गया (बिहार), 17 अक्टूबर 2026: एससी-एसटी कानून और यूजीसी नियमों को लेकर पुनर्विचार की मांग करते हुए डॉ. ज्ञानेश भारद्वाज ने कहा कि सामाजिक न्याय के साथ-साथ समाज में आपसी विश्वास, भाईचारा और सद्भाव बनाए रखना भी सरकार की जिम्मेदारी है। भारद्वाज ज्योतिष शिक्षा-शोध संस्थान के निदेशक डॉ. भारद्वाज ने कहा कि दलितों, आदिवासियों और वंचित वर्गों के विकास के लिए उठाए जाने वाले सकारात्मक कदमों का किसी को विरोध नहीं करना चाहिए, लेकिन कानूनों और नीतियों के क्रियान्वयन में निष्पक्षता तथा संवैधानिक संतुलन भी जरूरी है।
गया जी के स्थानीय गोल बगीचा स्थित डॉक्टर विवेकानंद पथ पर भारद्वाज ज्योति शिक्षा शोध संस्थान में आयोजित कार्यक्रम के दौरान उन्होंने सामाजिक न्याय, राजनीतिक जिम्मेदारी और विभिन्न समुदायों के बीच बढ़ते अविश्वास को लेकर अपनी राय रखी।
सामाजिक न्याय के साथ निष्पक्षता भी जरूरी
डॉ. ज्ञानेश भारद्वाज ने कहा कि सामाजिक न्याय, समान अवसर और संवैधानिक अधिकार किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की बुनियाद हैं। दलितों, आदिवासियों और वंचित समुदायों को आगे बढ़ाने के लिए किए जाने वाले प्रयासों का उद्देश्य समाज के कमजोर वर्गों को सम्मान और अवसर देना होना चाहिए।
उन्होंने सवाल उठाया कि क्या सरकार की जिम्मेदारी केवल कानून बनाना है, या फिर यह सुनिश्चित करना भी उसका दायित्व है कि समाज में आपसी विश्वास और भाईचारा कायम रहे।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि सामाजिक न्याय से जुड़ी नीतियों को इस तरह लागू किया जाना चाहिए कि पीड़ितों को न्याय मिले, दोषियों के खिलाफ कार्रवाई हो और किसी निर्दोष व्यक्ति को अन्याय का भय न सताए।
उनका कहना था कि कानून का मकसद अपराध रोकना और पीड़ितों को सुरक्षा देना है। कानून के प्रति विश्वास बनाए रखने के लिए निष्पक्ष कार्रवाई और प्रभावी शिकायत निवारण व्यवस्था भी जरूरी है।
सामाजिक बदलाव में कई महापुरुषों का रहा योगदान
डॉ. भारद्वाज ने कहा कि भारत में सामाजिक न्याय का इतिहास किसी एक सरकार या एक दौर तक सीमित नहीं है। देश में समानता, शिक्षा और वंचित समुदायों के अधिकारों के लिए अनेक महापुरुषों और नेताओं ने अलग-अलग समय पर योगदान दिया है।
उन्होंने डॉ. भीमराव आंबेडकर का उल्लेख करते हुए कहा कि संविधान निर्माण, समानता और वंचित समुदायों के अधिकारों की रक्षा में उनका योगदान ऐतिहासिक रहा है। बाबू जगजीवन राम ने स्वतंत्रता आंदोलन, श्रमिक कल्याण और राष्ट्रीय राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसी तरह पूर्व राष्ट्रपति के. आर. नारायणन ने भारतीय लोकतंत्र में सामाजिक प्रतिनिधित्व का महत्वपूर्ण उदाहरण प्रस्तुत किया।
उन्होंने बहुजन समाज के राजनीतिक संगठन में कांशीराम, वंचित वर्गों के मुद्दों को राष्ट्रीय राजनीति में उठाने वाले रामविलास पासवान, महिला शिक्षा और सामाजिक समानता के लिए संघर्ष करने वाले ज्योतिबा फुले तथा सावित्रीबाई फुले का भी उल्लेख किया।
डॉ. भारद्वाज ने बी. पी. मंडल और कामराज के योगदान को भी याद किया। उन्होंने कहा कि इन सभी व्यक्तित्वों के विचार और कार्यशैली अलग-अलग रहे, लेकिन देश के सामाजिक विकास में उनकी भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
उनके अनुसार, सामाजिक परिवर्तन एक लंबी प्रक्रिया है, जिसमें अलग-अलग पीढ़ियों ने अपना योगदान दिया है। इसलिए समाज को इतिहास से सीख लेकर आपसी एकता और सद्भाव को मजबूत करना चाहिए।
जातीय तनाव और हिंसा को लेकर जताई चिंता
डॉ. भारद्वाज ने अपने संबोधन में समाज के भीतर जातीय तनाव और राजनीतिक टकराव को लेकर चिंता जताई। उन्होंने आरोप लगाया कि मौजूदा माहौल में जातियों और समुदायों के बीच नफरत बढ़ाने वाली बातें सामने आ रही हैं, जो देश की सामाजिक एकता के लिए नुकसानदेह हैं।
उन्होंने कहा कि राजनीतिक मतभेदों के बावजूद समाज में भाईचारा कायम रहना चाहिए। किसी भी राजनीतिक दल या सरकार की नीतियों के कारण नागरिकों को आपस में संघर्ष की स्थिति में नहीं आना चाहिए।
