गया में ऑनलाइन पिंडदान को लेकर विरोध, ब्राह्मण महासभा और कौटिल्य मंच ने उठाए सवाल

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गया, बिहार | 22 सितंबर 2026: गया जी में आगामी पितृपक्ष मेला शुरू होने से पहले ऑनलाइन पिंडदान की व्यवस्था को लेकर धार्मिक संगठनों और विद्वानों के एक वर्ग ने आपत्ति जताई है। भारतीय राष्ट्रीय ब्राह्मण महासभा एवं कौटिल्य मंच से जुड़े लोगों ने इसे सनातन परंपराओं और पारंपरिक पिंडदान की प्रक्रिया से अलग बताते हुए प्रशासन से मामले पर संज्ञान लेने की मांग की है।

गया जिला प्रशासन की आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार, पितृपक्ष मेला 2026 का आयोजन 25 सितंबर से 10 अक्टूबर तक किया जाना है। प्रशासन की ओर से श्रद्धालुओं की सुविधा, सुरक्षा और धार्मिक गतिविधियों को लेकर विभिन्न तैयारियां की जा रही हैं।

डॉ. विवेकानंद मिश्रा के आवास पर हुई बैठक

ऑनलाइन पिंडदान के मुद्दे पर विचार-विमर्श के लिए गया स्थित भारतीय राष्ट्रीय ब्राह्मण महासभा एवं कौटिल्य मंच के अध्यक्ष डॉ. विवेकानंद मिश्रा के आवास पर एक बैठक आयोजित की गई।

बैठक में मौजूद विद्वानों, आचार्यों, पुरोहितों और बुद्धिजीवियों ने ऑनलाइन माध्यम से पिंडदान कराए जाने को लेकर अपनी आपत्तियां रखीं। वक्ताओं ने पारंपरिक पिंडदान में श्रद्धालु की व्यक्तिगत भागीदारी और धार्मिक विधि-विधान के महत्व पर जोर दिया।

डॉ. विवेकानंद मिश्रा ने जताई आपत्ति

बैठक की अध्यक्षता करते हुए डॉ. विवेकानंद मिश्रा ने कहा कि सनातन परंपराओं से जुड़े कर्मकांडों को आधुनिक सुविधाओं के नाम पर बदलने से पहले धार्मिक और शास्त्रीय पक्षों पर विचार किया जाना चाहिए।

उन्होंने कहा कि पितरों के निमित्त किए जाने वाले कर्मकांड में कर्ता की स्वयं की उपस्थिति और तीर्थ पुरोहितों के मार्गदर्शन की पारंपरिक व्यवस्था रही है। उनके अनुसार, तकनीक का इस्तेमाल सामान्य सुविधाओं के लिए किया जा सकता है, लेकिन पिंडदान और श्राद्ध जैसे धार्मिक अनुष्ठानों की प्रक्रिया को लेकर धार्मिक परंपराओं का ध्यान रखा जाना चाहिए।

उन्होंने ऑनलाइन पिंडदान की व्यावसायिक सेवाओं पर भी सवाल उठाते हुए प्रशासन से इसकी जांच और आवश्यक कार्रवाई की मांग की।

आचार्य सच्चिदानंद मिश्रा ने रखा शास्त्रीय पक्ष

सभा में प्रख्यात आचार्य सच्चिदानंद मिश्रा नैकी ने भी ऑनलाइन पिंडदान को लेकर अपना धार्मिक और शास्त्रीय मत रखा। उन्होंने दावा किया कि पारंपरिक पिंडदान में कर्ता द्वारा स्वयं संकल्प लेने तथा निर्धारित विधि से धार्मिक अनुष्ठान करने का महत्व है।

उन्होंने कहा कि फल्गु नदी, तिल, कुश और पिंड से जुड़े कर्मकांड पारंपरिक धार्मिक प्रक्रिया का हिस्सा हैं। उनके अनुसार, दूरस्थ माध्यम से किए जाने वाले पिंडदान की धार्मिक मान्यता को लेकर स्पष्टता आवश्यक है।

हालांकि, इन शास्त्रीय दावों की स्वतंत्र धार्मिक विशेषज्ञ समीक्षा इस रिपोर्ट के लिए उपलब्ध नहीं है। इसलिए इन्हें संबंधित आचार्यों के मत के रूप में ही देखा जाना चाहिए।

