31 अक्तूबर 2026 को रामपुर अदालत परिसर में वकील मोहम्मद ज़ुबैर ख़ान ने पत्रकारों से कहा कि दोनों के रिहाई के परवाने रामपुर जेल प्रशासन को भेज दिए गए हैं। यह दावा रामपुर की MP-MLA मजिस्ट्रेट अदालत द्वारा जारी परवानों और ज़मानत की शर्तों की पूर्ति की रिपोर्ट्स से मेल खाता है।
हाईकोर्ट का फ़ैसला कब आया?
इलाहाबाद हाईकोर्ट की जस्टिस समित गोपाल की एक सदस्यीय पीठ ने यह आदेश 29 अक्तूबर 2026, गुरुवार को सुनाया। अदालत ने दो पैन कार्ड से जुड़े मामले में दोनों की सज़ा निलंबित करते हुए ज़मानत मंज़ूर की और उन्हें रिहा करने का हुक़्म दिया।
मगर अदालत ने साफ़ शब्दों में कहा कि दोषसिद्धि को रोकने की अर्ज़ी स्वीकार नहीं की जाती। अदालत ने आरोपियों के पुराने मुक़दमों, पिछली सज़ाओं और बड़ी संख्या में आपराधिक मामलों का हवाला देते हुए यह राय दी।
पैन कार्ड मामला क्या है?
यह मामला अब्दुल्ला आज़म के 2017 के विधानसभा चुनाव में नामांकन से जुड़े दूसरे पैन कार्ड के इस्तेमाल के आरोप पर आधारित है। रामपुर की MP-MLA मजिस्ट्रेट अदालत ने 17 नवंबर 2025 को दोनों को धोखाधड़ी, जालसाज़ी, जाली दस्तावेज़ के इस्तेमाल और आपराधिक साज़िश के दोषी पाया था।
उस वक़्त दोनों को सात-सात साल क़ैद और 50-50 हज़ार रुपये जुर्माने की सज़ा सुनाई गई थी। बाद में 23 मई 2026 को MP-MLA सेशन कोर्ट ने सरकार की अपील पर आज़म ख़ान की सज़ा बढ़ाकर दस साल कर दी, जबकि अब्दुल्ला आज़म की सात साल की सज़ा बरक़रार रखी।
रिहाई के लिए क्या-क्या शर्तें पूरी हुईं?
हाईकोर्ट ने दोनों को हर एक के लिए दो-दो ज़मानतियों के साथ personal bond पर रिहाई की शर्त दी थी। साथ ही जुर्माने की आधी रक़म फ़ौरन जमा करने का हुक़्म दिया गया था।
रिपोर्ट्स के मुताबिक़ आज़म ख़ान की तरफ़ से कुल 3.50 लाख रुपये और अब्दुल्ला आज़म की तरफ़ से 2.75 लाख रुपये नज़रानत में जमा कराए गए। इसके बाद MP-MLA मजिस्ट्रेट कोर्ट ने दोनों के रिहाई परवाने जारी कर दिए।
जेल से रिहाई अब क़ानूनी तौर पर कितनी नज़दीक?
रिहाई के परवाने जारी होने और जेल प्रशासन को भेजे जाने के बाद बाक़ी काम जेल प्रशासन के पास है। जेल प्रशासन को दस्तावेज़ों की तस्दीक़ करनी होगी और यह भी देखना होगा कि दोनों किसी दूसरे मामले में गिरफ़्तारी, निरुद्धता या किसी और क़ानूनी रुकावट के दायरे में तो नहीं हैं।
इसी वजह से यह कहना कि दोनों बिल्कुल रिहा हो चुके हैं, अभी पूरी तरह दरुस्त नहीं होगा। सही बयान यह है कि रिहाई का रास्ता साफ़ हो गया है और परवाने जेल प्रशासन को भेज दिए गए हैं; रिहाई दस्तावेज़ों की जाँच और दूसरे मुक़दमों की स्थिति के बाद होगी।
दोषसिद्धि बरक़रार रहने का मतलब
हाईकोर्ट के फ़ैसले का सबसे अहम पहलू यह है कि ज़मानत मिलने के बावजूद दोनों की दोषसिद्धि क़ायम है। इसका सीधा असर यह है कि चुनाव लड़ने की उनकी हैसियत पर असर बना रहेगा, क्योंकि अदालत ने conviction पर रोक नहीं लगाई।
यानी यह राहत ज़मानत और सज़ा के निलंबन तक महदूद है; यह बरी होने या दोषसिद्धि के ख़ात्मे का फ़ैसला नहीं है। असल मुक़दमे की सुनवाई और अपीली फ़ैसले तक क़ानूनी लड़ाई जारी रहेगी।
आगे क्या हो सकता है?
जेल प्रशासन रिहाई परवानों और ज़मानत की शर्तों की जाँच करेगा।
दूसरे लंबित मामलों में कोई B-warrant या production warrant न होने पर रिहाई की राह आसान होगी।
भाजपा नेता आकाश सक्सेना ने हाईकोर्ट की ज़मानत को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने का ऐलान किया है, जिससे क़ानूनी पैचड़बाज़ी और लंबी हो सकती है।
दोषसिद्धि बरक़रार रहने से चुनावी हक़ और आगे की अपीली कार्रवाई दोनों अहम रहेंगे।
संपादकीय नज़र
यह वाक़िया दिखाता है कि क़ानूनी ख़बरों में ‘रिहाई’, ‘ज़मानत’, ‘सज़ा का निलंबन’ और ‘दोषसिद्धि का रोका जाना’—ये चारों अलग-अलग बातें हैं। आज़म ख़ान और अब्दुल्ला आज़म के मामले में अदालत ने पहले दो क़दम उठाए हैं, मगर तीसरा क़दम नहीं उठाया। इसलिए जनता के सामने सही तस्वीर यही है कि रिहाई की राह खुली है, मगर क़ानूनी मुक़ाम अभी भी अधूरा है ।
रिपोर्ट : इस्मा टाइम्स न्यूज़ डेस्क.
