31 अक्तूबर 2026, शनिवार को आज़म ख़ान रामपुर जेल से रिहा होते ही ED की टीम ने उन्हें हिरासत में ले लिया। यह कार्रवाई मौलाना मोहम्मद अली जौहर यूनिवर्सिटी और उससे जुड़े ट्रस्ट से संबंधित मनी लॉन्ड्रिंग की जाँच के सिलसिले में हुई।
मगर ख़बर में यह कहा गया है कि सिर्फ़ आज़म ख़ान को हिरासत में लिया गया, जबकि कुछ ख़बरों में उनके बेटे अब्दुल्ला आज़म की भी हिरासत का ज़िक्र है। इसलिए दरुस्त बयान यह है कि आज़म ख़ान को ED ने जेल के बाहर हिरासत में लिया, और उन्हें गाज़ियाबाद की विशेष अदालत में पेश किया जाना था, जहाँ ED रिमांड माँग सकती है।
पहले पैन कार्ड मामले में राहत, फिर ED का एक्शन
आज़म ख़ान और अब्दुल्ला आज़म को दो पैन कार्ड से जुड़े जालसाज़ी के मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट से 29 अक्तूबर 2026 को ज़मानत मिली थी और उनकी सज़ा निलंबित कर दी गई थी। मगर अदालत ने उनकी दोषसिद्धि को रोका नहीं था।
31 अक्तूबर को जब आज़म ख़ान रामपुर जेल के दरवाज़े से बाहर निकले, तो ED की टीम पहले से मौजूद थी। एजेंसी ने उन्हें PMLA यानी Prevention of Money Laundering Act के मामले में हिरासत में लिया और उन्हें गाज़ियाबाद की विशेष अदालत में पेश करने की तैयारी की।
जौहर यूनिवर्सिटी मामला क्या है?
ED की जाँच मौलाना मोहम्मद अली जौहर ट्रस्ट और मोहम्मद अली जौहर यूनिवर्सिटी से जुड़े आरोपों पर आधारित है। एजेंसी का कहना है कि सरकारी कामों के लिए निर्धारित रक़म, निर्माण सामग्री और ठेकेदारों की ओर से दान के नाम पर भेजी गई रक़म यूनिवर्सिटी के निजी कैंपस को बनाने में इस्तेमाल की गई।
ED ने 28 अक्तूबर 2026 को यूनिवर्सिटी की ज़मीन और इमारतों को अस्थायी तौर पर क़ब्ज़े में लिया। एजेंसी के मुताबिक़ इन संपत्तियों की दर्ज क़ीमत 426.46 करोड़ रुपये है, जबकि उनकी मौजूदा बाज़ार क़ीमत क़रीब 1,170 करोड़ रुपये आँकी गई है।
जाँच की बुनियाद क्या है?
ED ने अपनी जाँच रामपुर के अज़ीमनगर थाने में दर्ज 26 FIRs की बुनियाद पर शुरू की थी। आरोप है कि यूनिवर्सिटी के लिए किसानों की ज़मीन ज़बरदस्ती हासिल की गई और सरकारी फ़ंड निजी कैंपस की तरक़्क़ी में मोड़ दिए गए।
13 अक्तूबर 2026 को ED की शिकायत पर उत्तर प्रदेश पुलिस ने आज़म ख़ान, मौलाना मोहम्मद अली जौहर ट्रस्ट और दूसरे मुतअल्लिक़ लोगों के ख़िलाफ़ नई FIR दर्ज की। इसमें आपराधिक साज़िश, भरोसे की ख़िलाफ़वर्ज़ी, धोखाधड़ी और भ्रष्टाचार निवारण क़ानून की धाराओं का हवाला दिया गया।
जेल के बाहर क्या हुआ?
आज़म ख़ान के समर्थक जेल के बाहर पहले से मौजूद थे। जब वे बाहर आए और ED ने उन्हें हिरासत में लिया, तो समर्थकों और अधिकारियों के दरमियान धक्का-मुक्की और तनाव की ख़बरें आईं।
आज़म ख़ान ने अपने समर्थकों से कहा कि उन्हें उनकी पहचान के लिए सज़ा दी जा रही है। उन्होंने स्कूलों और यूनिवर्सिटी के लिए किए गए अपने कामों का हवाला दिया। यह उनका निजी बयान है; इसे ED के आरोपों की तस्दीक़ या इनकार नहीं माना जा सकता।
अगली क़ानूनी कार्रवाई
रिपोर्ट्स के मुताबिक़ आज़म ख़ान को गाज़ियाबाद की विशेष अदालत में पेश किया जाना था, जहाँ ED उनकी रिमांड माँग सकती है। एजेंसी का कहना है कि वे PMLA के तहत औपचारिक गिरफ़्तारी के दायरे में आ सकते हैं।
पहले भी 13 अक्तूबर को ED की छह सदस्यीय टीम ने रामपुर जेल में आज़म ख़ान से पूछताछ की थी। उनका बयान दर्ज किया गया और जाँच में सरकारी ठेकों की रक़म के इस्तेमाल तथा यूनिवर्सिटी की संपत्तियों के निर्माण के सबूतों की जाँच जारी थी।
क्या यह ‘न्याय है?
आज़म ख़ान के समर्थकों का कहना है कि एक बुज़ुर्ग नेता को ज़मानत मिलने के कुछ ही पल बाद हिरासत में लेना सियासी इरादों से प्रेरित लगता है। उनका तर्क है कि अदालत से राहत मिलते ही दूसरी एजेंसी का एक्शन आम इंसान के ऐतमाद को चोट पहुँचाता है।
संपादकीय नज़र
यह मामला इस बात की मिसाल है कि एक व्यक्ति के ख़िलाफ़ कई मुक़दमे और कई एजेंसियों की कार्रवाई एक साथ चल सकती है। पैन कार्ड मामले में ज़मानत और ED के मनी लॉन्ड्रिंग मामले में हिरासत—दोनों अलग-अलग क़ानूनी क़रारदादें हैं।
मगर सवाल यह भी है कि रिहाई के लम्हे का इंतज़ार करके कार्रवाई क्यों की गई और क्या यह वक़्त क़ानूनी ज़रूरत के मुताबिक़ था। रामपुर जेल से रिहा होने के कुछ ही पल बाद आजम खान के साथ जो मज़ाक ED ने किया है उसे देश देख रहा है। यह राजनीतिक द्वेष, डर और एक वर्ग विशेष के लोगों के साथ अन्याय साफ नज़र आता है। क्या इसे न्याय कहा जा सकता है। इन सवालों का जवाब अदालत देगी; जब तक अदालत फ़ैसला नहीं देती, आरोप आरोप ही रहेंगे।
रिपोर्ट : इस्मा टाइम्स न्यूज़ डेस्क.
