मेदिनीनगर, झारखंड | 24 सितंबर 2026: झारखंड प्रदेश राजीव गांधी विचार समिति के अध्यक्ष हृदयानंद मिश्र ने निर्वाचन आयोग के भीतर दो निर्वाचन आयुक्तों द्वारा पिछले 10 महीनों में दर्ज कराई गई कथित आपत्तियों को लेकर पारदर्शिता की मांग की है। उन्होंने कहा कि यह मुद्दा केवल चुनावी प्रक्रिया तक सीमित नहीं है, बल्कि मतदाता अधिकार और निर्वाचन संस्थाओं में जनता के विश्वास से भी जुड़ा है।
हाल ही में द इंडियन एक्सप्रेस की एक जांच रिपोर्ट में दावा किया गया कि निर्वाचन आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 बार आयोग के कुछ फैसलों और प्रक्रियाओं पर औपचारिक आपत्तियां दर्ज कीं। रिपोर्ट में Form 6 में बदलाव, मतदाता नाम जोड़ने और हटाने, नाम बहाल करने तथा चुनावी डेटा के नियंत्रण से जुड़े मुद्दों का उल्लेख किया गया है।
मतदाता सूची से जुड़े फैसलों पर उठे सवाल
हृदयानंद मिश्र ने कहा कि रिपोर्ट में जिन आपत्तियों का उल्लेख किया गया है, उनमें मतदाता पंजीकरण, नाम हटाने और बहाली तथा Form 6 में बदलाव जैसे विषय शामिल हैं।
द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, मई में दोनों निर्वाचन आयुक्तों ने Form 6 में SIR से जुड़ा नया सवाल जोड़ने की वैधानिक प्रक्रिया पर आपत्ति जताई थी। रिपोर्ट के मुताबिक, बाद में संधू ने इस बदलाव को “unauthorised” और “illegal” बताते हुए इसे हटाने की बात कही थी।
चुनावी डेटा के नियंत्रण का मुद्दा भी रिपोर्ट में शामिल
रिपोर्ट में निर्वाचन रोल से जुड़े डिजिटल सिस्टम और उसके नियंत्रण को लेकर भी सवालों का उल्लेख किया गया है। इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, दोनों निर्वाचन आयुक्तों ने चुनावी डेटाबेस तक पहुंच और उसके केंद्रीकरण से जुड़े विषयों पर भी आपत्तियां दर्ज की थीं।
हृदयानंद मिश्र ने कहा कि मतदाता सूची में किसी योग्य नागरिक का नाम जोड़ना या किसी मतदाता का नाम हटाना केवल प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं है। उनके अनुसार, ऐसी कार्रवाई का सीधा संबंध नागरिक के मतदान के अधिकार से है और इसलिए प्रत्येक बदलाव के पीछे स्पष्ट प्रक्रिया, रिकॉर्ड और प्रभावी अपील व्यवस्था होनी चाहिए।
निर्वाचन आयोग ने बताया अलग-अलग मत सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा
इस मामले में निर्वाचन आयोग की ओर से अलग पक्ष भी सामने आया है। आयोग के अधिकारियों ने हिंदुस्तान टाइम्स को बताया कि SIR सहित आयोग के सभी फैसलों को तीनों निर्वाचन आयुक्तों की मंजूरी प्राप्त थी।
आयोग ने यह भी कहा कि बहु-सदस्यीय संवैधानिक संस्था में अलग-अलग राय, टिप्पणियां और सुझाव आंतरिक निर्णय प्रक्रिया का सामान्य हिस्सा हैं। आयोग के अनुसार, अंतिम महत्वपूर्ण निर्णय सर्वसम्मति से लिए गए।
हृदयानंद मिश्र ने मांगी पूरी जानकारी सार्वजनिक करने की मांग
हृदयानंद मिश्र ने कहा कि यदि निर्वाचन आयोग के भीतर किसी निर्णय की प्रक्रिया, अधिकार या पारदर्शिता को लेकर लिखित आपत्तियां दर्ज हुई हैं, तो उन आपत्तियों और उनके निस्तारण की जानकारी सार्वजनिक होनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि निर्वाचन आयोग को स्पष्ट करना चाहिए कि सामने आई आपत्तियां किन निर्णयों से संबंधित थीं, उन पर क्या कार्रवाई हुई और मतदाता सूची तथा उसके डिजिटल डेटाबेस की सुरक्षा एवं जवाबदेही के लिए कौन-कौन से संस्थागत नियंत्रण मौजूद हैं।
मतदाता के अपील अधिकार पर दिया जोर
मिश्र ने कहा कि मतदाता सूची में संशोधन के दौरान योग्य नागरिकों के अधिकारों की सुरक्षा के लिए स्पष्ट कानूनी प्रक्रिया और प्रभावी अपील का अवसर जरूरी है।
उन्होंने कहा कि किसी भी नागरिक को मतदाता सूची से संबंधित निर्णय के खिलाफ अपनी बात रखने और निर्धारित प्रक्रिया के तहत अपील करने का प्रभावी अवसर मिलना चाहिए। उनके अनुसार, चुनावी संस्थाओं की विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए पारदर्शिता और जवाबदेही महत्वपूर्ण हैं।
कहा- तथ्यों को सार्वजनिक करने से मजबूत होगा भरोसा
हृदयानंद मिश्र ने कहा कि लोकतंत्र में सरकारें और राजनीतिक दल बदलते रहते हैं, लेकिन नागरिक का मताधिकार बना रहता है। उन्होंने निर्वाचन प्रक्रिया से जुड़े महत्वपूर्ण निर्णयों में पारदर्शिता, विधिक प्रक्रिया और संस्थागत निगरानी को प्राथमिकता देने की मांग की।
उन्होंने कहा कि निर्वाचन संस्थाओं में जनता के भरोसे को बनाए रखने के लिए केवल आश्वासन पर्याप्त नहीं हैं, बल्कि संबंधित तथ्यों और प्रक्रियाओं को स्पष्ट रूप से सार्वजनिक किया जाना चाहिए।
रिपोर्ट : विश्वनाथ आनंद.
