बुढ़ापा अभिशाप नहीं, जीवन का आखिरी सबक है: भगवान ने क्यों दी इंसान को उम्रदराज़ होने की नेमत?

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इंसान की ख्वाहिश होती है कि उसकी जवानी हमेशा कायम रहे। चेहरे की चमक, शरीर की ताकत और दुनिया को देखने-सुनने की चाह कभी कम न हो। लेकिन कुदरत का निज़ाम कुछ और है। उम्र गुजरती है, शरीर बदलता है और इंसान धीरे-धीरे जिंदगी के उस पड़ाव में पहुंच जाता है, जिसे हम बुढ़ापा कहते हैं।

अक्सर हम बुढ़ापे को कमजोरी और परेशानी के तौर पर देखते हैं। मगर इसी एहसास से जुड़ा एक भावपूर्ण संदेश यह सवाल सामने रखता है कि क्या बढ़ती उम्र अपने आप में कोई सज़ा है, या इसके पीछे भी कुदरत का कोई गहरा मकसद है?

कहानी में इंसान भगवान से सवाल करता है कि अगर वह चाहें तो इंसान को हमेशा जवान रख सकते हैं। इस पर भगवान उसे समझाते हैं कि इंसान की उम्र का बढ़ना महज़ शरीर के कमजोर होने का नाम नहीं, बल्कि दुनिया से उसके लगाव को धीरे-धीरे कम करने का एक जरिया भी है।

उम्र बढ़ने के साथ आंखों की रोशनी कमजोर पड़ती है। जिस दुनिया को इंसान पूरी चमक के साथ देखता था, उसे देखने की क्षमता धीरे-धीरे कम होने लगती है। यह बदलाव उसे बाहरी खूबसूरती के पीछे भागने से दूर कर सकता है।

फिर चेहरे पर झुर्रियां आने लगती हैं। कभी जिस चेहरे की खूबसूरती पर इंसान को नाज़ होता था, वही चेहरा उम्र का आईना बन जाता है। इससे उसे एहसास होता है कि खूबसूरती हमेशा रहने वाली चीज़ नहीं है।

समय के साथ पैरों में पहले जैसी ताकत नहीं रहती। दूर-दूर तक घूमना, हर जगह पहुंचना और दुनिया की हर चीज़ को अपनी आंखों से देखने की चाह भी कम होने लगती है। इंसान अपने भीतर और अपने करीब के लोगों की तरफ ज्यादा ध्यान देने लगता है।

कानों की सुनने की क्षमता भी कमजोर हो सकती है। दूसरों की हर बात सुनने और हर चर्चा का हिस्सा बनने की चाह धीरे-धीरे कम होती जाती है। जिंदगी की रफ्तार से दूरी बढ़ने लगती है और इंसान खामोशी के साथ रहना सीखता है।

कई बुजुर्गों को जिंदगी के आखिरी दौर में ज्यादा वक्त बिस्तर पर गुजारना पड़ता है। उनके लिए पहले जैसी भागदौड़ संभव नहीं रहती। यही वह दौर है जब इंसान को एहसास होने लगता है कि दुनिया की दौलत, शोहरत, खूबसूरती और तमाम व्यस्तताएं हमेशा उसके साथ नहीं रहेंगी।

बुढ़ापा हमें क्या सिखाता है?

इस संदेश का सबसे अहम पहलू यही है कि इंसान को दुनिया से अपना मोह एक दिन में नहीं छोड़ना पड़ता, बल्कि जिंदगी उसे धीरे-धीरे इसके लिए तैयार करती है।

अगर इंसान हमेशा जवान रहता और उसकी ताकत, खूबसूरती और इच्छाएं कभी कम न होतीं, तो शायद दुनिया से विदा होने का ख्याल उसके लिए और ज्यादा मुश्किल होता। जवानी में किसी अपने की मौत परिवार के लिए बेहद गहरा सदमा बन सकती है और उसकी कमी लंबे वक्त तक महसूस होती रहती है।

इसके उलट जब कोई व्यक्ति लंबी उम्र जीने के बाद दुनिया से विदा होता है, तो परिवार और समाज के लोग उसकी उम्र और जीवन की यात्रा को ध्यान में रखते हुए उस सच्चाई को कुछ हद तक स्वीकार कर पाते हैं। दुख तो रहता है, मगर वक्त के साथ जिंदगी फिर अपनी रफ्तार पकड़ लेती है।

यही इस भावपूर्ण संदेश का सार है कि बुढ़ापा जिंदगी का अभिशाप नहीं, बल्कि जीवन के अंतिम पड़ाव की तैयारी भी हो सकता है।

बढ़ती उम्र इंसान को यह याद दिलाती है कि दुनिया की हर चीज़ अस्थायी है। जवानी ढलती है, खूबसूरती बदलती है, शरीर कमजोर होता है और आखिरकार हर इंसान को एक दिन इस दुनिया से रुखसत होना है।

इसलिए बुढ़ापे को केवल कमजोरी की निगाह से देखने के बजाय इसे जिंदगी की एक ऐसी अवस्था के रूप में भी समझा जा सकता है, जो इंसान को ठहरना, स्वीकार करना और दुनिया के मोह से धीरे-धीरे ऊपर उठना सिखाती है।

शायद जिंदगी का यह आखिरी पड़ाव हमें यही समझाने आता है कि दुनिया से रिश्ता रहे, लेकिन उसका मोह इतना न हो कि उससे जुदाई का ख्याल ही असहनीय हो जाए।

अजय कुमार पाण्डेय.

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