा कि वह इस टिप्पणी का संज्ञान नहीं ले रही है।

1986 का ‘बिजो एमैनुएल’ फैसला क्यों महत्वपूर्ण है?

इस पूरे विवाद में सुप्रीम कोर्ट का 1986 का Bijoe Emmanuel v. State of Kerala फैसला महत्वपूर्ण संदर्भ बनकर सामने आया है। उस मामले में यहोवा के साक्षी समुदाय से जुड़े तीन विद्यार्थियों ने अपनी धार्मिक अंतरात्मा के आधार पर राष्ट्रगान नहीं गाया था, लेकिन राष्ट्रगान के दौरान सम्मानपूर्वक खड़े रहे थे।

सुप्रीम कोर्ट ने उस मामले में विद्यार्थियों के मौलिक अधिकारों की रक्षा की थी। 22 सितंबर की सुनवाई में भी पीठ ने इसी फैसले का उल्लेख करते हुए कहा कि उसके द्वारा स्थापित कानून को संशोधित प्रावधान पर लागू किया जाना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी का अर्थ यह है कि किसी व्यक्ति द्वारा अंतरात्मा या धार्मिक स्वतंत्रता के आधार पर राष्ट्रीय गीत न गाने के मामले में उसे स्वतः आपराधिक कार्रवाई का सामना नहीं करना चाहिए। हालांकि, अदालत ने अभी इस मामले में अंतिम संवैधानिक फैसला नहीं दिया है।

‘वंदे मातरम्’ के छह अंतरों को लेकर विवाद

टी.एम. कृष्णा की याचिका में यह भी सवाल उठाया गया है कि आधिकारिक आयोजनों में ‘वंदे मातरम्’ के सभी छह अंतरों को गाने की व्यवस्था किस सीमा तक लागू की जा सकती है।

मामले में यह अंतर भी महत्वपूर्ण है कि 2026 का संशोधन मुख्य रूप से राष्ट्रीय गीत के गायन को जानबूझकर रोकने या उसके गायन में सभा के दौरान व्यवधान पैदा करने को दंडनीय बनाता है। रिपोर्टों के अनुसार इसमें तीन वर्ष तक की सजा, जुर्माना या दोनों का प्रावधान है। इसलिए कानून को सीधे तौर पर हर व्यक्ति के लिए छह अंतरे गाना अनिवार्य करने वाला दंड प्रावधान बताना कानूनी स्थिति को जरूरत से ज्यादा व्यापक रूप में प्रस्तुत करेगा।

इतिहास में पहली दो पंक्तियों को लेकर बनी थी सहमति

पीपुल्स इंटीग्रेशन काउंसिल की ओर से जारी बयान में ‘वंदे मातरम्’ के इतिहास और स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान इसके इस्तेमाल का भी उल्लेख किया गया है। बयान में कहा गया है कि 1937 में कांग्रेस कार्यसमिति ने रवींद्रनाथ टैगोर की सलाह के बाद गीत के शुरुआती दो अंतरों को स्वीकार किया था।

बयान में यह भी कहा गया है कि बाद के अंतरों में धार्मिक प्रतीकों और देवी-देवताओं से जुड़े संदर्भ होने के कारण उस समय सभी समुदायों को साथ रखने के उद्देश्य से शुरुआती हिस्से को प्राथमिकता दी गई थी। यह ऐतिहासिक व्याख्या बयान जारी करने वाले संगठन के दृष्टिकोण के रूप में प्रस्तुत की गई है।

24 जनवरी 1950 को संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने ‘वंदे मातरम्’ को राष्ट्रीय गीत के रूप में स्वीकार किए जाने और ‘जन गण मन’ के साथ इसे समान सम्मान दिए जाने की बात कही थी। इस ऐतिहासिक संदर्भ का उल्लेख भी वर्तमान विवाद में किया जा रहा है।

PIC ने सॉलिसिटर जनरल की टिप्पणी वापस लेने की मांग की

पीपुल्स इंटीग्रेशन काउंसिल (PIC) ने अपने बयान में डॉ. मुरलीधर की आपत्ति का समर्थन करते हुए सॉलिसिटर जनरल से विवादित टिप्पणी वापस लेने की मांग की है।

PIC का कहना है कि न्यायालय में संवैधानिक और कानूनी सवालों पर बहस के दौरान व्यक्तिगत या राजनीतिक लेबल के बजाय तर्क और कानून के आधार पर चर्चा होनी चाहिए। संगठन ने सुप्रीम कोर्ट से भी न्यायिक कार्यवाही में इस प्रकार की भाषा के इस्तेमाल को लेकर स्पष्टता की मांग की है।

हालांकि, ये PIC की ओर से जारी मांगें और राजनीतिक-सामाजिक टिप्पणी हैं; इन्हें सुप्रीम कोर्ट के अंतिम निष्कर्ष के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

PIC की ओर से जारी बयान में शामिल प्रमुख नाम

पीपुल्स इंटीग्रेशन काउंसिल की ओर से जारी बयान में न्यायमूर्ति इकबाल अंसारी, पूर्व मुख्य न्यायाधीश पटना हाई कोर्ट; न्यायमूर्ति अमर सरन, पूर्व न्यायाधीश इलाहाबाद हाई कोर्ट; अधिवक्ता संजय हेगड़े; एयर वाइस मार्शल (सेवानिवृत्त) कपिल काक; वरिष्ठ पत्रकार जान दयाल; प्रो. राधा कुमार; ललिता रामदास; अदिति घोष मेहता, आईएएस (सेवानिवृत्त); तीस्ता सीतलवाड़; शबनम हाशमी; प्रो. इरा भास्कर; प्रो. मृदुला मुखर्जी; राजशेखर; अहमद जावेद; विक्रम कृष्णा; अनीता मैथ्यू इद्दुकी; लुबना सरवत; देव देसाई; नवेद हामिद सहित कई लोगों के नाम शामिल हैं। फिलहाल मामला सुप्रीम कोर्ट के समक्ष विचाराधीन है। अगली सुनवाई में केंद्र सरकार का जवाब और अदालत की आगे की कार्यवाही इस विवाद के संवैधानिक पहलुओं को लेकर महत्वपूर्ण होगी।

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