गया, बिहार, 26 अक्टूबर 2026। आयुर्वेद जगत के प्रख्यात विद्वान, चिकित्सक और शिक्षाविद् स्वर्गीय प्रो. वैद्य डॉ. सिद्धिनंदन मिश्र के निधन पर गया में श्रद्धांजलि सभा का आयोजन किया गया। डॉक्टर विवेकानंद पथ, गोल बागीचा स्थित परिसर में आयुर्वेद रक्षा एवं विकास संस्थान, ब्राह्मण महासभा और कौटिल्य मंच के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित सभा में उपस्थित लोगों ने उनके जीवन, शैक्षणिक योगदान और आयुर्वेद के विकास के लिए किए गए कार्यों को याद किया।
सभा की अध्यक्षता डॉ. विवेकानंद मिश्रा ने की। वक्ताओं ने कहा कि डॉ. सिद्धिनंदन मिश्र ने अपना पूरा जीवन आयुर्वेद के अध्ययन, अध्यापन, अनुसंधान और औषधि विज्ञान के विकास के लिए समर्पित कर दिया था। 98 वर्ष की आयु में उनके निधन को आयुर्वेद जगत के लिए अपूरणीय क्षति बताया गया।
प्रतिभा, साधना और सेवा के प्रतीक थे डॉ. सिद्धिनंदन मिश्र
सभा को संबोधित करते हुए डॉ. विवेकानंद मिश्रा ने कहा कि धन, शारीरिक क्षमता और बुद्धि रखने वाले लोग अनेक मिल जाते हैं, लेकिन प्रतिभा को निखारने के लिए निरंतर साधना, परिश्रम और समर्पण की जरूरत होती है। उनके अनुसार, डॉ. सिद्धिनंदन मिश्र ऐसे ही व्यक्तित्व के धनी थे, जिन्होंने अपना जीवन आयुर्वेद की सेवा में लगा दिया।
उन्होंने कहा कि डॉ. मिश्र की विनम्रता, समाज और राष्ट्र के प्रति समर्पण तथा आयुर्वेद के प्रति उनकी निष्ठा उन्हें लंबे समय तक लोगों की स्मृतियों में जीवित रखेगी। उनका जीवन आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणास्रोत रहेगा।
डॉ. विवेकानंद मिश्रा ने बताया कि डॉ. सिद्धिनंदन मिश्र गया जिले के कंदौल गांव के एक प्रतिष्ठित विद्वान परिवार में जन्मे थे। उनके निधन से न केवल परिवार और परिचितों, बल्कि आयुर्वेद के विद्यार्थियों, शिक्षकों, शोधार्थियों और चिकित्सकों को भी गहरा दुख पहुंचा है।
रसशास्त्र और भैषज्य कल्पना के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान
डॉ. सिद्धिनंदन मिश्र ने आयुर्वेद के पारंपरिक ज्ञान को व्यवस्थित रूप से आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वह संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी के रसशास्त्र विभाग में विभागाध्यक्ष के पद पर कार्यरत रहे। सेवानिवृत्ति के बाद उन्होंने गुजरात के जामनगर स्थित आयुर्वेद संस्थानों में भी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभाईं।
मुख्य चिकित्सा सलाहकार और उपनिदेशक जैसे पदों पर रहते हुए उन्होंने आयुर्वेद के विकास में योगदान दिया। विशेष रूप से रसशास्त्र और भैषज्य कल्पना के क्षेत्र में उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है।
उनकी प्रमुख पुस्तकों में आयुर्वेदीय रसशास्त्र, प्रारम्भिक रसशास्त्र और अभिनव भैषज्य कल्पना विज्ञान शामिल हैं। इन पुस्तकों को आयुर्वेद के विद्यार्थियों, शिक्षकों और शोधार्थियों के लिए उपयोगी बताया गया। प्राचीन आयुर्वेदिक ग्रंथों के अनुवाद, संपादन और अनुसंधान के क्षेत्र में भी उन्होंने योगदान दिया।
राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद से सम्मानित किए जाने का उल्लेख
