बिहार के औरंगाबाद जिले के कुटुंबा प्रखंड में स्थित महुआ धाम नवरात्र के दौरान श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र बना हुआ है। कुटुंबा बाजार से दक्षिण दिशा में उत्तर कोयल नहर के किनारे बसे इस गांव में स्थित मां अष्टभुजी का मंदिर दूर-दराज के इलाकों के लोगों को अपनी ओर आकर्षित करता है। स्थानीय लोगों की मान्यता है कि माता रानी के दरबार में सच्चे मन से प्रार्थना करने पर दुख-दर्द दूर होते हैं और मनोकामनाएं पूरी होती हैं।
नवरात्र में दूर-दूर से पहुंचते हैं श्रद्धालु
स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, नवरात्र के अवसर पर महुआ धाम मंदिर में बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। इनमें ऐसे लोग भी शामिल होते हैं, जो लंबे समय से शारीरिक या मानसिक परेशानियों का सामना कर रहे होते हैं। उनके परिजन उन्हें मंदिर परिसर में लाते हैं, जहां वे स्नान करने के बाद मां अष्टभुजी की पूजा-अर्चना करते हैं।
15 अक्टूबर 2026, गुरुवार को जब संवाददाता महुआ धाम मंदिर पहुंचा, तो वहां श्रद्धालुओं की आवाजाही देखने को मिली। कई लोग अपने परिजनों के साथ मंदिर पहुंचे थे। कुछ श्रद्धालु स्नान कर रहे थे, जबकि अन्य मां के दरबार में पूजा-पाठ और मन्नत मांगने में जुटे थे।
हालांकि, लोगों द्वारा अपनी परेशानियों से राहत मिलने की बात उनकी व्यक्तिगत मान्यताओं और अनुभवों पर आधारित है। ऐसी समस्याओं के लिए जरूरत पड़ने पर चिकित्सकीय सलाह लेना भी जरूरी है।
मंदिर में करीब 40-50 वर्षों से हो रहा आयोजन
महुआ धाम मंदिर के व्यवस्थापक मंडल में शामिल धनंजय सिंह ने बातचीत के दौरान बताया कि मंदिर परिसर में करीब 40 से 50 वर्षों से धार्मिक आयोजन होते आ रहे हैं। उन्होंने कहा कि यहां आने वाले श्रद्धालु मां अष्टभुजी महारानी के प्रति गहरी आस्था रखते हैं।
मंदिर की विशेषता के बारे में पूछे जाने पर धनंजय सिंह ने कहा कि श्रद्धालु माता रानी की कृपा से यहां आते हैं और अपनी परेशानियों से राहत मिलने की उम्मीद रखते हैं। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि मंदिर में किसी तरह की ओझाई या गलत गतिविधि नहीं की जाती।
आयोजन की शुरुआत कैसे हुई, इस सवाल पर उन्होंने कहा कि इसकी विस्तृत जानकारी उन्हें नहीं है। उनके मुताबिक, उनके पिता स्वर्गीय रामप्रवेश सिंह इस संबंध में अधिक जानकारी दे सकते थे।
धनंजय सिंह ने कहा कि वह खुद को माता रानी का सेवक मानते हैं और मंदिर आने वाले श्रद्धालुओं की आस्था को मां की कृपा से जोड़कर देखते हैं। उन्होंने बताया कि दूर-दराज से आने वाले लोग यहां पूजा-अर्चना करते हैं और सुख-समृद्धि की कामना करते हैं।
कैमूर के मोहन प्रसाद बिंद ने सुनाया अपना अनुभव
महुआ धाम पहुंचे श्रद्धालुओं में कैमूर (भभुआ) जिले के निवासी मोहन प्रसाद बिंद भी शामिल थे। उन्होंने संवाददाता से बातचीत में बताया कि वह और उनका परिवार पहले काफी परेशानियों से गुजर रहे थे और दवाओं से भी उन्हें अपेक्षित राहत नहीं मिल रही थी।
मोहन प्रसाद बिंद के मुताबिक, महुआ धाम पहुंचकर मां अष्टभुजी और कुंवारी मइया के दरबार में प्रार्थना करने के बाद उन्हें मानसिक शांति और संतोष का अनुभव हुआ। उन्होंने मंदिर के व्यवस्थापक की भी प्रशंसा की।
उन्होंने अपनी आस्था व्यक्त करते हुए कहा कि यहां आने वाले कई श्रद्धालु अपनी परेशानियां लेकर पहुंचते हैं और पूजा-अर्चना के बाद खुशी के साथ लौटते हैं।
सासाराम के रामाकांत चौधरी ने भी जताई आस्था
रोहतास जिले के मुख्यालय सासाराम के तकिया मोहल्ले से आए रामाकांत चौधरी ने भी महुआ धाम मंदिर के प्रति अपनी आस्था जाहिर की। उन्होंने बताया कि वह काफी परेशान थे और जब अन्य उपायों से उन्हें संतोष नहीं मिला, तो मां के दरबार में पहुंचे।
रामाकांत चौधरी ने कहा कि यहां आने के बाद उन्हें संतुष्टि मिली और उनका जीवन पहले की तुलना में बेहतर महसूस होने लगा। उनके अनुसार, श्रद्धालु सच्चे मन से माता रानी से प्रार्थना करते हैं और अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति की उम्मीद रखते हैं।
उन्होंने मां के महत्व को बताते हुए कहा कि एक मां बच्चे को जन्म देती है, जबकि माता रानी को जगत का पालन करने वाली मां के रूप में पूजा जाता है।
अन्य श्रद्धालुओं ने भी की मंदिर की प्रशंसा
महुआ धाम में गोह प्रखंड से आए एक बुजुर्ग श्रद्धालु ने भी मां अष्टभुजी के प्रति अपनी आस्था व्यक्त की। मौके पर मौजूद अन्य श्रद्धालुओं ने भी मंदिर की प्रशंसा की और इसे अपनी धार्मिक आस्था का महत्वपूर्ण केंद्र बताया।
नवरात्र के दौरान महुआ धाम में जुटने वाली भीड़ इस बात को दर्शाती है कि ग्रामीण क्षेत्रों में धार्मिक स्थल आज भी लोगों की आस्था और सामाजिक जुड़ाव का अहम हिस्सा हैं। मां अष्टभुजी मंदिर में दूर-दराज से आने वाले श्रद्धालु पूजा-अर्चना करते हैं और अपने परिवार की सुख-शांति तथा खुशहाली की कामना करते हैं।
नोट: मंदिर में पूजा से बीमारी ठीक होने या किसी विशेष समस्या के दूर होने के दावों को श्रद्धालुओं के व्यक्तिगत अनुभव और स्थानीय मान्यता के रूप में ही देखा जाना चाहिए। इन्हें चिकित्सकीय रूप से प्रमाणित तथ्य नहीं माना जा सकता।
रिपोर्ट : अजय कुमार पाण्डेय.
