यदुवंश सहाय ‘यदु बाबू’ के व्यक्तित्व को केवल स्वतंत्रता सेनानी, कांग्रेस नेता, बिहार विधानसभा के सदस्य और संविधान सभा के सदस्य के रूप में देखना उनके सामाजिक योगदान के एक अहम पहलू को नजरअंदाज करना होगा। उनका जीवन इस बात की भी मिसाल है कि वे समाज में छिपी प्रतिभाओं को पहचानने और उन्हें आगे बढ़ाने की फिक्र करते थे। खासकर आर्थिक तंगी के कारण किसी होनहार बच्चे की पढ़ाई न छूटे, इसके लिए वे खुद जिम्मेदारी उठाते थे।
इस संबंध में पंडित रामदीन पाण्डेय के पौत्र श्री कमल पाण्डेय ने एक महत्वपूर्ण जानकारी साझा की है। उनके मुताबिक, यदुवंश सहाय ने पंडित रामदीन पाण्डेय को अपने घर में रखकर उनकी पढ़ाई का इंतजाम किया था। उन्होंने उनका दाखिला पलामू जिला स्कूल में कराया और शिक्षा हासिल करने में हरसंभव मदद दी।
इसी तरह पलामू के मशहूर अधिवक्ता और पूर्व सरकारी अधिवक्ता (Government Pleader) श्री लक्ष्मण त्रिपाठी को भी यदु बाबू ने अपने घर में जगह दी थी। उन्होंने उनका नाम भी जिला स्कूल में लिखवाया और पढ़ाई पूरी करने में सहयोग किया।
इन दोनों घटनाओं से यदु बाबू के व्यक्तित्व का वह पहलू सामने आता है, जिसमें वे जरूरतमंदों की मदद महज आर्थिक सहायता तक सीमित नहीं रखते थे, बल्कि उनकी काबिलियत को पहचानकर उनके बेहतर भविष्य की बुनियाद तैयार करने की कोशिश करते थे।
गांव-गांव तक फैला था मदद का सिलसिला
पारिवारिक यादों और श्री कमल पाण्डेय से मिली जानकारी के मुताबिक, यदु बाबू ने जरूरतमंद लोगों तक सहायता पहुंचाने के लिए अपने स्वयंसेवकों के जरिए एक व्यवस्था बना रखी थी। उनके स्वयंसेवक गांव-गांव जाकर ऐसे परिवारों की जानकारी जुटाते थे, जिनके घर में कोई अनाथ बच्चा हो, कोई विधवा आर्थिक तंगी से जूझ रही हो या कोई होनहार विद्यार्थी पैसों की कमी के कारण पढ़ाई छोड़ने की नौबत में पहुंच गया हो।
इस व्यवस्था का मकसद केवल कुछ रुपये देकर मदद की औपचारिकता पूरी करना नहीं था। यदु बाबू जरूरतमंदों की असल हालत समझते थे और उनकी जरूरत के मुताबिक मदद पहुंचाने की कोशिश करते थे। उनकी कोशिश रहती थी कि किसी की मजबूरी उसकी तरक्की के रास्ते में रुकावट न बने।
उनकी नजर में समाजसेवा का मतलब सिर्फ दान देना नहीं, बल्कि किसी जरूरतमंद को इज्जत के साथ अपने पैरों पर खड़ा होने का मौका देना था।
पंडित रामदीन पाण्डेय: आर्थिक तंगी के बीच मिली शिक्षा ने दिखाई नई राह
पंडित रामदीन पाण्डेय आगे चलकर पलामू के प्रतिष्ठित विद्वान, इतिहासकार और शिक्षाविद् के रूप में पहचाने गए। उन्होंने ‘पलामू का इतिहास’ जैसी महत्वपूर्ण पुस्तक लिखकर क्षेत्र के ऐतिहासिक अध्ययन में उल्लेखनीय योगदान दिया। वे रांची कॉलेज में व्याख्याता रहे और बाद में मुजफ्फरपुर के लंगट सिंह कॉलेज में भी अध्यापन तथा शैक्षणिक जिम्मेदारियों से जुड़े रहे।
