बिहार प्रदेश (24 सितंबर 2026) : यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता. (जहाँ नारियों की पूजा होती है, वहाँ देवता निवास करते हैं) मनुस्मृति के इस पवित्र श्लोक का संदेश पूरी दुनिया को देने वाला मेरा भारत देश में आज स्थितियां इसके विपरीत नजर आ रही हैं. आधी आबादी की सुरक्षा और सम्मान दांव पर लगा है.
अखबार के पन्ने हों या समाचार चैनल, हर दिन महिलाओं के साथ होने वाली बर्बरता, बलात्कार, घरेलू हिंसा और उत्पीड़न की खबरें दिल दहला देती हैं। देश की तरक्की के बड़े-बड़े दावों के बीच, महिलाओं के खिलाफ बढ़ते अपराध भारत के माथे पर एक ऐसा कलंक हैं जो वैश्विक स्तर पर देश की छवि को धूमिल कर रहा है.
अपराधों का बदलता और डरावना स्वरूप
आज महिलाएं न तो घर के भीतर सुरक्षित हैं और न ही बाहर। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के आंकड़े बताते हैं कि हर साल महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों की संख्या में बेतहाशा इजाफा हो रहा है। बलात्कार और सामूहिक बलात्कार: निर्भया कांड से लेकर हाल के वर्षों में हुए कई मामलों तक, अपराधियों की क्रूरता ने मानवता को शर्मसार किया है.
घरेलू हिंसा और दहेज उत्पीड़न: आधुनिक समाज में भी महिलाएं चारदीवारी के भीतर मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना का शिकार हो रही हैं. डिजिटल और साइबर अपराध: सोशल मीडिया के दौर में डीपफेक, ऑनलाइन हैरेसमेंट, स्टॉकिंग (पीछा करना) और ब्लैकमेलिंग के मामले तेजी से बढ़े हैं.
कार्यस्थल पर उत्पीड़न: आर्थिक रूप से स्वतंत्र होने की कोशिश कर रही महिलाओं को ऑफिस या कार्यस्थलों पर भी असुरक्षित माहौल का सामना करना पड़ता है.
इस कलंक के मुख्य कारण क्या हैं?
नशे का बढ़ता प्रचलन !
इंटरनेट पर आसानी से उपलब्ध अश्लील सामग्री और तकनीक के गलत इस्तेमाल ने युवा पीढ़ी की मानसिकता को विकृत कर दिया है.
उन्हें वस्तु के रूप में देखने की सोच ही अपराधों को जन्म देती है.
कानून के क्रियान्वयन में देरी:
भारत में कड़े कानून तो मौजूद हैं (जैसे पॉक्सो एक्ट, फास्ट ट्रैक कोर्ट), लेकिन न्याय मिलने में लगने वाला लंबा वक्त अपराधियों के हौसले बुलंद करता है.
संस्कारों और नैतिक शिक्षा की कमी:
शिक्षा का प्रसार तो हुआ है, लेकिन नैतिक मूल्यों और महिलाओं के प्रति सम्मान की भावना की कमी साफ दिखाई देती है.
इस कलंक को मिटाने के उपाय इस समस्या का समाधान केवल मोमबत्तियां जलाने या कड़े कानून बनाने से नहीं होगा, इसके लिए जमीनी स्तर पर बड़े बदलावों की जरूरत है:कानून का डर: अपराधियों को त्वरित और कठोर सजा मिलनी चाहिए, ताकि समाज में एक कड़ा संदेश जाए कि महिलाओं के साथ अपराध करने वाले बच नहीं सकते.
मानसिकता में बदलाव:
लड़कों को बचपन से ही महिलाओं का सम्मान करने और ‘सहमति’ (Consent) का मतलब समझने की शिक्षा घर और स्कूल दोनों जगह दी जानी चाहिए .
सुरक्षित बुनियादी ढांचा:
सार्वजनिक स्थानों पर सीसीटीवी कैमरों की संख्या बढ़ाना, स्ट्रीट लाइट्स की उचित व्यवस्था और प्रभावी पुलिस गश्त बेहद जरूरी है.
आत्मरक्षा का प्रशिक्षण:
बेटियों को शारीरिक और मानसिक रूप से मजबूत बनाने के लिए स्कूलों में आत्मरक्षा (Self-Defense) की ट्रेनिंग अनिवार्य की जानी चाहिए.
निष्कर्ष :
महिलाओं की सुरक्षा केवल सरकार या पुलिस की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि यह पूरे समाज का सामूहिक दायित्व है.जब तक देश की आधी आबादी भयमुक्त होकर खुले आसमान में सांस नहीं ले पाएगी, तब तक भारत की हर प्रगति अधूरी है. भारत के माथे से इस कलंक को मिटाने के लिए हम सभी को अपनी सोच बदलनी होगी और एक ऐसे सुरक्षित समाज का निर्माण करना होगा जहाँ हर महिला खुद को सम्मानित और सुरक्षित महसूस कर सके.
साथ ही मेरा निवेदन तमाम सम्मानित बहन बेटियों से भी है कि वो इसे गंभीरता से समझें — कि स्वतंत्रता बिना किसी ज़िम्मेदारी या आत्म-नियंत्रण के “अति” (Excess) में बदल जाती है, तो वह केवल व्यक्ति के लिए ही नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए हानिकारक साबित हो सकती है.
मर्यादा का अर्थ बंधन नहीं, बल्कि एक ऐसा आत्म-अनुशासन (Self-discipline) है जो दूसरों के अधिकारों और समाज की शांति को ठेस पहुँचाए बिना हमें आगे बढ़ने की राह दिखाता है. स्वतंत्रता तभी तक खूबसूरत है जब तक वह मर्यादा के दायरे में रहकर समाज को जोड़ती है, तोड़ती नहीं.लेखक परिचय : -डॉ. सम्पूर्णांनन्द मिश्र आयुर्वेद जगत के एक सुप्रसिद्ध चिकित्सक, प्रखर विचारक एवं राष्ट्रीय मानवाधिकार (सं.प्र.) के प्रतिष्ठित सदस्य हैं.
रिपोर्ट : विश्वनाथ आनंद.
