भारत में 2027 की जनगणना कई मायनों में खास मानी जा रही है। इस बार जनगणना के दूसरे चरण में पहली बार 1931 के बाद सभी जातियों से जुड़ी जानकारी भी दर्ज की जाएगी। सरकार का कहना है कि इससे सामाजिक, आर्थिक और जनसांख्यिकीय तस्वीर को बेहतर ढंग से समझने में मदद मिलेगी और भविष्य की नीतियां वास्तविक आंकड़ों के आधार पर बनाई जा सकेंगी।
हालांकि, यह मुद्दा सिर्फ आंकड़े जुटाने तक सीमित नहीं है। इसके साथ सामाजिक न्याय, आरक्षण, नीति निर्माण और राजनीति जैसे कई बड़े सवाल भी जुड़े हुए हैं।
जातिगत जनगणना आखिर होती क्या है?
सामान्य जनगणना में आबादी, शिक्षा, रोजगार, आवास और दूसरी सामाजिक-आर्थिक जानकारी जुटाई जाती है। जातिगत जनगणना में इसके साथ प्रत्येक नागरिक की जाति से जुड़ी जानकारी भी दर्ज की जाती है। आधिकारिक घोषणा के अनुसार, 2027 की जनगणना के दूसरे चरण में जाति संबंधी जानकारी भी एकत्र की जाएगी।
भारत में जाति व्यवस्था की शुरुआत कैसे हुई?
इतिहासकारों और वैदिक साहित्य के अनुसार, प्राचीन भारत में वर्ण व्यवस्था का उल्लेख मिलता है, जिसमें ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र चार प्रमुख वर्ण बताए गए हैं। समय के साथ यही व्यवस्था विकसित होकर हजारों जातियों और उपजातियों में बदल गई। आज भारतीय समाज में सामाजिक पहचान का आधार अधिकतर जातियां और समुदाय हैं, केवल वर्ण नहीं।
1931 के बाद अब क्यों अहम है यह जनगणना?
1931 की जनगणना आख़िरी ऐसी जनगणना थी जिसमें सभी जातियों का विस्तृत विवरण दर्ज किया गया था। इसके बाद नियमित जनगणना में अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के अलावा अन्य जातियों की अलग-अलग गणना नहीं हुई। 2011 में सामाजिक-आर्थिक एवं जातिगत सर्वेक्षण कराया गया, लेकिन उसके विस्तृत जातिवार आंकड़े सार्वजनिक नहीं किए गए।
OBC को लेकर बहस क्यों तेज है?
मंडल आयोग ने 1931 के आंकड़ों के आधार पर OBC आबादी का अनुमान लगभग 52 प्रतिशत लगाया था। इसी आधार पर 1990 में केंद्र सरकार ने 27 प्रतिशत OBC आरक्षण लागू किया। अब यदि 2027 की जनगणना से OBC की वास्तविक आबादी का आधिकारिक डेटा सामने आता है, तो आरक्षण, उप-वर्गीकरण और सरकारी योजनाओं के वितरण को लेकर नई बहस तेज हो सकती है।
क्या बदल सकता है?
यदि जातिवार आंकड़े उपलब्ध होते हैं, तो कई महत्वपूर्ण सवालों पर चर्चा बढ़ सकती है। जैसे—क्या वर्तमान आरक्षण व्यवस्था में बदलाव की जरूरत है? क्या OBC के भीतर उप-वर्गीकरण होना चाहिए? क्या सरकारी योजनाओं का लाभ नई जनसंख्या के अनुपात के अनुसार तय किया जाए? इन सभी मुद्दों पर आगे नीति स्तर पर विचार हो सकता है।
दो अलग-अलग राय
एक पक्ष का मानना है कि जातिगत जनगणना से सामाजिक न्याय को मजबूती मिलेगी और सरकारें प्रमाणिक आंकड़ों के आधार पर बेहतर फैसले ले सकेंगी। वहीं दूसरा पक्ष मानता है कि इससे जातीय पहचान और वोट बैंक की राजनीति को बढ़ावा मिल सकता है तथा सामाजिक ध्रुवीकरण का खतरा भी बढ़ सकता है।
फिलहाल इतना तय है कि 2027 की जातिगत जनगणना केवल जनसंख्या गिनने का अभियान नहीं होगी, बल्कि यह भारत की सामाजिक संरचना, सार्वजनिक नीतियों और भविष्य की राजनीतिक बहसों को प्रभावित करने वाला एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकती है।
रिपोर्ट : इस्मा टाइम्स न्यूज़ डेस्क.
