SIR और Form 6 को लेकर चुनाव आयोग में आपत्तियों के दावे पर कांग्रेस ने उठाए सवाल

Share this News

गया, बिहार | 23 सितंबर 2026: चुनाव आयोग के भीतर विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR, Form 6 में किए गए बदलाव और मतदाता सूची से जुड़े कुछ फैसलों को लेकर दो चुनाव आयुक्तों की कथित आपत्तियों की रिपोर्ट सामने आने के बाद कांग्रेस नेताओं ने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए हैं।

बिहार प्रदेश कांग्रेस कमिटी के प्रदेश प्रतिनिधि विजय कुमार मिट्ठू, पूर्व विधायक मोहम्मद खान अली, जिला कांग्रेस उपाध्यक्ष बाबूलाल प्रसाद सिंह, इंटक महासचिव टिंकू गिरी और विपिन बिहारी सिन्हा ने इस मामले को लेकर अपनी प्रतिक्रिया दी।

Form 6 में बदलाव को लेकर आपत्ति का दावा

कांग्रेस नेताओं ने कहा कि सामने आई रिपोर्ट के अनुसार चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले करीब 10 महीनों के दौरान आयोग के कुछ फैसलों को लेकर आपत्तियां दर्ज की थीं।

The Indian Express की 23 सितंबर की रिपोर्ट के अनुसार, दोनों चुनाव आयुक्तों ने नए मतदाताओं के लिए इस्तेमाल होने वाले Form 6 में SIR से संबंधित घोषणा जोड़े जाने पर आपत्ति दर्ज की थी। रिपोर्ट के मुताबिक, विवेक जोशी ने कहा था कि कानून या नियमों में सक्षम प्राधिकारी की मंजूरी के बिना वैधानिक Form 6 में बदलाव नहीं किया जा सकता। बाद में संधू ने भी इस आपत्ति से सहमति जताई थी।

रिपोर्ट के अनुसार, Form 6 में नए मतदाताओं से यह जानकारी मांगी गई थी कि उनका, उनके माता-पिता या दादा-दादी का नाम पहले हुए SIR के दौरान मतदाता सूची में था या नहीं।

पश्चिम बंगाल SIR को लेकर भी सवालों का जिक्र

कांग्रेस नेताओं ने पश्चिम बंगाल में SIR के दौरान मतदाताओं के नाम हटाने और अपील से जुड़े मामलों का भी उल्लेख किया।

हालिया रिपोर्टों के अनुसार, पश्चिम बंगाल SIR से संबंधित 38.20 लाख अपीलों में से करीब 1.02 लाख मामलों का ही निपटारा हुआ था, जबकि बड़ी संख्या में अपीलें लंबित थीं। इन आंकड़ों का उल्लेख निर्वाचन आयोग की ओर से सुप्रीम कोर्ट में दाखिल जवाब के संदर्भ में हुआ है।

कांग्रेस नेताओं ने इन घटनाक्रमों को लेकर मतदाता सूची की पारदर्शिता और निर्वाचन प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं।

1995 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले का दिया हवाला

कांग्रेस नेताओं ने T.N. Seshan v. Union of India मामले में 1995 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि बहु-सदस्यीय निर्वाचन आयोग में सभी चुनाव आयुक्तों की निर्णय प्रक्रिया में भूमिका होती है।

1995 के फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि निर्वाचन आयोग एक बहु-सदस्यीय निकाय है और चुनाव आयुक्त निर्णय प्रक्रिया में भूमिका रखते हैं। फैसले में यह भी कहा गया कि यदि मुख्य चुनाव आयुक्त को इस अर्थ में सर्वोच्च माना जाए कि उसका निर्णय अंतिम हो, तो अन्य चुनाव आयुक्तों की भूमिका प्रभावहीन हो सकती है।

हालांकि, कांग्रेस नेताओं द्वारा इस्तेमाल किए गए “First Among Equals” वाले वर्णन को सीधे 1995 के फैसले का निष्कर्ष मानना सही नहीं होगा। फैसले में CEC की स्थिति और बहु-सदस्यीय आयोग की निर्णय प्रक्रिया पर विस्तृत चर्चा की गई है।

चुनाव आयोग ने आंतरिक मतभेद के दावे को खारिज किया

इस बीच, निर्वाचन आयोग से जुड़े सूत्रों ने Hindustan Times को बताया कि आयोग के सभी निर्णयों, जिसमें SIR भी शामिल है, को तीनों चुनाव आयुक्तों की मंजूरी प्राप्त थी। आयोग के सूत्रों ने कथित “आंतरिक असहमति” की रिपोर्ट को खारिज किया है।

रिपोर्ट के अनुसार, दो चुनाव आयुक्तों द्वारा कुछ मामलों में आपत्तियां दर्ज किए जाने की बात सामने आई थी, जिनमें Form 6 में बदलाव, मतदाता डेटा से जुड़े नियंत्रण और पश्चिम बंगाल में मतदाता अपीलों जैसे मुद्दे शामिल थे। आयोग का कहना है कि अंतिम निर्णय सर्वसम्मति से लिए गए।

कांग्रेस ने जांच और कार्रवाई की मांग की

कांग्रेस नेताओं ने इन घटनाक्रमों के आधार पर मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ कार्रवाई की मांग उठाई है। उन्होंने मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाने तथा उनके कार्यकाल के दौरान लिए गए फैसलों और कथित अनियमितताओं की जांच कराने की मांग की।

कांग्रेस नेताओं का कहना है कि निर्वाचन प्रक्रिया में पारदर्शिता और सभी चुनाव आयुक्तों की संस्थागत भूमिका सुनिश्चित होना जरूरी है।

वहीं, चुनाव आयोग की ओर से सामने आए पक्ष के अनुसार, आयोग के फैसले सामूहिक रूप से लिए गए हैं। ऐसे में Form 6, SIR और मतदाता सूची से जुड़े मामलों में दर्ज आपत्तियों तथा अंतिम निर्णयों की वास्तविक संवैधानिक और कानूनी स्थिति संबंधित दस्तावेजों एवं आगे की आधिकारिक प्रक्रिया से स्पष्ट होगी।

रिपोर्ट : विश्वनाथ आनंद.

Share this News

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *