अक्टूबर 2026 के आखिरी दो हफ्तों में देश के कई बड़े बैंकों से ऐसी खबरें सामने आई हैं, जिन्होंने बैंकिंग सिस्टम की सुरक्षा और ग्राहकों के भरोसे पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. कहीं बैंक कर्मचारियों पर ग्राहकों की FD तोड़कर करोड़ों रुपये निकालने के आरोप लगे तो कहीं बैंक के पेमेंट सिस्टम से करीब 14 करोड़ रुपये निकल गए और बैंक के अपने रिकॉर्ड में लेनदेन का पता तक नहीं चला.
कहीं हजारों ग्राहकों की निजी जानकारी डार्क वेब पर पहुंच गई तो कहीं बैंक कर्मचारियों की कथित मिलीभगत से फर्जी खाते खोलकर साइबर ठगी का पैसा इधर से उधर किया गया. ये घटनाएं अलग-अलग बैंकों की हैं लेकिन इनसे एक बड़ा सवाल उठता है. जब बैंक के अंदर काम करने वाले कर्मचारियों, बैंक के डिजिटल सिस्टम और ग्राहकों की निजी जानकारी की सुरक्षा पर सवाल उठने लगें, तो आम आदमी अपने पैसे को कितना सुरक्षित माने?दो हफ्ते में पांच बड़े मामले
पहला मामला पंजाब नेशनल बैंक का है. ग्रेटर नोएडा के ऐच्छर गांव में PNB की एक शाखा के ग्राहकों ने आरोप लगाया कि उनके बचत खातों और फिक्स्ड डिपॉजिट से करीब 35 करोड़ रुपये गायब हो गए. कई खातों में जमीन अधिग्रहण के बदले मिला मुआवजा जमा था. आरोप है कि ग्राहकों की जानकारी के बिना FD तोड़ी गईं और पैसा दूसरे खातों में ट्रांसफर कर दिया गया. ब्रांच मैनेजर समेत पांच कर्मचारियों को निलंबित किया गया है. हालांकि कथित हेराफेरी की कुल रकम की आधिकारिक पुष्टि बाकी है.
दूसरा मामला सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया का है. बैंक के RBI से जुड़े सेटलमेंट खाते से 15 से 17 अक्टूबर के बीच 187 ट्रांजैक्शन के जरिए 13.97 करोड़ रुपये 36 खातों में चले गए. पुलिस शिकायत के मुताबिक इन भुगतानों का रिकॉर्ड बैंक के अपने सिस्टम में नहीं मिला. हालांकि बैंक ने सार्वजनिक बयान में तकनीकी गड़बड़ी की बात कही है और स्पष्ट किया है कि किसी ग्राहक का खाता प्रभावित नहीं हुआ.
तीसरा मामला देश के सबसे बड़े सरकारी बैंक SBI का है. बैंक ने स्वीकार किया कि उसके 3,897 ग्राहकों की निजी जानकारी डार्क वेब पर मिली है. इसमें ग्राहकों के नाम, मोबाइल नंबर, पते और लोन से जुड़ी जानकारी शामिल है. दूसरी तरफ हैकर ने 3.75 लाख रिकॉर्ड होने का दावा किया है जिसकी पुष्टि नहीं हुई है. बैंक के मुताबिक ग्राहकों के पैसे और बैंकिंग सेवाओं पर कोई असर नहीं पड़ा.
चौथा मामला HDFC बैंक का है. बैंक की अंदरूनी जांच में दो वरिष्ठ अधिकारियों पर कारोबारी रणनीति और बाजार को प्रभावित कर सकने वाली गोपनीय जानकारी बाहर साझा करने के आरोप सामने आए. बैंक ने आंतरिक समीक्षा की पुष्टि की है लेकिन इस मामले में ग्राहकों के पैसे या डेटा को नुकसान पहुंचने की कोई जानकारी नहीं है.