ख्यातिप्राप्त आयुर्वेद चिकित्सक डॉ. संपूर्णानंद मिश्रा, रांची ने डॉ. सिद्धिनंदन मिश्र की उपलब्धियों को याद करते हुए कहा कि आयुर्वेद के प्रति उनकी निष्ठा, विद्वत्ता और दीर्घकालीन सेवाओं के लिए उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित किया गया था। उनके अनुसार, तत्कालीन राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद द्वारा मिला सम्मान उनके शैक्षणिक और शोध संबंधी योगदान की महत्वपूर्ण उपलब्धि था।
वक्ताओं ने कहा कि ऐसे विद्वानों की उपलब्धियां उनके परिवार और क्षेत्र के साथ-साथ देश की समृद्ध ज्ञान परंपरा को भी प्रतिष्ठा प्रदान करती हैं।
ज्ञान, संस्कार और गुरुजनों के सम्मान पर दिया गया जोर
दैनिक दिव्य रश्मि के प्रधान संपादक डॉ. राकेश दत्त मिश्र ने कहा कि विद्वानों की सबसे बड़ी विरासत उनका ज्ञान, उनके संस्कार और समाज के लिए किए गए कार्य होते हैं। उन्होंने नई पीढ़ी से शिक्षा, अनुशासन, विनम्रता और सेवा की भावना अपनाने की अपील की।
सभा में उपस्थित आचार्य सच्चिदानंद मिश्र (नैकी) के विचारों के संदर्भ में भारतीय संस्कृति, नैतिक मूल्यों और गुरुजनों के सम्मान की परंपरा पर भी चर्चा हुई। वक्ताओं ने कहा कि पूर्ववर्ती विद्वानों के जीवन और कार्यों से प्रेरणा लेकर ज्ञान की परंपरा को अगली पीढ़ी तक पहुंचाना आवश्यक है।
वाराणसी में हुआ अंतिम संस्कार, परिवार के प्रति संवेदना
डॉ. सिद्धिनंदन मिश्र के परिवार के करीबी आचार्य मिश्र ने बताया कि उनका अंतिम संस्कार वाराणसी में किया गया। उनके निधन से परिवार, विद्यार्थियों, सहकर्मियों और शुभचिंतकों में शोक का माहौल है।
श्रद्धांजलि सभा में उनकी पुत्रियों मीरा और उषा के प्रति विशेष संवेदना व्यक्त की गई। उपस्थित लोगों ने ईश्वर से प्रार्थना की कि वह परिवार को इस कठिन समय में दुख सहन करने की शक्ति और धैर्य प्रदान करें तथा दिवंगत आत्मा को अपने श्रीचरणों में स्थान दें।
वक्ताओं ने कहा कि डॉ. सिद्धिनंदन मिश्र द्वारा रचित ग्रंथ, उनके शोध और शैक्षणिक सेवाएं आयुर्वेद के क्षेत्र में लंबे समय तक उपयोगी बनी रहेंगी। उनका योगदान उनके ज्ञान और सेवा की विरासत के रूप में याद किया जाता रहेगा।
श्रद्धांजलि सभा में कई गणमान्य लोग हुए शामिल
श्रद्धांजलि सभा में विधायक ज्योति मांझी, डॉ. ए.डी. उपाध्याय, डॉ. ओ.पी. मिश्रा, हरि नारायण त्रिपाठी, गौरी शंकर सिंह, अंबिका सिंह, शीला जायसवाल, पंडित बालमुकुंद मिश्रा, आचार्य लालभूषण मिश्रा, आचार्य अरुण कुमार मिश्रा, मधु आचार्य, सुनील कुमार पाठक, अमरनाथ पांडे, अमरनाथ मिश्रा, संजय वैद्य, रवि भूषण पाठक, वैद्य के.के. पाठक, डॉ. ज्ञानेश भारद्वाज, डॉ. रविंद्र कुमार, डॉ. दिनेश कुमार सिंह, मनीष कुमार, दिलीप कुमार, शंभू गिरी, विनोद तिवारी, डॉ. रश्मि, डॉ. परमेश्वर प्रसाद मिश्रा, प्रवीण ओझा, मृदुला मिश्रा, डॉ. रमेश कुमार उपाध्याय, डॉ. राजीव नयन मिश्रा, डॉ. सुरेंद्र विश्वकर्मा, संतोष पाठक, महेश मिश्रा, रवि विश्वजीत चक्रवर्ती, अच्युत मराठे, अधिवक्ता पूनम कुमारी, प्रोफेसर रीना सिंह, नुसरत प्रवीण, सीमा पोद्दार, गौरव सिंह और इंद्रदेव मांझी सहित अनेक लोग मौजूद रहे।
सभा में शामिल लोगों ने डॉ. सिद्धिनंदन मिश्र के प्रति श्रद्धा व्यक्त करते हुए कहा कि उनका जीवन ज्ञान, साधना और समाजसेवा का उदाहरण था। आयुर्वेद के क्षेत्र में उनके योगदान को आने वाली पीढ़ियां याद रखेंगी।
रिपोर्ट : विश्वनाथ आनंद.