यह गौर करने वाली बात है कि जिस व्यक्ति ने आगे चलकर पलामू के इतिहास को अपनी लेखनी के जरिए सहेजने का काम किया, उसकी शिक्षा के शुरुआती दौर में यदुवंश सहाय ने उसे सहारा दिया था।
श्री कमल पाण्डेय के मुताबिक, रामदीन पाण्डेय की प्रतिभा पर एक अंग्रेज अधिकारी की भी नजर पड़ी थी। उस अधिकारी ने यदुवंश सहाय से संपर्क किया और रामदीन पाण्डेय की पढ़ाई तथा भविष्य को आगे बढ़ाने के सिलसिले में अपनी भूमिका निभाई। यदु बाबू ने भी इस दिशा में जरूरी पहल की।
यह प्रसंग इसलिए भी अहम है कि यदुवंश सहाय एक तरफ अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ आजादी की लड़ाई में सक्रिय थे, तो दूसरी तरफ शिक्षा और प्रतिभा को लेकर उनका नजरिया व्यावहारिक था। किसी होनहार बच्चे का भविष्य संवारना उनके लिए एक मानवीय जिम्मेदारी थी।
लक्ष्मण त्रिपाठी: यदु बाबू के संरक्षण से विधि जगत तक का सफर
श्री लक्ष्मण त्रिपाठी का जीवन भी यदु बाबू के इसी सामाजिक नजरिये को सामने लाता है। जानकारी के मुताबिक, यदु बाबू ने उन्हें अपने घर में रखकर पढ़ाई का मौका दिया और पलामू जिला स्कूल में उनका दाखिला कराया।
आगे चलकर लक्ष्मण त्रिपाठी पलामू के प्रतिष्ठित अधिवक्ता बने और सरकारी अधिवक्ता के रूप में भी अपनी सेवाएं दीं। इस तरह यदु बाबू के सहयोग से शिक्षा हासिल करने वाले इन दोनों व्यक्तियों ने आगे चलकर क्षेत्र के शैक्षणिक, बौद्धिक और विधिक जीवन में अपनी पहचान बनाई।
हालांकि, यह स्पष्ट करना जरूरी है कि पंडित रामदीन पाण्डेय और लक्ष्मण त्रिपाठी की शिक्षा में यदु बाबू की भूमिका से जुड़ी ये जानकारियां श्री कमल पाण्डेय से मिली मौखिक जानकारी और पारिवारिक स्मृतियों पर आधारित हैं। इनकी दस्तावेजी पुष्टि के लिए पलामू जिला स्कूल के पुराने नामांकन रजिस्टर और अन्य उपलब्ध अभिलेखों की जांच जरूरी होगी।
यदु बाबू की सामाजिक सोच: राजनीतिक आजादी के साथ समाज का उत्थान भी जरूरी
यदुवंश सहाय के इन कार्यों को उनके राजनीतिक और संवैधानिक विचारों से अलग करके नहीं देखा जा सकता। वे इस बात को समझते थे कि राजनीतिक आजादी तभी पूरी तरह सार्थक होगी, जब समाज के आखिरी पायदान पर खड़े व्यक्ति को भी शिक्षा, सम्मान और आगे बढ़ने का बराबर अवसर मिले।
संविधान सभा में भी उन्होंने आर्थिक लोकतंत्र, सामाजिक न्याय, गरीबों की स्थिति और वंचित तबकों के अधिकारों जैसे मुद्दों पर अपने विचार रखे थे। उनके निजी जीवन में गरीब और प्रतिभाशाली बच्चों की पढ़ाई का जिम्मा उठाना उनकी इसी सोच का व्यावहारिक रूप था।