पांचवां मामला दिल्ली के CSB बैंक का है. पुलिस के मुताबिक दो शाखाओं में दिहाड़ी मजदूरों के दस्तावेजों का इस्तेमाल करके 37 फर्जी खाते खोले गए. इन खातों में साइबर ठगी के करीब 7.36 करोड़ रुपये पहुंचे. मामले में बैंक के ब्रांच मैनेजर और स्टाफ समेत छह लोगों की गिरफ्तारी हुई.
बैंकिंग सिस्टम की चार बड़ी कमजोरियां
पहली कमजोरी: जब बैंक के अंदर से ही खतरा पैदा हो
आमतौर पर बैंक फ्रॉड का नाम सुनते ही लोगों को हैकर, फर्जी लिंक या OTP चोरी की याद आती है. लेकिन PNB और CSB के मामलों में आरोप बैंक के अपने कर्मचारियों पर हैं.
ग्रेटर नोएडा में ग्राहकों का आरोप है कि उनकी FD बिना अनुमति तोड़ी गईं. कुछ मामलों में पैसा ऐसे खातों में पहुंचा जो ग्राहकों के नाम पर थे लेकिन उन्हें उन खातों की जानकारी नहीं थी. सवाल यह है कि बैंक के सिस्टम में बिना जरूरी मंजूरी के FD कैसे तोड़ी गई? नए खाते कैसे खुले? और बैंक की निगरानी व्यवस्था ने संदिग्ध लेनदेन को क्यों नहीं पकड़ा?
इसी तरह दिल्ली के CSB मामले में पुलिस का आरोप है कि मजदूरों को लोन दिलाने का लालच देकर उनके दस्तावेज लिए गए. फिर उन दस्तावेजों से फर्जी खाते खोले गए और साइबर ठगी की रकम उनमें मंगाई गई.
जब साइबर अपराधी किसी व्यक्ति से पैसा ठगते हैं तो उसे अपने सीधे बैंक खाते में मंगाने के बजाय किसी दूसरे व्यक्ति के खाते में जमा करवाते हैं. फिर पैसा अलग-अलग खातों में घुमाया जाता है ताकि असली अपराधी तक पहुंचना मुश्किल हो जाए.
मसलन किसी व्यक्ति से फर्जी निवेश के नाम पर 10 लाख रुपये ठगे गए. अपराधी यह पैसा किसी मजदूर या छात्र के नाम पर खुले खाते में मंगवा सकता है. इसके बाद रकम दूसरे खातों में भेज दी जाती है. अब सवाल यह है कि अगर बैंक की KYC प्रक्रिया इतनी सख्त है तो फर्जी दस्तावेजों या बिना सही सत्यापन के ऐसे खाते कैसे खुल जाते हैं?
अप्रैल 2026 में हैदराबाद पुलिस ने एक बड़े म्यूल अकाउंट नेटवर्क का खुलासा किया था. इसमें पकड़े गए 52 लोगों में 32 बैंक कर्मचारी थे. जांच में करीब 350 खातों से लगभग 150 करोड़ रुपये के लेनदेन की बात सामने आई थी यानी यह समस्या किसी एक बैंक या एक शहर तक सीमित नहीं है.
दूसरी कमजोरी: बैंक का डिजिटल सिस्टम कितना सुरक्षित?
सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया का मामला एक अलग तरह का खतरा दिखाता है. यहां सवाल किसी ग्राहक के OTP या पासवर्ड चोरी होने का नहीं बल्कि बैंक के भुगतान सिस्टम से करोड़ों रुपये निकलने का है. इसे आसान भाषा में समझिए.
जब आप एक बैंक से दूसरे बैंक में बड़ी रकम भेजते हैं तो बैंक आपस में भुगतान संदेश और सेटलमेंट सिस्टम के जरिए लेनदेन पूरा करते हैं. इस प्रक्रिया में RTGS और SFMS जैसे सिस्टम की अहम भूमिका होती है.
