ज्ञानेश गुप्ता पर इस्तीफे की माँग, 13 करोड़ वोटर डिलीशन और लोकतंत्र का सवाल

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दिल्ली की सियासी गलियों में आजकल एक नाम बार-बार गूँज रहा है—ज्ञानेश गुप्ता। मुख्य चुनाव आयुक्त। पिछले कुछ दिनों से विपक्षी दल, युवा संगठन और कुछ पत्रकार भी एक स्वर में कह रहे हैं कि ये साहब अब कुर्सी छोड़ दें। वजह? वोटर लिस्ट की सफाई का वो अभियान जिसे स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन यानी एसआईआर कहते हैं। इस प्रक्रिया में देश भर में 13 करोड़ से ज्यादा नाम ड्राफ्ट लिस्ट से कट गए। विपक्ष इसे वोट चोरी बता रहा है, तो चुनाव आयोग कह रहा है कि ये सिर्फ सफाई है। लेकिन सबसे बड़ी बात ये है कि आयोग के अंदर से ही दो आयुक्तों ने लिखित आपत्तियाँ दर्ज कराई हैं।

एसआईआर क्या है और क्यों शुरू हुआ?

चुनाव आयोग नियमित रूप से वोटर लिस्ट की जाँच करता रहता है। लेकिन 2025 के मध्य में बिहार से शुरू होकर ये स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन पूरे देश में फैल गया। मकसद साफ था—मृत लोगों के नाम हटाना, शिफ्ट हो चुके वोटरों को चिह्नित करना, डुप्लिकेट एंट्री साफ करना और नई पीढ़ी को शामिल करना। आयोग का कहना है कि ये प्रक्रिया कानूनी है और हर राज्य में बूथ लेवल एजेंट्स, राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों की मौजूदगी में चली।

लेकिन आँकड़े चौंकाने वाले हैं। तीन चरणों में लगभग 30 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की ड्राफ्ट लिस्ट से 13 करोड़ से ज्यादा नाम हट गए। ये करीब 14 प्रतिशत की कमी है। दिल्ली में तो एक तिहाई नाम कटने की खबर आई। महाराष्ट्र, तेलंगाना और कुछ अन्य राज्यों में भी 20 प्रतिशत से ऊपर की गिरावट देखी गई। पश्चिम बंगाल में भी लाखों नाम प्रभावित हुए।

ममता बनर्जी के भवानीपुर क्षेत्र में लगभग 45 से 50 हजार नाम कटने की रिपोर्ट्स आईं। ये आँकड़े चुनाव आयोग के अपने डेटा और राज्य मुख्य चुनावी अधिकारियों के बयानों पर आधारित हैं। याद रखिए, ये ड्राफ्ट लिस्ट के आँकड़े हैं। अंतिम सूची में कई नाम वापस भी जुड़ जाते हैं। लेकिन इतनी बड़ी संख्या ने सवाल खड़े कर दिए।

इंडियन एक्सप्रेस की जाँच और दो आयुक्तों की आपत्तियाँ  

23 सितंबर 2026 को इंडियन एक्सप्रेस ने एक विस्तृत जाँच रिपोर्ट छापी। रिपोर्ट में साफ लिखा गया कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 बार लिखित आपत्तियाँ दर्ज कराईं। कुछ दिन तो एक ही दिन में चार आपत्तियाँ भी आईं।

ये आपत्तियाँ क्या थीं? नई वोटर रजिस्ट्रेशन फॉर्म-6 में बदलाव। आयुक्तों का कहना था कि बिना नियमों में संशोधन के नया सवाल जोड़ना “अनधिकृत और अवैध” है। वोटर डेटाबेस को दिल्ली में केंद्रित करने की कोशिश। राज्य स्तर के अधिकारियों की पहुँच सीमित होने की शिकायत। पश्चिम बंगाल में अपीलों को लेकर सवाल—कि आखिर किसने आयोग की तरफ से अपील दाखिल कीं। गोवा में कुछ पात्र वोटरों के नाम सॉफ्टवेयर की वजह से न जुड़ पाने की घटना।

दोनों आयुक्तों ने कैबिनेट सचिव को भी पत्र लिखा। ये बात असामान्य है। आमतौर पर आयोग के अंदर के मतभेद बाहर नहीं आते। लेकिन इस बार आ गया।

चुनाव आयोग ने जवाब दिया। आयोग ने कहा कि अलग-अलग राय deliberative process का हिस्सा है। अंतिम फैसले सर्वसम्मति से लिए गए। सभी तीनों आयुक्तों की मंजूरी से ही एसआईआर चली। लेकिन रिपोर्ट में उद्धृत नोट्स और आयुक्तों के लिखित शब्दों ने विपक्ष को नया हथियार दे दिया।

विपक्ष और युवाओं का गुस्सा

राहुल गांधी ने साफ कहा कि ज्ञानेश गुप्ता को तुरंत इस्तीफा देना चाहिए। उन्होंने इसे वोट चोरी और संविधान पर हमला बताया। कुछ नेताओं ने तो देशद्रोह तक के आरोप लगा दिए। अरविंद केजरीवाल ने गिरफ्तारी और पिछले चुनावों को रद्द करने की माँग की। ममता बनर्जी ने भी पुरानी लिस्ट से चुनाव कराने की बात कही। राज ठाकरे, सीपीआई, सीपीएम समेत कई दलों ने इस्तीफे की माँग दोहराई।