निजी स्तर पर ऑनलाइन पिंडदान सेवाएं उपलब्ध

ऑनलाइन पिंडदान को लेकर विवाद ऐसे समय सामने आया है जब इंटरनेट पर कुछ निजी संस्थाएं गया में पिंडदान की ऑनलाइन सेवाएं उपलब्ध कराने का दावा कर रही हैं। कुछ सेवाओं में गया के विभिन्न धार्मिक स्थलों पर पुरोहितों द्वारा श्रद्धालु की ओर से पूजा कराने, वीडियो उपलब्ध कराने और प्रसाद/पवित्र सामग्री भेजने की पेशकश की जा रही है।

वहीं, गया जिला प्रशासन की आधिकारिक पिंडदान वेबसाइट श्रद्धालुओं को पिंडदान की वेदियों, पुरोहितों, धार्मिक स्थलों और अन्य तीर्थ सुविधाओं से संबंधित जानकारी उपलब्ध कराती है। प्रशासन की वेबसाइट पर पिंडदान को गया की धार्मिक परंपरा से जुड़ा अनुष्ठान बताया गया है।

सरकार से जांच और कार्रवाई की मांग

बैठक के अंत में उपस्थित लोगों की ओर से भारत सरकार के गृह मंत्रालय, बिहार सरकार, मुख्यमंत्री, गया जिला प्रशासन और पितृपक्ष मेला प्रशासन से ऑनलाइन पिंडदान के नाम पर संचालित सेवाओं की जांच कराने की मांग की गई।

बैठक में शामिल लोगों ने कहा कि गया की धार्मिक परंपराओं और श्रद्धालुओं की आस्था से जुड़े मामलों में पारदर्शिता जरूरी है। उन्होंने ऑनलाइन पिंडदान के नाम पर किसी प्रकार की धोखाधड़ी या भ्रामक प्रचार पाए जाने की स्थिति में नियमानुसार कार्रवाई की मांग भी की।

बड़ी संख्या में लोगों की मौजूदगी का दावा

आयोजकों की ओर से जारी जानकारी में बैठक से जुड़े कई आचार्यों, विद्वानों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और अन्य लोगों के नाम शामिल किए गए हैं। इनमें आचार्य लाल भूषण मिश्र, आचार्य अरुण मिश्र, मधुप चरण बाबू डालमिया, सुजित कुमार सिन्हा, संदीप मिश्र, संदीप पाठक, हृदय कुमार, दीपक, अतुल कुमार मिश्रा, डॉ. ज्ञानेश भारद्वाज, आशुतोष मिश्र, रंजीत पाठक, पवन मिश्र, डॉ. राम किशोर पाठक, सुनील कुमार पाठक, अभय पाठक, नवल किशोर मिश्र, विनय कांत मिश्र, डॉ. जितेंद्र मिश्र, राजीव नयन पांडे, अशोक दूबे, डॉ. विनोद कुमार मिश्र, महेश मिश्र, हरिनारायण त्रिपाठी, विश्वजीत चक्रवर्ती, चंद्रभूषण मिश्र, डॉ. दिनेश कुमार, डॉ. रविंद्र कुमार, प्रोफेसर सुनील पाठक, अमरनाथ मिश्र, विनोद तिवारी, दिलीप कुमार द्विवेदी, विजय बाबू, राजेश बाबू, वीर बहादुर राय, रागिनी सिंह, अनिल कुमार, मनीष कुमार, रणजीत मिश्रा, हरिद्वार मिश्र, ज्ञानेश कुमार पांडे, कुंदन मिश्र, अमरेंद्र कुमार सिंह, राजेश त्रिपाठी, मुन्ना सिंह और अन्य के नाम शामिल हैं।

गया में पितृपक्ष मेला 2026 के मद्देनजर श्रद्धालुओं की तैयारियां भी तेज हैं। ऐसे में ऑनलाइन और पारंपरिक पिंडदान की धार्मिक मान्यता तथा प्रशासनिक व्यवस्था को लेकर उठी यह बहस आने वाले दिनों में और चर्चा में रहने की संभावना है।

रिपोर्ट : विश्वनाथ आनंद.

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