सेंट्रल बैंक की पुलिस शिकायत के मुताबिक उसके SFMS से जुड़े सिस्टम के रास्ते 187 भुगतान आदेश भेजे गए लेकिन इनका रिकॉर्ड बैंक के सामान्य बैंकिंग सिस्टम में नहीं मिला.
दूसरी तरफ बैंक ने इसे अपने लोकल RTGS सर्वर इंटरफेस की तकनीकी गड़बड़ी बताया है यानी अभी यह स्पष्ट नहीं है कि मामला साइबर घुसपैठ का था या तकनीकी खराबी का. लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है कि अगर बैंक के सिस्टम से भुगतान हो जाए और उसका सामान्य रिकॉर्ड ही मौजूद न हो तो बैंक ऐसे लेनदेन को समय रहते कैसे रोकेगा? इस मामले की जानकारी RBI, IFTAS, CERT-In और महत्वपूर्ण सूचना ढांचे की सुरक्षा से जुड़ी एजेंसी NCIIPC को भी दी गई है.
तीसरी कमजोरी: आपका पैसा नहीं लेकिन आपकी जानकारी चोरी हो जाए तो?
SBI के मामले में ग्राहकों के खातों से पैसा निकलने की पुष्टि नहीं हुई है. लेकिन निजी जानकारी का डार्क वेब पर मिलना अपने आप में चिंता की बात है.सोचिए किसी साइबर ठग को आपका नाम, मोबाइल नंबर, पता, बैंक की शाखा और लोन आवेदन की जानकारी मिल जाए. वह आपको फोन करके कह सकता है कि आपका लोन मंजूर हो गया है. वह आपके बैंक और लोन से जुड़ी सही जानकारी भी बता सकता है.
इसके बाद वह प्रोसेसिंग फीस, KYC अपडेट या किसी फर्जी लिंक के जरिए आपसे पैसा ठगने की कोशिश कर सकता है यानी डेटा लीक होने का मतलब यह नहीं कि आपके खाते से पैसा चोरी हो गया लेकिन यह भविष्य में होने वाली ठगी का रास्ता जरूर खोल सकता है.
सरकारी साइबर अपराध आंकड़ों के मुताबिक 2025 में देशभर में करीब 21.77 लाख साइबर अपराध शिकायतें दर्ज हुईं और लोगों को लगभग 19,813 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ. इसलिए ग्राहकों की निजी जानकारी की सुरक्षा भी बैंक में जमा पैसे की सुरक्षा जितनी महत्वपूर्ण होती जा रही है.
चौथी कमजोरी: ग्राहक को समय पर जानकारी क्यों नहीं मिलती?
PNB मामले में कुछ ग्राहकों का आरोप है कि उनकी FD टूटने या खाते से पैसा निकलने का कोई SMS नहीं आया. SBI ने डेटा से जुड़ी घटना की जानकारी शेयर बाजार को दी लेकिन प्रभावित ग्राहकों को सीधे सूचना देने की व्यवस्था को लेकर सवाल बने हुए हैं. यहीं से बैंकिंग सिस्टम की एक और बड़ी कमजोरी सामने आती है. जब ग्राहक के खाते में कोई संदिग्ध गतिविधि होती है तो उसे सबसे पहले जानकारी मिलनी चाहिए. क्योंकि जितनी जल्दी ग्राहक को पता चलेगा उतनी जल्दी वह शिकायत कर सकेगा.
RBI के नियम भी बैंकों से ग्राहकों को इलेक्ट्रॉनिक लेनदेन के अलर्ट के लिए पंजीकृत करने को कहते हैं लेकिन सवाल है कि अगर बैंक के कर्मचारी ही गलत काम में शामिल हों या सिस्टम में गड़बड़ी हो, तो ग्राहक को सुरक्षा की पहली चेतावनी कौन देगा?
RBI के आंकड़े क्या बताते हैं?