उन्होंने बिहार में जातीय हिंसा और खूनी संघर्ष के पुराने दौर का जिक्र करते हुए कहा कि ऐसी परिस्थितियों की पुनरावृत्ति किसी भी राज्य या देश के लिए दुर्भाग्यपूर्ण होगी।
डॉ. भारद्वाज ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी टीम की कार्यशैली की आलोचना भी की। उन्होंने कहा कि राजनीतिक नेतृत्व को अपने फैसलों और नीतियों के सामाजिक प्रभावों पर गंभीरता से विचार करना चाहिए।
अटल बिहारी वाजपेयी के विचारों का किया उल्लेख
अपने संबोधन में डॉ. भारद्वाज ने पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के उस विचार का उल्लेख किया, जिसमें देश, लोकतंत्र और राजनीतिक व्यवस्था की स्थिरता को सर्वोपरि बताया गया है।
उन्होंने कहा कि सरकारें और राजनीतिक दल आते-जाते रहते हैं, लेकिन देश और लोकतंत्र की मजबूती सबसे महत्वपूर्ण है। नागरिकों को राजनीतिक मतभेदों के बावजूद एकजुट रहना चाहिए और किसी भी परिस्थिति में सामाजिक सौहार्द को कमजोर नहीं होने देना चाहिए।
उन्होंने ईश्वर से नीति निर्माताओं को सद्बुद्धि देने की कामना करते हुए कहा कि देश की एकता और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा सभी की साझा जिम्मेदारी है।
संजय दास ने सामाजिक सद्भाव को बताया नेतृत्व की कसौटी
कार्यक्रम के दौरान संजय दास ने कहा कि समाज को जोड़ना नेतृत्व की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है। उन्होंने जोर दिया कि शासन की सफलता केवल कानून बनाने या योजनाएं लागू करने से नहीं, बल्कि न्याय के साथ सामाजिक सद्भाव बनाए रखने से भी तय होती है।
उनके अनुसार, समाज के अलग-अलग वर्गों के बीच विश्वास कायम करना और किसी भी प्रकार के टकराव को रोकना जरूरी है।
सुरेश राम ने कानूनों के प्रभाव के मूल्यांकन पर दिया जोर
सुरेश राम ने कहा कि सरकार को कानूनों के प्रभाव का नियमित मूल्यांकन करना चाहिए। साथ ही, शिकायतों के समाधान की व्यवस्था को मजबूत बनाने और विभिन्न समुदायों के बीच संवाद बढ़ाने की जरूरत है।
उन्होंने कहा कि सामाजिक न्याय का वास्तविक उद्देश्य तभी पूरा होगा, जब संविधान में निहित समानता की भावना समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे। चाहे व्यक्ति दलित समुदाय से हो या सामान्य वर्ग से, प्रत्येक नागरिक को सम्मान, सुरक्षा और न्याय मिलना चाहिए।
टिंकू राम ने आत्ममंथन की जरूरत बताई
टिंकू राम ने कहा कि यदि राजनीतिक नेतृत्व सामाजिक संतुलन और आपसी सद्भाव बनाए रखने की जिम्मेदारी से पीछे हटता है, तो उसे आत्ममंथन करना चाहिए।
उन्होंने कहा कि लोकतंत्र की सफलता किसी एक जाति या वर्ग की जीत में नहीं, बल्कि हर भारतीय के सम्मान, सुरक्षा और प्रगति में निहित है। समाज के सभी वर्गों को समान अवसर और सम्मान मिलना लोकतांत्रिक व्यवस्था की मजबूती के लिए जरूरी है।
कार्यक्रम में बड़ी संख्या में लोग रहे मौजूद
गया जी के गोल बगीचा स्थित डॉक्टर विवेकानंद पथ पर भारद्वाज ज्योति शिक्षा शोध संस्थान में आयोजित इस कार्यक्रम में कई लोगों ने हिस्सा लिया।
इस अवसर पर कुमारी युविका, खुशबू कुमारी, सुग्रीव विश्वकर्मा, डिंपल कुमारी, उषा देवी, हर्ष कुमार, सीता देवी, चंद्रभूषण मिश्रा, डॉ. रविंद्र कुमार, प्रोफेसर सुनील कुमार, कुणाल कुमार, अभय सिंह, मोहम्मद सद्दाम, डॉ. रमेश कुमार, दिलीप कुमार, शंभू गिरी, नीरज वर्मा, नीरज मिश्रा, मनीष कुमार, पुतुल कुमारी, चंद्रमौली मिश्रा, कुंदन मिश्रा, अपराजिता मिश्रा, मृदुल मिश्रा, अनुपमा मिश्रा, मेघा मिश्रा, बेबी देवी, अजय कुमार, सुनील कुमार, रवि कुमार दास, गौतम राम, पार्वती देवी, अविनाश कुमार, रंजीत पाठक, पवन मिश्रा, जितेंद्र पाठक, नवीन पांडे, इरशाद आलम, विप्लव कुमार पांडे, सुधीर दास, संजीत पांडे, रामचंद्र यादव, अशोक कुमार, प्रिंस कुमार, रंजीत कुमार वर्णवाल और डॉ. दिनेश कुमार दांगी सहित अन्य लोग उपस्थित रहे।
कार्यक्रम में वक्ताओं ने सामाजिक न्याय, कानूनों के निष्पक्ष क्रियान्वयन, समान अवसर और आपसी सद्भाव को मजबूत बनाने की जरूरत पर अपने विचार रखे।
रिपोर्ट : विश्वनाथ आनंद.
