झारखंड प्रदेश ( 22 सितंबर 2026) : आयुर्वेद केवल एक चिकित्सा पद्धति या शास्त्रों की किताब नहीं है, बल्कि यह मानव जीवन को पूरी चेतना और संतुलन के साथ जीने का एक समग्र जीवन दर्शन है।”
यह विचार सुप्रसिद्ध आयुर्वेद चिकित्सक एवं आयुर्वेद रक्षा एवं विकास मंच के सदस्य डॉ. सम्पूर्णानन्द मिश्र ने 23 सितम्बर को मनाए जाने वाले ‘विश्व आयुर्वेद दिवस’ की पूर्व संध्या पर जारी एक विशेष बयान में व्यक्त की.
अतीत गौरवशाली, अनुसंधान शाश्वत
डॉ. मिश्र ने आयुर्वेद के स्वर्णिम इतिहास को रेखांकित करते हुए कहा कि हमारा अतीत अत्यंत गौरवशाली रहा है। हजारों वर्ष पहले हमारे ऋषियों-महर्षियों ने जो गहन अनुसंधान और खोजें की थीं, उनके सिद्धांत आज के आधुनिक युग में भी पूरी तरह प्रासंगिक और अचूक हैं। आज जब दुनिया कई तरह की नई और जटिल बीमारियों से जूझ रही है, तब आयुर्वेद के प्राचीन सूत्रों के आधार पर ही विभिन्न कठिन और साध्य रोगों का सफलतापूर्वक और स्थाई इलाज किया जा रहा है।
आयुर्वेद केवल लक्षणों को नहीं दबाता, बल्कि रोग को जड़ से समाप्त करता है। स्वस्थ के स्वास्थ्य का संरक्षण सबसे पहला लक्ष्य।
बयान में आयुर्वेद के मूल दर्शन को समझाते हुए डॉ. मिश्र ने कहा कि इस महान चिकित्सा पद्धति का मुख्य सिद्धांत ” प्रयोजनं चास्य स्वस्थस्य स्वास्थ्यरक्षणं आतुरस्य विकारप्रशमनं च ” है। इसका अर्थ है कि आयुर्वेद का पहला और सबसे महत्वपूर्ण उद्देश्य केवल रोगियों के रोग का उन्मूलन करना नहीं है, बल्कि जो व्यक्ति स्वस्थ है, उसके स्वास्थ्य का हर स्थिति में संरक्षण करना है।
यह विज्ञान हमें सिखाता है कि हम अपनी दिनचर्या, ऋतुचर्या और खान-पान को प्रकृति के अनुकूल कैसे रखें ताकि बीमारी की नौबत ही न आए।
आयुर्वेद ने चिकित्सा को कभी व्यापार नहीं, सदैव ‘परम धर्म’ माना है।
मानामौजूदा दौर की व्यावसायिक चिकित्सा प्रणालियों पर बात करते हुए डॉ. सम्पूर्णानन्द मिश्र ने अत्यंत मार्मिक बात कही। उन्होंने कहा कि आयुर्वेद ने चिकित्सा को कभी भी धन कमाने का साधन या व्यापार नहीं माना। हमारी भारतीय संस्कृति में चिकित्सा को सदैव ‘धर्म’ और मानवता की सेवा का सबसे बड़ा माध्यम समझा गया है। ‘सर्वे सन्तु निरामयाः’ (सभी रोगमुक्त रहें) की भावना ही आयुर्वेद की आत्मा है।
23 सितम्बर को लें आयुर्वेद अपनाने का संकल्प
विश्व आयुर्वेद दिवस के अवसर पर डॉ. मिश्र ने आम जनता से अपील की कि वे अपनी जड़ों की ओर लौटें। उन्होंने कहा कि आज वैश्विक स्तर पर लोग केमिकल युक्त दवाओं के दुष्प्रभावों से बचने के लिए आयुर्वेद की शरण में आ रहे हैं। 23 सितम्बर का यह विशेष दिन हम सभी के लिए एक अवसर है कि हम आयुर्वेद के ‘जीवन विज्ञान’ को अपनी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बनाने का दृढ़ संकल्प लें।
रिपोर्ट : विश्वनाथ आनंद.