इन घटनाओं को समझने के लिए देश में बैंकिंग फ्रॉड की बड़ी तस्वीर देखना जरूरी है. RBI की 2025-26 की सालाना रिपोर्ट के मुताबिक बैंकों और वित्तीय संस्थानों में धोखाधड़ी के 10,114 मामले दर्ज हुए, जिनमें करीब 48,021 करोड़ रुपये की रकम शामिल थी.
एक साल पहले 23,722 मामलों में करीब 32,803 करोड़ रुपये की रकम शामिल थी यानी मामलों की संख्या घटी लेकिन रिपोर्ट की गई रकम करीब 46 फीसदी बढ़ गई. हालांकि यहां एक महत्वपूर्ण बात है. इन आंकड़ों में 30,199 करोड़ रुपये के 314 पुराने मामले भी शामिल हैं जिन्हें दोबारा जांच के बाद दर्ज किया गया. साथ ही धोखाधड़ी में शामिल रकम और बैंक को हुए वास्तविक नुकसान में अंतर होता है.
सरकारी बैंकों से जुड़े 5,418 मामलों में करीब 35,709 करोड़ रुपये और निजी बैंकों के 3,956 मामलों में लगभग 11,399 करोड़ रुपये की रकम शामिल थी लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि इतनी रकम सीधे आम खाताधारकों के खातों से चोरी हुई. कुल रकम का करीब 85 फीसदी हिस्सा लोन से जुड़े फ्रॉड का था. इसलिए बैंकिंग फ्रॉड के आंकड़ों और आम ग्राहकों के खातों से होने वाली साइबर ठगी को अलग-अलग समझना जरूरी है.
सरकार और RBI क्या कर रहे हैं?
साइबर ठगी में इस्तेमाल होने वाले म्यूल खातों की पहचान के लिए RBI के इनोवेशन हब ने MuleHunter.AI नाम का सिस्टम विकसित किया है. इसका मकसद मशीन लर्निंग की मदद से संदिग्ध खातों को जल्दी पहचानना है. इसके अलावा साइबर ठगी की शिकायत के लिए 1930 हेल्पलाइन और cybercrime.gov.in पोर्टल मौजूद है.
सरकार के मुताबिक साइबर अपराध रोकने के सिस्टम के जरिए 11,158 करोड़ रुपये से ज्यादा की रकम बचाने में मदद मिली है लेकिन चुनौती यह है कि अपराधी बहुत तेजी से पैसा अलग-अलग खातों में भेज देते हैं. कई बार शिकायत एक राज्य में दर्ज होती है पैसा दूसरे राज्य के खाते में जाता है और जांच तीसरे राज्य की पुलिस को करनी पड़ती है. इस बीच ठगी की रकम निकाल ली जाती है.
क्या बैंक में रखा आपका पैसा सुरक्षित है?
इन पांच घटनाओं के आधार पर यह कहना सही नहीं होगा कि सरकारी या निजी बैंकों में जमा पैसा सुरक्षित नहीं रहा. PNB मामले में ग्राहकों की रकम निकालने के आरोप हैं. सेंट्रल बैंक के मामले में बैंक के अपने सेटलमेंट खाते से पैसा गया. SBI में ग्राहकों की जानकारी सामने आई, लेकिन खातों से रकम चोरी होने की पुष्टि नहीं हुई.
HDFC का मामला गोपनीय कारोबारी जानकारी से जुड़ा है जबकि CSB का मामला फर्जी खातों के जरिए साइबर ठगी की रकम घुमाने का है लेकिन इन घटनाओं से यह जरूर साफ होता है कि बैंकिंग सुरक्षा सिर्फ पासवर्ड, OTP और मोबाइल ऐप तक सीमित नहीं है. बैंक के कर्मचारियों की जवाबदेही, खातों का सत्यापन, पेमेंट सिस्टम की सुरक्षा और ग्राहकों को समय पर जानकारी देना भी उतना ही जरूरी है.
खाते से पैसा निकल जाए तो क्या अधिकार हैं?