उनका मानना था कि किसी बच्चे का अनाथ होना, परिवार का गरीब होना या संसाधनों की कमी उसकी प्रतिभा के विकास में रुकावट नहीं बननी चाहिए। यही वजह थी कि वे जरूरतमंद बच्चों को अपने घर में रखकर उनकी शिक्षा का इंतजाम करने तक की जिम्मेदारी उठाते थे।
इतिहास के लिए अहम हैं ये पारिवारिक और मौखिक साक्ष्य
इस पूरे प्रसंग का ऐतिहासिक महत्व है। पंडित रामदीन पाण्डेय के पौत्र श्री कमल पाण्डेय ने स्वयं बातचीत के दौरान यदुवंश सहाय द्वारा उनके दादा और श्री लक्ष्मण त्रिपाठी की शिक्षा में दिए गए सहयोग का विस्तार से जिक्र किया है।
इस जानकारी को भविष्य के शोध और ऐतिहासिक दस्तावेजीकरण के लिहाज से दर्ज किया जाना चाहिए। इसके लिए स्रोत का विवरण इस प्रकार है:
मौखिक स्रोत: श्री कमल पाण्डेय, पौत्र – पंडित रामदीन पाण्डेय।
जानकारी का विषय: यदुवंश सहाय द्वारा पंडित रामदीन पाण्डेय और श्री लक्ष्मण त्रिपाठी को अपने घर में रखकर शिक्षा दिलाने तथा पलामू जिला स्कूल में उनका दाखिला कराने का पारिवारिक विवरण।
स्रोत की प्रकृति: प्रत्यक्ष बातचीत पर आधारित मौखिक साक्ष्य।
आगे की पुष्टि: पलामू जिला स्कूल के पुराने नामांकन रजिस्टर, पंडित रामदीन पाण्डेय के निजी दस्तावेजों और परिवार के अन्य सदस्यों की गवाही के जरिए।
आने वाली पीढ़ियों का भविष्य संवारने में भी जुटे रहे यदु बाबू
यदुवंश सहाय ‘यदु बाबू’ की पहचान सिर्फ इस बात से नहीं बनती कि उन्होंने आजादी की लड़ाई में हिस्सा लिया, जेल गए और संविधान सभा के सदस्य के रूप में देश के भविष्य को आकार देने में योगदान दिया। उनके जीवन का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह भी था कि वे उन प्रतिभाओं को आगे बढ़ाने की कोशिश करते थे, जो आर्थिक तंगी के कारण शायद अपनी मंजिल तक नहीं पहुंच पातीं।
पंडित रामदीन पाण्डेय और लक्ष्मण त्रिपाठी से जुड़े ये प्रसंग उनके इसी मानवीय पक्ष को समझने में मदद करते हैं।
एक तरफ यदु बाबू अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ जनता को संगठित करने में लगे थे, तो दूसरी तरफ गांवों में अनाथ बच्चों, विधवाओं और जरूरतमंद परिवारों की मदद का इंतजाम भी कर रहे थे। वे होनहार बच्चों को अपने घर में जगह देते और उनकी पढ़ाई का रास्ता खोलते थे।
उनका जीवन बताता है कि एक जननेता की जिम्मेदारी केवल अपने दौर की राजनीति और सत्ता तक सीमित नहीं होती। वह समाज की उन प्रतिभाओं को भी पहचानता है, जिनमें आने वाले कल को बेहतर बनाने की क्षमता होती है। यदुवंश सहाय इसी सोच के साथ न केवल अपने समय के संघर्षों में शामिल रहे, बल्कि आने वाली पीढ़ियों का भविष्य संवारने की कोशिश भी करते रहे।
लेखक: हृदयानंद मिश्र, एडवोकेट एवं सदस्य, कोऑर्डिनेशन कमिटी, झारखंड प्रदेश कांग्रेस।
प्रेषक: विश्वनाथ आनंद.
