संस्कृत भाषा को लेकर मंत्री प्रमोद कुमार चंद्रवंशी बोले- यह किसी एक वर्ग की भाषा नहीं, भारतीय संस्कृति की जीवनदायिनी भाषा है

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प्रांतीय संस्कृति महोत्सव में संस्कृत भाषा को लेकर उठा सवाल

औरंगाबाद, बिहार | 4 अक्टूबर 2026: औरंगाबाद में आयोजित दो दिवसीय प्रांतीय संस्कृति महोत्सव में संस्कृत भाषा को लेकर महत्वपूर्ण चर्चा हुई। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में पहुंचे बिहार सरकार के खान एवं भूतत्व मंत्री प्रमोद कुमार चंद्रवंशी ने भारतीय संस्कृति, संस्कार और संस्कृत भाषा के महत्व पर विस्तार से अपनी बात रखी।

4 अक्टूबर से शुरू होकर 5 अक्टूबर तक चलने वाले इस महोत्सव के दौरान संवाददाता ने मंत्री से सवाल किया कि आज के दौर में जब अधिकांश शिक्षण संस्थानों में बच्चों की पढ़ाई का जोर आधुनिक विषयों और रोजगारपरक शिक्षा पर है, ऐसे समय में इस तरह के सांस्कृतिक आयोजन की क्या अहमियत है?

मंत्री प्रमोद कुमार चंद्रवंशी ने कहा कि वह इस तरह के आयोजन के लिए शिक्षण संस्थान को धन्यवाद देना चाहते हैं। उनके मुताबिक आज बच्चों को केवल किताबों तक सीमित रखने के बजाय उन्हें भारतीय संस्कृति, परंपरा, विरासत और संस्कारों से जोड़ना बेहद जरूरी है।

उन्होंने कहा कि शिक्षा यदि संस्कार और संस्कृति से अलग हो जाए तो उसका उद्देश्य अधूरा रह जाता है। उनके अनुसार, प्रांतीय संस्कृति महोत्सव जैसे कार्यक्रम बच्चों को अपनी जड़ों और विरासत से परिचित कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

संस्कृत भाषा के अस्तित्व और शिक्षा पर उठाया गया सवाल

बातचीत के दौरान संवाददाता ने मंत्री से बिहार में संस्कृत भाषा की स्थिति को लेकर सवाल किया। सवाल में कहा गया कि प्रदेश में कई संस्कृत विद्यालयों के संचालन और वहां नियमित पढ़ाई होने को लेकर सवाल उठते रहे हैं। कई जगह संस्कृत शिक्षा महज परीक्षा, पंजीकरण और फॉर्म भरने तक सीमित रहने की शिकायतें सामने आती हैं।

इस पर मंत्री ने कहा कि सवाल जायज है और वह इससे सहमत हैं। उन्होंने कहा कि जिस शिक्षण संस्थान में वह कार्यक्रम में मौजूद हैं, वहां संस्कृत को हिंदी और अंग्रेजी की तरह ही महत्व दिया जाता है।

जब उनसे स्पष्ट किया गया कि सवाल इस विशेष विद्यालय का नहीं बल्कि बिहार के अन्य संस्कृत विद्यालयों की स्थिति का है, तो मंत्री ने कहा कि इस बारे में संबंधित संस्थानों से सवाल किया जाना चाहिए।

‘संस्कृत किसी एक वर्ग की भाषा नहीं’

मंत्री प्रमोद कुमार चंद्रवंशी ने कहा कि संस्कृत को किसी एक वर्ग या समुदाय की भाषा मानना उचित नहीं है। उन्होंने कहा कि संस्कृत भारतीय परंपरा और संस्कृति से जुड़ी महत्वपूर्ण भाषा है और इसे किसी विशेष वर्ग तक सीमित नहीं किया जाना चाहिए।

उन्होंने संस्कृत को वैज्ञानिक भाषा बताते हुए इसके महत्व पर जोर दिया। साथ ही उन्होंने लोगों से अपील की कि वे अंग्रेजी, फारसी, चीनी या दुनिया की दूसरी भाषाएं जरूर सीखें, लेकिन भारतीय भाषाओं और विशेष रूप से संस्कृत के ज्ञान को भी महत्व दें।

मंत्री ने कहा कि भारतीय संस्कृति और परंपराओं को समझने में संस्कृत की भूमिका महत्वपूर्ण है। उनका कहना था कि संस्कृत को लेकर समाज में व्यापक स्तर पर जागरूकता पैदा करने की आवश्यकता है।

कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष के बयान पर भी मंत्री ने दी प्रतिक्रिया

संवाददाता ने बातचीत के दौरान बिहार कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष राजेश कुमार उर्फ राजेश राम के उस बयान का भी जिक्र किया, जिसमें उन्होंने बदलते समय में जापानी, चीनी और फ्रेंच जैसी भाषाओं की बढ़ती मांग का हवाला देते हुए संस्कृत पढ़ने की आवश्यकता पर सवाल उठाया था।

इस पर मंत्री ने कटाक्ष करते हुए कहा कि संबंधित नेता स्वयं इटालियन भाषा सीख रहे हैं और ऐसे में भाषाओं को लेकर उनकी प्राथमिकता पर सवाल उठाया जा सकता है।

संस्कृत भाषा को लेकर पहले भी नेताओं से हो चुका है संवाद

संवाददाता के अनुसार, संस्कृत भाषा के मुद्दे पर इससे पहले भी बिहार के कई नेताओं से बातचीत की जा चुकी है। बिहार कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष बनने के कुछ समय बाद राजेश कुमार उर्फ राजेश राम से उनके बिजौली स्थित वास्तु विहार आवास पर इस मुद्दे पर सवाल किया गया था। उस बातचीत को ISMA TIMES में भी प्रमुखता से प्रकाशित किया गया था।

इसके अलावा औरंगाबाद दौरे के दौरान लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष राजू तिवारी से भी प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान संस्कृत भाषा की स्थिति को लेकर सवाल किया गया था। उन्होंने बिहार में संस्कृत भाषा के कमजोर होते अस्तित्व को चिंता का विषय बताते हुए इसे बचाने की जरूरत पर जोर दिया था।

इसी मुद्दे पर पूर्व में रफीगंज विधानसभा क्षेत्र संख्या-224 से जनता दल यूनाइटेड के विधायक बने प्रमोद कुमार सिंह से भी बातचीत की गई थी। उन्होंने संस्कृत के महत्व को स्वीकार करते हुए कहा था कि धार्मिक और सांस्कृतिक कर्मकांडों में संस्कृत की महत्वपूर्ण भूमिका है और इस भाषा के संरक्षण की जरूरत है।

इस तरह संस्कृत भाषा को लेकर अलग-अलग राजनीतिक दलों के नेताओं के विचार सामने आते रहे हैं। औरंगाबाद में आयोजित प्रांतीय संस्कृति महोत्सव के दौरान एक बार फिर यह मुद्दा चर्चा के केंद्र में रहा।

रिपोर्ट : अजय कुमार पाण्डेय.

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