RBI के 2017 के नियमों के मुताबिक कुछ परिस्थितियों में अनधिकृत इलेक्ट्रॉनिक लेनदेन पर ग्राहक की देनदारी शून्य होती है. अगर धोखाधड़ी या लापरवाही बैंक की तरफ से हुई है तो ग्राहक की देनदारी शून्य होती है.
अगर गलती किसी तीसरे पक्ष की है और ग्राहक की कोई गलती नहीं है तो बैंक से सूचना मिलने के तीन कामकाजी दिनों के भीतर शिकायत करने पर भी ग्राहक की देनदारी शून्य हो सकती है. चार से सात कामकाजी दिनों में शिकायत करने पर ग्राहक की सीमित देनदारी हो सकती है. यह सीमा खाते और लेनदेन की श्रेणी के हिसाब से तय होती है.
नियमों के तहत पात्र मामलों में बैंक को शिकायत के 10 कामकाजी दिनों के भीतर रकम का अस्थायी क्रेडिट देना होता है. हालांकि इन नियमों को हर तरह की FD या दस्तावेज संबंधी हेराफेरी पर अपने आप लागू नहीं माना जा सकता.
ग्राहक खुद को कैसे सुरक्षित रखें?
सबसे पहले अपने बैंक खाते में SMS और ईमेल अलर्ट चालू रखें.
हर महीने अपने बैंक स्टेटमेंट और FD की स्थिति जांचें.
किसी भी चेक या दस्तावेज पर बिना पढ़े साइन न करें, भले ही सामने बैंक का कर्मचारी हो.
अगर कोई व्यक्ति आपके बैंक, लोन या निजी जानकारी के बारे में सही बातें बताकर OTP या PIN मांगे, तो उसे साझा न करें.
किसी को अपना बैंक खाता किराये पर न दें और न ही लोन या नौकरी के नाम पर बिना जांच के दस्तावेज सौंपें.
अगर साइबर ठगी हो जाए तो तुरंत 1930 पर शिकायत करें और बैंक को लिखित जानकारी दें.
बैंक से समाधान नहीं मिलता तो निर्धारित प्रक्रिया के तहत RBI के लोकपाल से भी शिकायत की जा सकती है.
अब इन सवालों का जवाब कौन देगा?
PNB को बताना होगा कि आखिर कितने ग्राहकों के खातों से कितनी रकम गई और बैंक की निगरानी में यह मामला पहले क्यों नहीं पकड़ा गया.
सेंट्रल बैंक और RBI को स्पष्ट करना होगा कि करीब 14 करोड़ रुपये के भुगतान तकनीकी गड़बड़ी के कारण हुए या किसी ने सिस्टम में सेंध लगाई.
SBI को बताना होगा कि ग्राहकों का डेटा किस रास्ते से बाहर पहुंचा और प्रभावित ग्राहकों को कैसे सुरक्षित किया जाएगा.
सभी बैंकों के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब खाते खोलने से लेकर लेनदेन मंजूर करने तक हर जगह निगरानी की व्यवस्था है तो बैंक कर्मचारियों की कथित मिलीभगत से होने वाली गड़बड़ियां समय रहते क्यों नहीं पकड़ी जातीं?
बैंकिंग सिस्टम की नींव भरोसे पर टिकी है. ग्राहक अपना पैसा बैंक में इसलिए रखता है क्योंकि उसे विश्वास होता है कि वहां उसका पैसा घर से ज्यादा सुरक्षित रहेगा. लेकिन जब उसी बैंक के कर्मचारी, डिजिटल सिस्टम और ग्राहकों के डेटा की सुरक्षा पर सवाल उठने लगें तो सिर्फ यह कहना काफी नहीं कि बैंक सुरक्षित है. अब बैंकों को यह दिखाना भी होगा कि ग्राहकों के पैसे और भरोसे की सुरक्षा के लिए उनकी जवाबदेही कितनी मजबूत है.
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