इस बीच एक नया स्वर भी उठा। कॉकरोच जनता पार्टी यानी सीजेपी। युवाओं का ये संगठन, जिसकी शुरुआत एक मीम से हुई थी, अब चुनावी प्रक्रिया पर सवाल उठा रहा है। संस्थापक अभिजीत दिपके ने तीन साफ माँगें रखीं।

पहली—ज्ञानेश गुप्ता 48 घंटे के अंदर इस्तीफा दें। उनके खिलाफ आपराधिक कार्रवाई शुरू हो। और ये बताया जाए कि आदेश किसके दिए गए।

दूसरी—आने वाले सभी चुनाव रोके जाएँ। एसआईआर फ्रीज हो। जनवरी 2025 वाली वोटर लिस्ट बहाल हो। स्वतंत्र जाँच आयोग बने। सुप्रीम कोर्ट एसआईआर से जुड़े सभी फाइलों को अपने कब्जे में ले ताकि कोई दस्तावेज गायब न हो।

तीसरी—2023 का चुनाव आयुक्त नियुक्ति कानून रद्द हो। नागरिक समाज की भागीदारी से नया कानून बने जो लोगों का विश्वास जीते।

अगर 48 घंटे में इस्तीफा नहीं आया तो देशव्यापी आंदोलन। सीजेपी ने साफ कहा कि माँगें पूरी होने तक पीछे नहीं हटेगा।

2023 का कानून और नियुक्ति का विवाद

यहाँ एक और पहलू है। 2023 में पारित मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त अधिनियम। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और मुख्य न्यायाधीश की समिति नियुक्ति करे। लेकिन नए कानून में मुख्य न्यायाधीश की जगह प्रधानमंत्री द्वारा नामित कैबिनेट मंत्री आ गया। यानी सरकार के दो सदस्य और विपक्ष का एक। विपक्ष इसे आयोग की स्वतंत्रता पर असर बताता रहा है। अब सीजेपी और कई दल इसे रद्द करने की बात कर रहे हैं।

दोनों तरफ के तर्क

एक तरफ चुनाव आयोग कहता है कि सफाई जरूरी है। मृत, शिफ्ट और डुप्लिकेट नाम हटना चाहिए। प्रक्रिया पारदर्शी है। राजनीतिक दलों के एजेंट मौजूद रहे। सुप्रीम कोर्ट ने भी कुछ चरणों में प्रक्रिया को वैध माना।

दूसरी तरफ सवाल है—इतनी बड़ी संख्या में नाम कटने के बाद क्या हर पात्र वोटर को वाकई मौका मिला? आयुक्तों के लिखित नोट्स क्या सिर्फ आंतरिक चर्चा थे या गहरी असहमति? डेटाबेस पर नियंत्रण कहाँ तक विकेंद्रीकृत रहा? और सबसे बड़ा सवाल—लोकतंत्र में वोटर लिस्ट पर जनता का भरोसा कैसे कायम रहे?

पश्चिम बंगाल में तो कई सीटों पर डिलीशन जीत के अंतर से ज्यादा रही। दिल्ली और महाराष्ट्र में भी भारी कमी। ये आँकड़े खुद आयोग और राज्य अधिकारियों के हैं। लेकिन ये साबित नहीं करते कि जानबूझकर किसी दल को फायदा पहुँचाया गया। फिर भी संख्या इतनी बड़ी है कि सवाल उठना स्वाभाविक है।

आगे क्या हो सकता है?

अभी तो तनाव बढ़ रहा है। राज्य चुनावों का मौसम करीब है। विपक्ष सुप्रीम कोर्ट का रुख देख रहा है। कुछ याचिकाएँ पहले से लंबित हैं। आयोग अपने फैसले पर अड़ा है। सीजेपी आंदोलन की धमकी दे रहा है।

एक अनुभवी पत्रकार के नाते कहूँ तो ये सिर्फ एक व्यक्ति का इस्तीफा या एक प्रक्रिया का विवाद नहीं। ये उस संस्था पर भरोसे का सवाल है जो हर पाँच साल में देश की दिशा तय करती है। अगर आयोग के अंदर से ही आपत्तियाँ आ रही हैं तो उन्हें गंभीरता से लेना चाहिए। अगर सफाई सही है तो आँकड़े और प्रक्रिया पूरी तरह सार्वजनिक करनी चाहिए।

जनता को पता होना चाहिए कि उसका नाम क्यों कटा, कैसे वापस जुड़ सकता है, और प्रक्रिया में कोई पक्षपात तो नहीं हुआ। वोटर लिस्ट लोकतंत्र की नींव है। नींव में दरार आ जाए तो इमारत हिलने लगती है।

अभी इंतजार है। 48 घंटे की समय-सीमा बीतेगी। आंदोलन होगा या नहीं। सुप्रीम कोर्ट कुछ बोलेगा या नहीं। लेकिन सवाल रहेंगे। और ये सवाल पूछना हर नागरिक का हक है। क्योंकि आखिरकार, चुनाव आयोग किसी एक व्यक्ति का नहीं, पूरे देश का है।

ये घटनाक्रम 23-24 सितंबर 2026 के आसपास इंडियन एक्सप्रेस, हिंदू, बीबीसी और अन्य विश्वसनीय स्रोतों की रिपोर्टिंग पर आधारित है। आँकड़े आयोग और राज्य अधिकारियों के आधिकारिक आँकड़ों से लिए गए हैं। समय के साथ नए तथ्य आ सकते हैं।

रिपोर्ट : इस्मा टाइम्स न्यूज़ डेस्क.

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